विज्ञान साबित कर चुका है जीवन किसी चमत्कार की तरह अचानक नहीं हुआ प्रकट, इसके पीछे करोड़ों वर्षों का धीमा, जटिल और संघर्षपूर्ण विकास !
आस्था अक्सर सवालों पर विराम लगा देती है, जबकि विज्ञान सवालों से ही आगे बढ़ता है। आज ज़रूरत डर और पाखंड फैलाने वाली कथाओं की नहीं, बल्कि तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक चेतना की है...
जैविक विकास, डायनासोर, मनुष्य, धर्म और समय की लंबी यात्रा के बारे में बता रहे हैं धर्मेन्द्र आज़ाद
विज्ञान ठोस प्रमाणों के आधार पर यह स्थापित कर चुका है कि पृथ्वी का जन्म लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले एक खगोलीय परिघटना के परिणामस्वरूप हुआ। इसके बाद बेहद लंबे समय तक इस ग्रह पर केवल भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाएँ ही सक्रिय रहीं।
करोड़ों वर्षों तक चली इन भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाओं के बाद एक नई और जटिल प्रक्रिया जुड़ी-जैविक प्रक्रिया। यहीं से अत्यंत सूक्ष्म जीवों का अस्तित्व सामने आया। विज्ञान साबित कर चुका है कि जीवन किसी चमत्कार की तरह अचानक प्रकट नहीं हुआ, बल्कि करोड़ों वर्षों के धीमे, जटिल और संघर्षपूर्ण विकास के बाद उसके शुरुआती रूप उभरे।
इसी लंबी प्रक्रिया के दौरान, लगभग 23 करोड़ वर्ष पहले, अब तक के सबसे विशाल और शक्तिशाली जीव-डायनासोर-पृथ्वी पर अस्तित्व में आए। उन्होंने इस धरती पर करीब 16 करोड़ वर्ष तक प्रभुत्व बनाए रखा। वे न तो कमजोर थे, न असफल और न ही किसी “डिज़ाइन की गलती” थे। फिर भी वे पूरी तरह विलुप्त हो गए। पृथ्वी का इतिहास स्पष्ट करता है कि विलुप्ति कोई अपवाद नहीं, बल्कि प्रकृति की सामान्य और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
जीवाश्म विज्ञान यह भी बताता है कि पृथ्वी पर अब तक उत्पन्न हुई 99 प्रतिशत से अधिक प्रजातियाँ पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। डायनासोर गए, उनसे पहले और बाद की अनगिनत जीव-जातियाँ भी समय की परतों में दफन हो गईं।
अब ज़रा मनुष्य की ओर देखें। हमारी प्रजाति होमो सेपियन्स का उद्भव लगभग 2 लाख वर्ष पहले हुआ। पृथ्वी के इतिहास की घड़ी पर यह समय एक क्षण से भी छोटा है। मानव जाति के सामूहिक जीवन के ठोस प्रमाण 15 हज़ार वर्ष से अधिक पुराने नहीं हैं, और खेती, नगर, लेखन तथा राज्य जैसी संरचनाओं वाली सभ्यता तो केवल 10 हज़ार वर्ष पुरानी है।
और धर्म? यह तो और भी नई परिघटना है। संगठित धर्मों का उद्भव लगभग 4 से 6 हज़ार वर्ष पहले हुआ। यानी 4.5 अरब वर्ष के इतिहास में धर्म एक अत्यंत हालिया सामाजिक घटना है। पूरी समय-रेखा को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ़ हो जाती है—डायनासोर करोड़ों वर्षों तक रहे, मनुष्य लाखों वर्षों से मौजूद है, सभ्यता हज़ारों वर्षों पुरानी है और धर्म उससे भी नया।
यहीं से कुछ असहज लेकिन ज़रूरी सवाल जन्म लेते हैं। यदि ईश्वर सदा से मौजूद था, तो डायनासोरों और उन करोड़ों प्रजातियों को विलुप्त होने से क्यों नहीं बचाया गया? क्या वे उसकी रचना नहीं थीं? और यदि उद्देश्य विशेष रूप से मनुष्यों को पैदा करना था, तो मनुष्य को पृथ्वी पर लाने में 4.5 अरब वर्ष क्यों लगे? उसके बाद भी उसे “सभ्य” बनने में लगभग 1 लाख 90 हज़ार वर्ष क्यों लग गए?
यदि कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर होता, तो शुरुआत से ही सीधे सभ्य मनुष्य को धर्मग्रंथों के साथ धरती पर उतारा जा सकता था—वह भी एक ही सार्वभौमिक धर्म और एक ही ग्रंथ के साथ। फिर अनेक धर्मों, उनके भीतर असंख्य पंथों और सबकी “अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग” क्यों रचा गया, यदि ईश्वर एक ही है?
एक और अहम प्रश्न—धर्मों के आने से पहले के मनुष्य क्या असामाजिक और अनैतिक थे? विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। सहयोग, करुणा और सामाजिक व्यवहार धर्म से बहुत पहले विकसित हो चुके थे। न केवल मनुष्यों में, बल्कि कई अन्य प्रजातियों में भी। यदि किसी जीव की माँ अपने बच्चों की देखभाल न करे, या कोई झुंड आपसी सहयोग न बनाए, तो वह प्रजाति टिक ही नहीं सकती। शिकारी जीव भी शिकार के लिए झुण्ड में रहकर सामूहिक रणनीति अपनाते हैं। यानी करुणा, सहयोग और सामाजिकता किसी धर्म ग्रंथ की देन नहीं, बल्कि जीवन के अस्तित्व की बुनियादी शर्तें हैं।
आज स्थिति यह है कि मनुष्य खुद ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर रहा है जो उसके ही अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं—जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण का विनाश, परमाणु युद्धों का जोखिम और तेज़ी से घटती जैव विविधता। इसके बावजूद अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि “सब कुछ ईश्वर की इच्छा है।” लेकिन यदि भविष्य में इन्हीं कारणों से मनुष्य ही नष्ट हो गया, तो ईश्वर किसके लिए बचेगा? क्या तब किसी नई प्रजाति के लिए कोई नया धर्म गढ़ा जाएगा?
यहीं विज्ञान और आस्था के बीच का फर्क साफ़ दिखाई देता है। आस्था अक्सर सवालों पर विराम लगा देती है, जबकि विज्ञान सवालों से ही आगे बढ़ता है। आज ज़रूरत डर और पाखंड फैलाने वाली कथाओं की नहीं, बल्कि तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक चेतना की है। शिक्षा का उद्देश्य आज्ञाकारी दिमाग़ तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक विकसित करना होना चाहिए जो सत्ता, व्यवस्था और परंपरा—तीनों से सवाल पूछ सकें; जो विनाशकारी शक्तियों को पहचान सकें और उनके ख़िलाफ़ खड़े हो सकें।
मनुष्य का भविष्य किसी अलौकिक शक्ति के भरोसे से सुरक्षित नहीं होगा। वह सुरक्षित होगा विवेक, सामूहिक ज़िम्मेदारी और सह-अस्तित्व से। प्रकृति और अन्य जीवन-रूपों के साथ संतुलन बनाकर ही मानव जाति इस ग्रह पर टिक सकती है।
विज्ञान हमें किसी अलौकिक शक्ति से डरने, अपनी किस्मत उससे लिखवाने या उसे खुश करने के लिए तरह-तरह के पाखंड करने को नहीं कहता। वह हमें समय की वास्तविकता से परिचित कराता है। और समय—किसी भी प्रजाति का सबसे निष्पक्ष, निर्मम और ईमानदार गवाह है।