और इस बार वे शोमा को ले गये

Update: 2018-06-28 06:08 GMT

रोती-बिलखती महिला सदस्यों को सहारा देते हुए शोमा ने अपने छोटे से किराए के फ्लैट में आश्रय तो दिया ही, खुद खाना पकाकर उन्हें खिलाया और नागपुर हाइकोर्ट के नामी वकील की सहायता से उनका पक्ष भी न्यायालय के समक्ष रखा...

स्वतंत्र पत्रकार तुषार कांति की नजर में उनकी पत्नी शोमा सेन

जनज्वार। 1985 के बरसात का मौसम था। बॉम्बे यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BJU) के दफ्तर में जाकर पता चला कि उसी शाम वाईएमसीए हॉल में लोकशाही हक संरक्षण समिति ने जनवादी अधिकार के सवाल पर एक सभा का आयोजन किया है। वहाँ मुख्य वक्ता के तौर पर प्रख्यात कानूनविद राम जेठमलानी बोलेंगे। नागपुर और विदर्भ जैसे पिछड़े इलाके से पत्रकारी करने वाले मुझ जैसे उभरते कलमनवीस को जेठमलानी जैसी नामी हस्ती को सुनने की हसरत अनायास ही हुई। हॉल खचाखच भरा था।

पहले वक्ता के तौर पर बम्बई (अब मुंबई) लोकशाही हक संरक्षण समिति की ओर से 24–25 बरस की एक युवती ने निर्दोष अंग्रेजी में जनवादी अधिकार हनन पर एक अनूठा भाषण दिया। इसके बाद राम जेठमलानी बोले। वहाँ लगभग कोई भी मुझे नहीं जनता था, इसलिए मैं लौट आया। वह युवती शोमा ही थी।

अब माओवादी खतरे से राजनीतिक संजीवनी की आस में मोदी जी

करीब दो साल बाद नागपुर में मेरे मित्रों से पता चला कि शोमा नागपुर ही में अध्यापन का काम ढूंढ़ रही है। नागपुर में भी शोमा ने सबसे पिछड़े और दलित लोगों के एकमात्र शिक्षा संस्थान पीपल्स वेल्फेयर सोसाइटी इंदोरा स्थित कॉलेज में अंग्रेजी विभाग में पढ़ाने का काम चुना। इस बीच हमारे बीच प्यार पनपा और 1991 में हमारा विवाह हुआ। वैसे उसे इससे पहले समृद्ध इलाके के लेडी अमृत बाई डागा कॉलेज में नौकरी मिली थी, पर उसने दलित विद्यार्थियों को पढ़ाने का विकल्प चुना।

करीब तीन दशक तक पिछड़े मराठी माध्यम के विद्याथियों में अँग्रेजी साहित्य पढ़ाते हुए कई पीढ़ियों को आत्मविश्वास के साथ जीना सिखाने के बाद पिछले आठ वर्षों से शोमा ‘राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय’ के अंग्रेजी विभाग में सहायक प्रोफेसर के तौर पर काम करते हुए 2004 में ‘साहित्य के प्रति उदरवादी स्त्रीवाद की टीका’ विषय पर अँग्रेजी साहित्य में डॉक्टरल शोध ग्रंथ प्रस्तुत किया।

प्रोफेसर पद के अतिरिक्त उपकुलपति के प्रतिनिधि की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी निभाते हुए विश्वविद्यालय से संलग्न विदर्भ के कोने कोने तक फैले 800 से भी अधिक कॉलेजों में अँग्रेजी विभाग में नियुक्तियों और पदन्नतियों की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी भी निभाई। 2017 से वह अँग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष नियुक्त हुई।

एक अकेडमिशियन के तौर पर तमाम उपलब्धियों के बावजूद शोमा हृदय से मानवाधिकार और जनवादी अधिकारों के देशव्यापी आंदोलन से कभी अलग नहीं हुई। साथ ही वामपंथी स्त्रीवाद की जुझारू कार्यकर्ता भी रही। नागपुर के इंदोरा और जूनी मंगलवारी जैसे बेहद पिछड़े इलाकों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर जुल्म का मुक़ाबला करने को वह महिलाओं को संगठित और प्रेरित करती रही। इसी सिलसिले में नागपुर में “स्त्री चेतना” नामक संगठन ने शोमा के इर्द गिर्द आकार लिया।

