क्या संघी गिरोह की आसुरिक शक्ति से लड़कर ममता बंगाल का किला बचा पाएगी?

ममता बनर्जी इस बार नंदीग्राम से चुनाव लड़ना चाहती हैं और इसके कई कारण हैं। सबसे पहले वह एक किसान समर्थक नेता की छवि को सशक्त बनाना चाहती हैं, जिसने 2011 में उनको सत्ता में पहुंचा दिया था। नंदीग्राम के लोगों के साथ ममता बनर्जी के मजबूत संबंध से इनकार नहीं किया जा सकता है।

Update: 2021-02-02 09:37 GMT

[ Photo Edited By Nirmal Kant ]

 वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार का विश्लेषण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का समय करीब आ रहा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भाजपा से एक कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसने राज्य विधानसभा में 294 सीटों में से 200 जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ऐसा दावा बार-बार कर रहे हैं। एक के बाद एक तृणमूल सरकार के धाकड़ मंत्री व नेताओं के पाला बदल कर भाजपा का दामन थामने का सिलसिला तृणमूल की राह को कठिन बनाता जा रहा है। ममता बनर्जी ने "बंगाल को भाजपा से बचाओ" के चुनावी नारे के साथ बंगाल के किले की रक्षा के लिए 600 रैलियों की योजना बनाई है।

अप्रैल महीने मे पश्चिम बंगाल मे विधान सभा चुनाव होने की प्रबल संभावना है। राज्य की सभी राजनीतिक दल विधान सभा चुनाव की तैयारी मे जुट गए हैं। वर्तमान राजनीतिक माहौल को ध्यान मे रखते हुए इस बार राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉंग्रेस का सीधा मुक़ाबला केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से होना तय माना जा रहा है।

पिछले दिनों ममता बनर्जी ने घोषणा की कि वह पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेंगी। बनर्जी की घोषणा से बंगाल की राजनीति में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। कई लोगों ने उनके कदम को एक राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक और विधानसभा चुनावों से पहले अहम निर्णय बताया।

नंदीग्राम पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भूमि-अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों के दो केंद्रों में से एक था, जिसमें अन्य सिंगुर था। इस आन्दोलन ने राज्य में 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीतने में मदद की और वाम मोर्चा सरकार के 34 साल के शासन को समाप्त किया।

2007 में पुलिस फायरिंग में चौदह ग्रामीण मारे गए, जो नंदीग्राम में इंडोनेशिया के सलीम समूह के रासायनिक केंद्र के लिए तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे।

नंदीग्राम हिंसा ने टीएमसी के मा, माटी, मानुष (माता, मातृभूमि और लोग) नारे को जन्म दिया जो चुनाव अभियानों में इस्तेमाल किया गया था। यही वह जगह थी जिसने ममता बनर्जी को किसान समर्थक राजनीतिक शख्सियत में बदल दिया।

ममता बनर्जी सात बार सांसद रह चुकी हैं। जब उनकी पार्टी ने 2011 का चुनाव जीता था तब उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। राज्य की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दक्षिण कोलकाता में उस साल बाद में एक विधानसभा उपचुनाव में भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा - जहां वह रहती हैं - और 50,000 से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की। 2016 के विधानसभा चुनावों में बनर्जी ने 25,000 से अधिक मतों के अंतर से सीट बरकरार रखी।

ममता बनर्जी इस बार नंदीग्राम से चुनाव लड़ना चाहती हैं और इसके कई कारण हैं। सबसे पहले वह एक किसान समर्थक नेता की छवि को सशक्त बनाना चाहती हैं, जिसने 2011 में उनको सत्ता में पहुंचा दिया था। नंदीग्राम के लोगों के साथ ममता बनर्जी के मजबूत संबंध से इनकार नहीं किया जा सकता है।

ऐसे समय में जब किसान राष्ट्रीय राजधानी में कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं, बनर्जी एक बार फिर से अपनी छवि को किसानों के अधिकारों के रक्षक के रूप में स्थापित करना चाहती हैं। नंदीग्राम बनर्जी को कृषि संकट के समाधान के लिए अपने संकल्प पर जोर देने के लिए सही मंच प्रदान करता है।

दूसरी बात यह है कि वह भाजपा के साथ सीधे मुकाबला करना चाहती है जिसने पिछले महीने टीएमसी नेता और नंदीग्राम के विधायक सुवेन्दु अधकारी को अपने पाले में खींचकर उनकी पार्टी को भारी झटका दिया था।

अपने फैसले के माध्यम से वह अधिकारी के साथ सीधे सामना करने से नहीं कतरा रही है और दूसरी ओर अधिकारी को उनकी ही सीट पर चुनौती दे रही हैं। यह अधिकारी परिवार के समर्थन के बिना पूर्वी मिदनापुर जिले में टीएमसी की प्रासंगिकता सुनिश्चित करेगा। सुवेंदु, अपने पिता सिसिर अधिकारी और भाई दिब्येंदु अधिकारी के साथ (दोनों टीएमसी सांसद हैं) पूर्वी मिदनापुर और इसके आस-पास के जिलों में मतदाताओं पर बहुत प्रभाव रखते हैं।

भाजपा को अब नंदीग्राम में बनर्जी को हराने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ेगा क्योंकि 1989 के लोकसभा चुनावों के बाद ममता को बंगाल में एक भी चुनाव में शिकस्त नहीं मिली है।

तीसरा, बनर्जी ने अपनी घोषणा के साथ एक सेनानी के रूप में भी अपनी छवि का परिचय दिया है। बंगाल में भाजपा के दबाव में होने के बावजूद, बनर्जी भगवा पार्टी को साहस पूर्वक मुक़ाबला कर रही हैं। उन्होंने भाजपा को अपनी पूरी चुनावी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया है। उन्होंने पार्टी का सांगठानिक रूप से भी कायाकल्प किया है और पार्टी के नेताओं को अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए एक संदेश भेजा है।

दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि बनर्जी भवानीपुर के अलावा किसी अन्य सीट से अपनी जीत सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है, जहाँ वह हाल ही में भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना कर रही है। 2019 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी ने 3,000 मतों के मामूली अंतर से विधानसभा क्षेत्र में जीत हासिल की, जो पार्टी के लिए चिंता का विषय है।

भाजपा के पास एक विशाल चुनावी मशीनरी है, जिसे उसने राज्य में काम पर लगा दिया है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, हर जगह तृणमूल विधायकों को अपने पक्ष में करना, खासकर उन्हें, जिनकी ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है। वह उन्हें सावधानी के साथ चुन रही है और दबाव का इस्तेमाल करते हुए उनकी नाराजगी से खेल रही है, यानी उन्हें अपने पाले में लाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रही है। 2017 में उसने ममता बनर्जी के करीबी मुकुल राय को अपने पक्ष में मिलाया था। वर्ष 2020 में शुभेंदु अधिकारी और उनके भाई भाजपा में शामिल हुए। आने वाले दिनों में तृणमूल से निकलने वालों की संख्या बढ़ सकती है। हाल के दिनों में कई मंत्रियों ने कैबिनेट बैठकों में भाग नहीं लिया है, जो ममता के लिए चिंता की बात है।

Tags:    

Similar News