भुखमरी के कगार पर खड़ा किसान दूध न देने वाली गायों का कैसे उठा सकता है बोझ

पशुओं को किसान विरोधी बनाकर कभी भी उनकी संख्या नहीं बढ़ाई जा सकती। गांव में जो परती जमीनें थीं, उन्हें बेहतर चारागाह में तब्दील करने के बजाय, पट्टे पर देकर सार्वजनिक जमीनें खत्म कर दी गईं....

Update: 2020-10-21 09:09 GMT

सुभाष चन्द्र कुशवाहा की टिप्पणी

बैलों के गले में घुंघरू और द्वार पर रंभाती गाय, बीते युग की बात लगने लगी हैं। गांवों से पशुओं का रिश्ता खत्म होने लगा है। भोर में उठने, चारा-पानी की व्यवस्था करने जैसे काम लगभग खत्म हो गए हैं।

कभी गंवई अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता था पशुधन। दरवाजे पर बंधे बैल और गाय, उनके गले में घुंघरुओं की खनक, घर की शोभा होती थी। गोधन की पूजा की परिकल्पना इसी संदर्भ में हुई होगी। घर की आर्थिक दशा को मापने का पैमाना था पशुधन। गांवों में शादी-ब्याह के लिए रिश्ते बनाने के पूर्व, हैसियत का आंकलन पशुधन से होता था। दान-दहेज में भी गाय, बैल और भैंस दिये जाते थे। पशु मेलों की दूर-दूर तक ख्याति थी।

अंग्रेजों के गजेटियरों में पशु-मेलों का जिक्र हुआ है। सोनपुर के मेले में गाय-बैल से लेकर घोड़े और हाथी तक की बिक्री होती थी। गाय तब भी पूज्य थी। गांधी जी ने गाय वध के संबंध में किसी कानून की कभी वकालत न की थी अपितु उन्होंने यह कहा था कि हमारे मुस्लिम भाई, गाय का धार्मिक महत्व समझते हुए उसकी कुर्बानी नहीं देंगे।

आखिर यह कैसी नीति बनी कि अब गांव के दरवाजों से पशु नदारद हो गए? वे गांवों को छोड़कर हाईवे की ओर रुख कर लिए। खेतों में पशुओं के आवारा घूमने और चरने के कारण खेती-किसानी का संकट अलग से आ खड़ा हुआ। किसानों ने उन्हें खेदड़ना शुरू किया। खेतों को बचाने के लिए रात में पहरा देना शुरू किया। किसान और पशुओं से दिली रिश्ता, दुश्मनी में बदल गई। इस बेरूखी से कई बार हिंसक सांढ़ों ने किसानों की जानें भी ले लीं।

किसान और पशुओं का संघर्ष और तेज हुआ तो आवारा पशुओं के झुण्ड, हाईवे पर दिखने लगे। हाईवे पर आने से आदमी और जानवर, दोनों के लिए समस्याएं आ खड़ी हुईं। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गयीं। गाड़ियों से टकराकर जानवर भी मारे जाने लगे और आदमी भी। इन्हें बचाने के लिए गऊशालाएं खुलीं जो कारगर न हुईं। कुछ लोगों ने उन्हें सिर्फ चंदा वसूलने का धंधा बना लिया। उनसे न तो गायों की नस्लों का विकास हुआ और न संख्या बढ़ी।

पशुओं को किसान विरोधी बनाकर कभी भी उनकी संख्या नहीं बढ़ाई जा सकती। गांव में जो परती जमीनें थीं, उन्हें बेहतर चारागाह में तब्दील करने के बजाय, पट्टे पर देकर सार्वजनिक जमीनें खत्म कर दी गईं। अब गांवों में जमीनें बची ही नहीं जहां जानवरों को छुट्टा चराया जा सके। चारागाह खत्म हुए तो चरवाही खत्म हो गई और उसी के साथ पशुओं को पालने की संस्कृति भी खत्म हो गई।

अब देशी हल का जमाना लद गया। टैक्टर और कम्बाइन ने उन्हें विस्थापित कर दिया। इसलिए पड़वों की हल खींचने में उपयोगिता खत्म हो गई। ऊपर से हमने बूचड़खानों के लिए उनकी बिक्री को रोक कर, राजनीति का अखाड़ा बना दिया। ऐसे में उनके लिए सड़कों पर स्वतंत्र विचरण के अलावा कोई सहारा न मिला। पालक और पशु का रिश्ता खत्म हो गया। अब 'दो बैलों की जोड़ी' कहानी नहीं लिखी जा सकती।

गाय को हमने धर्म और संप्रदाय में बांट दिया। इससे समाज का एक वर्ग तो अब किसी भी कीमत पर गाय पालने से रहा? हमारी गलत नीतियों से चमड़ा उद्योग खतरे में पड़ गया है। हड्डियों से तैयार खाद की किल्लत बढ़ गई है।

आज गोबर की कमी से देशी खाद की अनुपलब्धता ने किसानों के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। गोबर की खाद के बिना खेत बंजर बनते जा रहे हैं। बिना गोबर के, कम्पोस्ट बनाने के हवा-हवाई विज्ञापन किसी का भला नहीं करने वाले। रसायनिक खादों के बल पर खेती बहुत आगे तक लाभादायक नहीं रहने वाली है। पशुओं के गोबर का खेती में जो योगदान था, उसका फिलहाल कोई विकल्प नहीं दिखता।

जो गायें दूध देने की स्थिति में नहीं रहेंगी, उनको किसान दरवाजे पर बांधने का बोझ कैसे उठा सकता है? उनका होगा क्या? इस समस्या पर विचार किया जाना चाहिए था। पहाड़ों पर बंदरों और लंगूरों की वजह से पहाड़ी खेती पहले से ही बर्बाद हो चुकी है। अब मैदानों में छुट्टा छोड़ दिए गए गाय, बछड़े और साड़ों ने फसलों को बर्बाद करना शुरू कर दिया है। इन समस्याओं के चलते किसानों ने गाय पालना बंद कर दिया है। दूध उत्पादन का कम हो जाना उसी का परिणाम है।

हमें गंवई अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना को समझना होगा। पशुओं को आवारा छोड़ने से बचाने और पशुधन बनाये रखने के लिए नियंत्रण मुक्त करना होगा। गायों को बचाने के लिए, इनके पालन-पोषण, बिक्री को राजनीति से मुक्त करना होगा। चारागाह की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए बड़़े-बड़े जोतदारों की जमीनें अधिग्रहित कर चारागाहों का निर्माण करना होगा। तभी गाय माता की वंश परंपरा कायम रह सकती है और पशुधन की संस्कृति बची रह सकती है।

(लेखक सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने समाज, आंदोलन और परंपरा पर किताबें लिखीं हैं।)

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