Bankim Chandra Chatterjee Biography Hindi: जब पढ़ाई में अंग्रेजी के लिए टीचर ने डांटा तो बंकिम चंद्र चटर्जी ने मातृभाषा में लिख डाली थी किताब और हो गए अमर

Bankim Chandra Chatterjee Biography Hindi: बंकिम चंद्र चटर्जी को लोग बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के नाम से भी जानते हैं। वह पहले ऐसे बांग्ला साहित्यकार थे जिन्होंने बंगाली भाषा में साहित्य लिखा।

Update: 2022-06-25 13:45 GMT

मोना सिंह की रिपोर्ट

Bankim Chandra Chatterjee Biography Hindi: बंकिम चंद्र चटर्जी को लोग बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के नाम से भी जानते हैं। वह पहले ऐसे बांग्ला साहित्यकार थे जिन्होंने बंगाली भाषा में साहित्य लिखा। उनसे पहले के बांग्ला साहित्यकार संस्कृति या अंग्रेजी भाषा में लिखते थे। वह बांग्ला के प्रसिद्ध उपन्यासकार कवि और पत्रकार थे। उन्होंने बांग्ला साहित्य के उत्थान और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय जनमानस में उन्हें राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के रचयिता के रूप में जाना जाता है। जब भी स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है 'वंदे मातरम्' राष्ट्रगीत का जिक्र अपने आप ही हो जाता है। राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' सुनने या गाने पर मातृभूमि के प्रति प्रेम आज भी खून में उतना ही उबाल लाता है जितना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय था। आज बंकिम चंद्र चटर्जी की 184 वी जयंती पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में

बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म और शिक्षा दीक्षा

बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म 26 जून 1838 को पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा गांव में एक समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने मेदिनीपुर में पूरी की इसके बाद उन्होंने हुगली मोहसिन कॉलेज से पढ़ाई की। इस दौरान उनकी रूचि अंग्रेजी भाषा में होने लगी। एक बार उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने उन्हें बहुत बुरी तरह डांटा था। उसके बाद उनकी रूचि अंग्रेजी भाषा के प्रति समाप्त हो गई। इसके बाद उनकी रूचि मातृभाषा के प्रति बढ़ने लगी। उनकी रूचि पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी थी। खाली समय में भी किताबें पढ़ना पसंद करते थे। 1856 में उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में एडमिशन लिया। उस समय देश पहले स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार हो रहा था। आम जनता अंग्रेजों के लगातार बढ़ते अत्याचारों से दुखी थी। जब 1857 का स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय स्नातक की परीक्षा दे रहे थे। वह प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए की परीक्षा पास करने वाले पहले भारतीय थे। स्नातक की परीक्षा पास करने के तुरंत बाद वे 1858 में कोलकाता के डिप्टी कलेक्टर पद पर नियुक्त कर दिए गए थे। इस पद पर रहते हुए ही उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की।

सरकारी नौकरी करते हुए भी कभी नहीं झुके अंग्रेजों के सामने

उस समय सरकारी नौकरियों में बड़े पदों पर केवल अंग्रेज ही तैनात होते थे। बड़े पदों पर बहुत कम भारतीय थे। इसलिए बंकिम चंद्र चटर्जी का अंग्रेज अधिकारियों से कदम कदम पर संघर्ष होता रहता था। जिसके कारण वे कभी भी प्रमोशन प्राप्त नहीं कर सके। इससे जुड़ा एक चर्चित किस्सा है। बंकिम चंद्र चटर्जी तब कोलकाता में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। उस समय कमिश्नर पद पर मिनरों नाम का एक अंग्रेज अफसर कार्यरत था, एक बार अचानक ईडन गार्डन में बंकिम जी की मिनरो से मुलाकात हो गई किंतु बंकिम जी ने मिनरो का अभिवादन नहीं किया और नजरअंदाज करके आगे बढ़ गए। उनके इस व्यवहार से बौखलाए मिनरो ने उनका तबादला दूसरी जगह करवा दिया। बंकिम चंद्र चटर्जी 32 वर्ष तक सरकारी नौकरी करके 1891 में सेवानिवृत्त हुए थे।

