हम खुद ही बना रहे हैं अपने बच्चों को हत्यारा, जाति-धर्म की आड़ में इस नफरती दौर में हत्याएं हो चुकी हैं आम !
आज हम राष्ट्रवाद का मिथ्या उन्माद फैलाकर, सनातन की थोथी अवधारणा के चक्कर में बच्चों को हिंसक और अपराधी बना रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम का फसाद खड़ा करके देश में जहरीला वातावरण बना रहे हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा करके उनके खिलाफ जहर उगलना हमारा शगल बन गया है...
वरिष्ठ पत्रकार संजय रोकड़े की टिप्पणी
अब हमें चेत जाने की जरूरत है, पर मेरी ये बात आपको बेफिजूल की बात लगेगी। मैं ये भी जानता हूं कि लखनऊ में जिस बच्चे ने अपने सगे बाप को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया और उसके बाद भी जब उसे तसल्ली न हुई तो उसने बाप की लाश के टुकड़े—टुकड़े करके बाहर फेंक दिए। जब वो लाश के सारे टुकड़ों को ठिकाने नहीं लगा पाया तो फिर उसने कुछ टुकड़ों को घर में ड्रम में छुपा दिए।
इस वीभत्स हादसे को जब उसकी छोटी बहन ने खुली और नंगी आंखों से देखा तो वो सहम गयी, लेकिन उसने उसे भी धमकाते हुए कहा कि चुप ही रहना, वरना तेरा भी यही हाल कर दूंगा।
बात यहां तक भी होती तो समझ आती, मगर जब वो पुलिस के हत्थे चढ़ा तो सच कहने की बजाय पहेलियां बुझाने लगा। तरह तरह की कहानियां सुनाने लगा। पहले पहल तो उसने पिताजी के लापता होने की कहानी गढ़ी। फिर जब पुलिस ने दबाव बनाया तो खुदकुशी करने की कहानी पेश करने लगा।
बहरहाल कहानियां जो भी हों, जितनी भी हों, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है, फर्क तो इस बात से पड़ता है कि क्या उसने अपने पिता की हत्या करने का कदम आवेश में उठाया था, गर हां तो इतना आवेश और हद दर्जे की दरिंदगी हमारे बच्चों के अंदर आई कहां से।
क्या आपने दिल को दहला देने वाली इस क्रूरता के बारे में कभी खुद से सवाल किया है। शायद नहीं। आपके पास इतना समय ही कहां है। वैसे भी आप जिस नफरत और हिंसा के दौर में जी रहे हो। इंसान, इंसान के खून का प्यासा बना है ऐसे दौर में आपके पास इस तरह की बातें सोचने-विचारने का वक्त ही कहां है। आप तो स्वयं नफरत में जीने के आदी हो गए हो। हिंसा के प्रेमी बन गए हो। फिर क्यूं आप इस घटना से परेशान होंगे। विचलित होंगे।
खैर, कोई बात नहीं। इस तरह की घटनाओं से आपका कोई लेना-देना भी नही होना चाहिए। आपको तो आपके बेटे ने मौत के घाट नहीं उतारा है। फिर आप क्यूं चिंतित हो। पर खबरदार! इस भूल में न रहें कि आग की इन लपटों से आप भी महफूज न रहेंगे। आपका घर नहीं जलेगा, ऐसा हरगिज न सोचें। मुझे यकीन ही नहीं, बल्कि पूरा पूरा विश्वास है कि आपके बेटे का अगला शिकार आप ही होंगे।
अब आप कहेंगे कि इतनी पहेलियां क्यूं बुझाई जा रही हैं। तो मैं आपको सीधे सीधे उस तरफ ले चलता हूं जिसे जानने के लिए आप लालायित हैं। बात बहुत बड़ी नहीं है। जरा सी है। इस बच्चे को उसके पिता नीट की परीक्षा दिलवाना चाहते थे, ताकि वो डॉक्टर बन सके। पर वो डॉक्टर नहीं बनना चाहता था। इस बात को लेकर बाप-बेटे में अक्सर कहासुनी भी हुआ करती थी।
है न कितनी अजीब और हैरान करने वाली बात। क्या इतनी सी बात पर उस बच्चे ने अपने बाप को मौत के घाट उतार दिया। क्या हमारे बच्चे इन छोटी छोटी सी बातों में इतने हिंसक हो जाते हैं। नहीं कतई नहीं।
तो फिर ऐसा कैसे हुआ। यही सवाल मैं आपसे भी पूछना चाहता हूं। इतनी सी बात पर हमारे बच्चे बाप के सीने पर गोलियां कब से दागने लगे हैं। हमारे बच्चों का इस हद तक हिंसक हो जाना ये कैसे संभव हो पाया है। क्या ये हमारी नाकामी है। क्या ये हमारी विफलता है। यकीनन ये हमारी नाकामी है। हमारी ही विफलता है। आज हम जिस दौर में जी रहे हैं उस दौर में इस कदर बच्चों का हिंसक होना लाजिमी ही है। सच तो ये है कि हमारे बच्चों का भविष्य और भी हिंसक होने वाला है।
