Yogi के खोखले दावों की पड़ताल: बुनियादी शिक्षा सुधार में पश्चिम बंगाल और महाराष्ट से भी पीछे छूटा Uttar Pradesh

Reality of Yogi Adityanath education reform: शिक्षा में सुधार के तमाम सरकारी दावे यूपी में झूठा साबित हो रहा है। बेरोजगारी दर पांच वर्ष में दोगुनी होने के बाद अब बुनियादी शिक्षा में सुधार की कोशिश को भी बड़ा झटका लगा है।

Update: 2021-12-18 07:23 GMT

रिपोर्ट कार्ड में मुख्यमंत्री योगी ने किए कई झूठे दावे

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

Reality of Yogi Adityanath education reform: शिक्षा में सुधार के तमाम सरकारी दावे यूपी में झूठा साबित हो रहा है। बेरोजगारी दर पांच वर्ष में दोगुनी होने के बाद अब बुनियादी शिक्षा में सुधार की कोशिश को भी बड़ा झटका लगा है। बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता सूचकांक में बड़े राज्यों के रूप में पश्चिम बंगाल व छोटे राज्यों में केरल पहले पायदान पर रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश की गिनती पश्चिम बंगाल व महाराष्ट समेत अन्य राज्यों के तुलना में पांचवें स्थान पर है, जबकि भाजपा सरकार शिक्षा के गुणवत्ता में सुधार के बडे़ दावे करती रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षा से लेकर रोजगार क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के तमाम दावे कर ले पर सच्चाई यही है कि आंकड़ों में हमारी प्रगति बहुत ही निराशा जनक है। मार्च 2017 से अब तक यूपी का बेरोजगारी दर दोगुना हो चुका है। योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में जब प्रदेश की कमान संभाली' तो उस समय बेरोजगारी दर 2.4 प्रतिशत थी, जो कि नवंबर 2021 में 4.8 प्रतिशत हो गई। यह आंकड़ा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडयिन इकॉनोमी ने जारी किए हैं।

हालांकि योगी सरकार का दावा है कि उसके कार्यकाल के दौरान रोजगार पर बहुत काम हुआ है, वहीं बेरोजगारी दर भी कम हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदत्यिनाथ ने 17 सितंबर 2020 को कहा कि वर्ष 2016 में प्रदेश में 17 प्रतिशत से अधिक बेरोजगारी दर थी, वहीं आज यह घटकर मात्र चार से पांच प्रतिशत रह गयी है।

मुख्यमंत्री योगी की यह बात सही है कि अगस्त 2016 में यूपी की बेरोजगारी दर 17.1 प्रतिशत रिकॉर्ड की गई थी, लेकिन यह बात भी सही है कि 19 मार्च 2017 को जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब यूपी की बेरोजगारी दर सिर्फ 2.4 प्रतिशत थी, जो कि नवंबर 2021 में 4.8 प्रतिशत हो गई है यानी दोगुनी। हकीकत यह है कि सरकार रोजगार देने की जगह सिर्फ प्रचार कर रही है। अगर सिर्फ शिक्षक भर्ती की बात करें तो बिहार के बाद सबसे ज्यादा शक्षिकों के खाली पद यूपी में हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 2 लाख 17 हजार पद खाली हैं।

इस बीच बुनियादी शिक्षा में सुधार की हकीकत भी निराशाजनक है। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष 'बिबेक देबरॉय' की ओर से 16 दिसंबर को जारी बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता सूचकांक-2021 के नतीजे यूपी की हकीकत को सामने लाने के लिए काफी है। यह सूचकांक भारतीय राज्यों में दस साल से कम उम्र के बच्चों में बुनियादी शिक्षा की समग्र स्थिति का अवलोकन करता है।

इस रिपोर्ट को 'इंस्टीट्यूट ऑफ कंपिटिटिवनेस' के विशेषज्ञों ने तैयार किया है। सूचकांक को चार श्रेणियों में बांटकर इसका आकलन किया गया है, जिसमें बड़े राज्य, छोटे राज्य, केंद्र-शासित प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों को शामिल किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत में उच्च गुणवत्ता की बुनियादी शिक्षा सुनिश्चित करना बेहद चुनौतीपूर्ण है, लेकिन नामुमकिन नहीं।