बंकिम चंद्र चटर्जी का वैवाहिक जीवन

बंकिम चंद्र चटर्जी का विवाह मात्र 11 वर्ष की आयु में 5 वर्ष की कन्या से कर दिया गया था। जब वह 22 वर्ष के हुए तब उनकी पत्नी का देहांत हो गया। बाद में उन्होंने राज लक्ष्मी देवी से दूसरा विवाह किया। इस शादी से उनकी तीन पुत्रियां थी।

सरकारी नौकरी करते हुए भी बने स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा

1857 का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को बंकिम चंद्र चटर्जी ने बहुत नजदीक से देखा था। उस समय भारत का शासन अचानक ईस्ट इंडिया कंपनी से महारानी विक्टोरिया के हाथों में चला गया था। ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद भारतीयों का जीवन पहले से भी ज्यादा कठिन हो गया था। सरकारी नौकरी में रहते हुए बंकिम चंद्र चटर्जी स्वतंत्रता आंदोलन में खुलकर सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकते थे। इस बात का उनको हमेशा मलाल रहता था। अंततः उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का निर्णय किया। बंकिम चंद्र कविता और उपन्यास दोनों ही लिखने में पारंगत थे। उन्होंने "आनंदमठ" नाम का उपन्यास लिखा। इस उपन्यास ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्राण फूंक दिए। यह उपन्यास 1882 में कई भागों में प्रकाशित हुआ। इसमें 1773 में हुए स्वराज आंदोलन की कहानी है।इस उपन्यास में संन्यासियों और मुस्लिम समुदाय का अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष को दिखाया गया है। और इसमें हिंदू मुस्लिम एकता का भी वर्णन है। इस उपन्यास में ही "वंदे मातरम्" गीत की रचना हुई थी। "वंदे मातरम्" इतना प्रसिद्ध हुआ, कि स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीत दिया। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने लेखन से राष्ट्रवाद का अलख जगाया। विदेशी सरकार की सेवा के साथ-साथ देश के नवजागरण के लिए उच्च कोटि के साहित्य की रचना की।

27 वर्ष की उम्र में लिखा पहला उपन्यास

बंकिम चंद्र चटर्जी का पहला उपन्यास रायमोहंस वाइफ था। जो कि अंग्रेजी में था। उनका पहला बांग्ला भाषा में लिखा गया उपन्यास दुर्गेशनंदिनी 1865 में छपा तब वे 27 वर्ष के थे। 1866 में कपालकुंडला,1869 में मृणालिनी, 1873 में विषवृक्ष 1877 में चंद्रशेखर, रजनी।1881 में राज सिंह, 1882 में आनंदमठ, 1884 में देवी चौधुरानी प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उन्होंने सीताराम, कमलाकांतेर दपतर, कृष्णकांतेर विल, विज्ञान रहस्य, लोक रहस्य, धर्म तत्व जैसे धर्म और विज्ञान से संबंधित साहित्य भी लिखें। बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1872 में पहली बंगाली पत्रिका "बंग दर्शन" का प्रकाशन शुरू किया रविंद्र नाथ टैगोर ने शुरू में बंग दर्शन में ही लिखना शुरू किया था। वह बंकिम चंद्र चटर्जी को अपना गुरु मानते थे।

विदेशों में भी प्रसिद्ध हैं बंकिम चंद्र चटर्जी

बंकिम चंद्र चटर्जी पहले ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्हें अपनी रचनाओं की वजह से विदेशों में भी ख्याति मिली है। उनकी रचनाओं का अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हो चुका है और उन पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं। उनकी लोकप्रियता आज डेढ़ सौ साल के बाद भी वैसी ही है। उनके उपन्यासों के संस्करण अनेक भाषाओं में अनुवाद करके आज भी प्रकाशित किए जा रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी अंतरवेदना और नारी की गरिमा का हृदयस्पर्शी वर्णन मिलता है। उन्हें ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में महारत हासिल थी। इसलिए उन्हें भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा भी कहा जाता है।

बंकिम चंद्र चटर्जी का निधन

8 अप्रैल 1894 को इस महान साहित्य सेवी और देशसेवी का निधन हो गया। इससे बांग्ला साहित्य और समाज के साथ-साथ पूरे देश को गहरा आघात पहुंचा।

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