दरअसल इस तरह की हिंसा और अपराध के लिए हमारे बच्चे रत्तीभर भी दोषी नहीं हैं। आज के समय में हमारा पूरा समाज हिंसक हो चुका है। हम जाति, धर्म की आड़ में इंसान के खून के प्यासे हो गए हैं। इस नफरती दौर में हत्याएं आम हो चली हैं। हम ही है जो जाति, धर्म की आड़ में इंसान को मौत के घाट उतार दे रहे हैं।
हमने समाज में जिस तरह से बोली भाषा को सार्वजनिक रूप से हिंसक बनाया है अब वह हिंसक बोली उनकी जुबान पर आ गई है। बच्चों के आचार-विचार और व्यवहार में झलकने लगी है। हमारे बच्चे आज जिस बोली को अपना रहे हैं, वो किसी और ने नहीं बल्कि हमने ही दी है। वे आम बोलचाल की भाषा में भी जिस तरह के शब्दोंं का प्रयोग कर रहे है काफी डऱावने है। मसलन, गर्दन काट दूंगा, जीभ काट दूंगा, बलात्कार कर दूंगा, छोड़ूंगा नहीं, बदला लेकर रहूंगा, ठिकाने लगा दूंगा, गोली मार दूंगा, हथियार उठाने में जरा भी गुरेज नही करूंगा।
हद तो तब हो जाती है जब बच्चा मामूली सी बात पर एक दूसरे की हत्याएं करने लगता हैं- यह हमारे समाज का एक न्यू नॉर्मल बन गया है। हम पहले आपस में कितना भी एक-दूसरे से गाली गलौच कर लेते थे, पर किसी के गिरेबान पर हाथ तक नही डालते थे। आपस में संवाद से ही सारे मसले सुलझा लेते थे। पर अब सब बदल गया है। आज के बच्चे पराए तो क्या अपनों को ही शिकार बना रहे हैं। हम अपने बच्चों की ये कैसी परवरिश कर रहे हैं।
आज हम राष्ट्रवाद का मिथ्या उन्माद फैलाकर, सनातन की थोथी अवधारणा के चक्कर में बच्चों को हिंसक और अपराधी बना रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम का फसाद खड़ा करके देश में जहरीला वातावरण बना रहे हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा करके उनके खिलाफ जहर उगलना हमारा शगल बन गया है। देश धर्म से चलने लगा है और धर्म राजनीति बन गया है। ये बहुत खतरनाक हो गया है। जब से देश धर्म की राजनीति पर चलने लगा है तब से ही बच्चे हत्यारे बनने लग गए हैं। क्या ऐसी स्थिति में हमारे बच्चे सेफ रहेंगे। आपको क्या लगता है वे दरिंदे और हत्यारे नहीं बनेंगे। जब हम अपने बच्चों को हिंसक बनाकर किसी की जान का दुश्मन बना रहे हैं तो क्या वे हमारी जान के दुश्मन नहीं बन सकते हैं। जाहिर है यही बच्चे वयस्क होने तक समाज के लिए आज से कहीं अधिक हिंसक होंगे।
हमें ये सोचना होगा कि जब हम समाज में हत्यारों की फौज खड़ी करेंगे तो हत्याारे ये नहीं देखेंगे कि उनकी हिंसा का शिकार कौन बन रहा है। वे किसको मारकाट रहे हैं। हत्यारों के लिए तो सब समान है। कौन अपना कौन पराया ये सब उनके लिए मायने नही रखता है। वे आज पराए को मार रहे हैं तो कल अपनों को भी मारेंगे। पर दुर्भाग्य तो देखिए ये कल आज ही आ गया है। इसका जीता जागता उदाहरण या प्रमाण लखऊन का वो बच्चा है जिसने अपने बाप के ही सीने में गोलियां दाग कर मौत के घाट उतार दिया है।
जरा सोचिए, आज हम बच्चों को जो सीख दे रहे हैं, जो कुछ दिखा रहे हैं वह हमारे बचपन से कितना अलग है। आज बच्चों के लिए समाज ही नहीं बल्कि पूरा देश बदल चुका है। हम बच्चों को शारीरिक और मानसिक तौर पर कमजोर बना रहे हैं। अब सत्ता और समाज मिलकर उनके मन, मस्तिष्क और सोचने समझने की प्रक्रिया को कमजोर कर रहे हैं। हैक कर रहे हैं। सच तो ये है कि हम देश और समाज की गरिमा को तिलांजली देकर सत्ता में बैठे आकाओं के इशारे पर बच्चों को हिंसक बना रहे हैं। अपराधी बना रहे हैं। असल में हम अपने ही बच्चों को हत्यारा बना रहे हैं।
(पिछले दो दशक से मुख्यधारा की पत्रकारिता में रहकर दिल्ली, इंदौर से प्रकाशित दैनिक अखबारों के संपादकीय विभाग के अहम पदों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके संजय रोकड़े फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं।)