सबसे पहले अलग-अलग राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में दस साल से कम उम्र के बच्चों की योग्यताओं को समझने तथा उसके हिसाब से शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत महसूस की गई है। कोरोना महामारी के चलते अन्य सेक्टरों के साथ ही शिक्षा जगत पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। जिसे पूरी तरह पटरी पर आने में अभी लंबा वक्त लग सकता है। ऐसे में यह रिपोर्ट शिक्षा क्षेत्र पर पड़ने वाले असर के मद्देनजर और भी अहम हो जाती है।

जारी सूचकांक के मुताबिक बुनियादी शिक्षा में छोटे राज्यों में झारखंड और बड़े राज्यों में बिहार सबसे पीछे है। जबकि भारत में बुनियादी शिक्षा की समग्र स्थिति की बात करें तो बड़े राज्यों में पश्चिम बंगाल सबसे आगे है। वहीं छोटे राज्यों में केरल पहले पायदान पर है। बच्चों की बुनियादी शिक्षा एवं संख्यात्मकता के मामले में दिल्ली दूसरी सर्वश्रेष्ठ केंद्र-शासित प्रदेश बनकर उभरी है। वहीं, यूपी की बात करें तो सबसे खराब स्थिति वाले बड़े राज्यों में बिहार के बाद उसी का स्थान है। इसी तरह, उत्तराखंड और हरियाणा क्रमशः 55.60 व 52.9 अंकों के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले छोटे राज्यों की सूची में चौथे तथा पाचवें पायदान पर काबिज हैं।

सूचकांक तैयार करने में पांच आधार अपनाया गया है, जिसमें बुनियादी ढांचा, शिक्षा तक पहुंच, स्वास्थ्य की स्थिति, सीखने का स्तर, शासन व्यवस्था को शामिल किया गया है। इसमें पढ़ाई का स्तर बहुत ही चिंताजनक मिला है। राष्ट्रीय स्कोर बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता सूचकांक में 48.38 औसत रहा है। 50 फीसदी से ज्यादा राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों ने इससे कम अंक हासिल किए हैं।

उत्तर प्रदेश इंकलाबी नौजवान सभा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इस बारे में कहते हैं, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार का भाजपा सरकार का दावा खोखला है। बुनियादी शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट होना चिंताजनक है। सरकार नई शिक्षा के नाम पर गुणवत्ता पर जोर देने के बजाय शिक्षा व्यवस्था को बाजार के हवाले करना चाहती है। उधर जूनियर शिक्षक संघ के गोरखपुर मंडल के कोषाध्यक्ष अखिलेश मिश्र की राय में शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्य से मुक्त करने की जरुरत है। यह किए बिना बुनियादी शिक्षा में सुधार की बात करनी बेईमानी होगी।

किस श्रेणी में कौन आगे : बड़े राज्य के क्रमवार सूचकांक

-पश्चिम बंगाल: 58.95 अंक

-तमिलनाडु: 55.49 अंक

-महाराष्ट्र: 53.11 अंक

छोटे राज्यों के क्रमवार सूचकांक

  • -केरल: 67.95 अंक
  • -हिमाचल प्रदेश: 57.36 अंक
  • -पंजाब:56.19 अंक

केंद्र-शासित प्रदेश के क्रमवार सूचकांक

  • -लक्षद्वीप: 52.69 अंक
  • -दिल्ली: 50.74 अंक
  • -पुडुचेरी: 50.08

पूर्वोत्तर राज्यों के क्रमवार सूचकांक

  • -मिजोरम: 51.64 अंक
  • -सिक्किम: 51.54 अंक
  • -मणिपुर: 50.95 अंक

कौन सबसे पीछे


बड़े राज्यों का सूचकांक

-बिहार: 36.81 अंक

-उत्तर प्रदेश: 38.46 अंक

-मध्य प्रदेश: 38.69 अंक

छोटे राज्यों का सूचकांक

-झारखंड: 45.28 अंक

-ओडिशा: 45.58

-तेलंगाना: 46.02

केंद्रशासित प्रदेशों का सूचकांक

  • -लद्दाख: 35.21 अंक
  • -दमन एवं दीव: 43.30 अंक
  • -दादर एवं नगर हवेली: 46.83 अंक

पूर्वोत्तर राज्यों का सूचकांक

  • -अरुणाचल प्रदेश: 36.88 अंक
  • -त्रिपुरा: 37.14 अंक
  • -मेघालय: 41.37 अंक
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