Sudha Bhardwaj : पिछले 3 वर्षों से जेल में बंद है साहस और संघर्ष से उम्मीद के बीज बोने वाली सुधा भारद्वाज

Sudha Bhardwaj : सुधा ने अपने चरित्र के अनुरूप ही फासीवाद और साम्राज्यवाद की आंखों में घूरते हुए संघर्ष पर जोर दिया और जानबूझकर कर संघर्ष के उन पथरीले रास्तों पर चल पड़ी जो जेल की ओर ही जाता था।

Update: 2021-11-01 08:58 GMT
सुधा भारद्वाज को मिली जमानत

सुधा भारद्वाज के 60वें जन्मदिन पर मनीष आजाद की टिप्पणी

Sudha Bhardwaj। 'संत आगस्टीन' का एक प्रसिद्ध उद्धरण है। वे कहते हैं- 'उम्मीद की दो बेटियां होती है, एक क्रोध और दूसरा साहस। क्रोध इसलिए कि चीजें ऐसी क्यों हैं और साहस इसलिए कि चीजों को बदला जाना चाहिए।' मुझे सुधा (Sudha Bhardwaj) में इन दोनों बेटियों के एक साथ दर्शन होते है।

कुख्यात भीमा कोरेगंव केस (Bhima Koregaon Case) में पिछले 3 सालों से जेल में बंद सुधा भारद्वाज का आज जन्म दिन (1 नवंबर 1961) है। आम तौर से जन्म दिन के दिन व्यक्ति पीछे मुड़कर अपने जीवन का आकलन करता है। यदि सुधा 'नॉर्मल' जीवन में होती तो एक भरे पूरे जीवन के बाद यह वर्ष उनके रिटायरमेंट का होता। 2-4 अकादमिक किताब लिखने की योजना उनके दिमाग मे होती। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर और कई उम्र जनित रोगों के साथ वह आज जेल में है। अभी वह रिटायरमेंट के बारे में नही बल्कि दोबारा जीवन शुरू करने के बारे में सोच रही होंगी।

अभी छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के मजदूरों के कितने ही केस उनका इंतजार कर रहे है, जो उन्होंने वहां के पूंजीपतियों और राज्य सरकार के खिलाफ दायर कर रखे हैं। कितने ही किसानों के केस उनका इंतजार कर रहे हैं, जो उन्होंने छत्तीसगढ़ में चल रहे अन्धाधुन्ध जमीन-दोहन के खिलाफ दायर कर रखा है।

इस विषय पर सुधा ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब 'बर्बर विस्थापन और बहादुराना प्रतिरोध' लिखी है। कितने ही राजनीतिक कैदी (Political Prisioners) उनकी रिहाई का इन्तजार कर रहे हैं। मजदूरों के सैकड़ों घर अपनी सुधा के इंतजार में खुले हुए हैं, जहाँ सुधा उन मजदूर परिवारों के साथ न सिर्फ राजनीतिक बातें करती थी, बल्कि उनके साथ उन्ही की छत्तीसगढ़िया भाषा मे घंटों गपशप भी करती थीं। सुधा जैसे लोगों के लिए कभी भी जीवन शुरू करने का मतलब संघर्ष शुरू करना होता है।

सुधा 80 के दशक के मध्य वर्ग के उस छोटे से हिस्से से आती थीं, जिसकी मजदूरों किसानों के साथ प्रतिबद्धता बहुत अमूर्त किस्म की थी। सुधा इस अमूर्त प्रतिबद्धता को मूर्त रूप देने के लिए ही 80 के दशक के अंत मे शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन में शामिल हो गईं। यहां आकर वह न सिर्फ उन मजदूरों-किसानों के साथ वैचारिक एकजुटता में रही बल्कि उन्ही की तरह का जीवन जीती हुई जीवन और संघर्ष की एकजुटता में भी उनके साथ दृढ़ता से खड़ी रही।

ग्राम्शी जिस 'आर्गेनिक बुद्धिजीवी' की बात करते थे, सुधा उस कसौटी पर सोलह आने खरी उतरती है। इसे एक उदाहरण से और अच्छी तरह समझा जा सकता है। केडिया डिस्टिलरी में काम कर रही मजदूर औरतों के लिए न सिर्फ उन्होंने हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ा और जीता भी बल्कि जब उन मजदूर औरतों को काम से निकाल दिया गया तो उन औरतों के साथ वे खुद भी भूख हड़ताल पर बैठ गयी।

मजदूर आंदोलन में शंकर गुहा नियोगी ने 'संघर्ष और निर्माण' का मशहूर कॉन्सेप्ट रखा था। इसी के तहत मजदूरों के जुझारू संघर्षो के अलावा मजदूरों के श्रम व सहयोग से मजदूरों के लिए अस्पताल और स्कूल खोले गए। लेकिन 1990 के बाद (विशेषकर 2000 के बाद) फासीवाद की आहट और नंगे साम्राज्यवाद के हमलों ने संघर्ष और निर्माण के बीच समन्वय को असंभव बना दिया। बदली परिस्थितियों में शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन में सक्रिय कई लोगो ने 'निर्माण' पर पूरा जोर देते हुए संघर्ष से दूर होते गए। ऐसे लोगो की अंतिम शरणस्थली NGO और चुनाव की भूलभुलैया बना।

सुधा ने अपने चरित्र के अनुरूप ही फासीवाद और साम्राज्यवाद की आंखों में घूरते हुए संघर्ष पर जोर दिया। और जानबूझकर कर संघर्ष के उन पथरीले रास्तों पर चल पड़ी जो जेल की ओर ही जाता था। जहाँ उनके बहुत सारे साथी इस रास्ते पर चलते हुए पहले ही पहुच चुके थे। लेकिन क्या दुनिया का कोई भी क्रांतिकारी परिवर्तन जेलों को बाईपास कर सका है?

सुधा उन लोगो में से है, जो उम्मीद के बीज को जमीन में अपने साहस और संघर्षो से बोते है। कभी कभी प्रतिकूल मौसम देखकर ये बीज जमीन में और गहरे चले जाते है, लेकिन मौसम के अनुकूल होते ही अंखुआने लगते है। आज तक के इतिहास में बसंत को आने से कौन तानाशाह रोक सका है।

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