डॉक्टर द्वारा निजी नर्सिंग होम में दो नाइट ड्यूटी नर्सों के साथ बलात्कार की घटना हो या दहेज के लिए प्रताड़ित संभ्रांत स्त्रियों के मामले हों, शोमा हर जगह उपस्थित रहती और पीड़ितों को लड़ने की प्रेरणा देती।

भंडारा (गोंडिया) जिले के मंगेझरी गाँव से चौदह आदिवासियों को जब नक्सल विरोधी कार्रवाई के नाम पर पुलिस ने “लापता” कर दिया तो उन परिवारों की रोती-बिलखती महिला सदस्यों को सहारा देते हुए शोमा ने अपने छोटे से किराए के फ्लैट में आश्रय तो दिया ही, खुद खाना पकाकर उन्हें खिलाया और नागपुर हाइकोर्ट के नामी वकील की सहायता से उनका पक्ष भी न्यायालय के समक्ष रखा।

गढ़चिरोली जिले के दूर-दराज के गाँव से सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों को नक्सली होने के आरोप में उनके गाँव और जिले से तीन सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर नागपुर के केंद्रीय कारगार में रखा जाता था। गाँव में उनके परिजन, जाहिर है कि इतनी दूर मुलाक़ात के लिए नहीं आ पाते।

सबसे ज्यादा दलित उत्पीड़न भाजपा शासित राज्यों में

एस्कॉर्ट पुलिस की कमी के बहाने उन्हें महीनों और बरसों तक कोर्ट मे पेश भी नहीं किया जाता। इन राजबंदियों को भी अपनी संस्कृति और अपने पर्यावरण से उखाड़ कर नागपुर कारागार में रखने से जो मानसिक पीड़ा वे झेल रहे थे, वह अमानवीय था। इसके मद्देनजर शोमा ने नागपुर स्थित बम्बई उच्च न्यायालय की खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर कर ऐसे तमाम आदिवासी कैदियों को उन्हीं के जिले में रखने की मांग की जो मंजूर भी कर ली गयी।

इन्हीं सक्रियताओं के चलते शोमा राज्य के आला पुलिस अधिकारियों के नजरों में शूल की तरह चुभती रही।

और फिर 6 जून 2018 की अलसुबह छह बजे एक विशाल पुलिस दल ने हमारे घर पर छापा मारा और इस बार वे शोमा को ले गए। बहाना भीमा-कोरेगाव में दलित सम्मेलन पर भगवा झण्डा धारी गुंडों के हमले ही जांच का था। पर उन हमलावारों पर तो कार्रवाई नहीं हुई और इस सम्मेलन से केवल नैतिक जुड़ाव रखने के जुर्म में उच्च रक्तचाप और गठिया जैसी असाध्य बीमारियों की शिकार उनसठ वर्षीय शोमा को पुणे पुलिस ने अन्य चार बुद्धिजीवियों के साथ गिरफ़्तार कर लिया।

कोर्ट में प्रथम सूचना रपट या अन्य किसी भी दस्तावेज़ में जिसका उल्लेख भी नहीं किया गया, वह तथाकथित ‘पत्र’ सीधे भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय प्रधान प्रवक्ता संबित पात्र के हाथों से हो कर गोदी मीडिया में खूब उछाला गया। उस पत्र में कथित तौर पर राजीव गांधी स्टाइल में विस्फोट करने की योजना का उल्लेख था।

इस पत्र पर जब जोरदार जगहँसाई हुई तब अगली कहानी यह कही गई कि ‘जेएनयू’ में पूर्व छात्र नवीन कि स्मृति व्याख्यान माला चलाने कि योजना बनाकर ये कथित “शहरी माओवादी” विद्यार्थियों कि भर्ती करने के प्रयास में थे।

ऐसे हास्यास्पद और काल्पनिक आरोपों के बावजूद शोमा तथा अन्य चार बुद्धिजीवियों को चौदह दिनों तक पुलिस हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया गया। अदालत भी इसके लिए राजी हो गई, क्योंकि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के अलावा जनविरोधी ‘गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून’ (UAPA) की पाँच कठोर धाराओं के तहत उनकी गिरफ्तारी की है।

शोमा आजीवन जनवादी और मानवाधिकार आंदोलन तथा स्त्री मुक्ति आंदोलन में सक्रिय रही। पहले “केवोव” और फिर “डबल्यूएसएस” जैसे अखिल भारतीय आंदोलनों में अग्रिम पंक्ति में रही। सुधीर ढवले (एल्गार परिषद के आयोजक और प्रख्यात प्रगतिशील दलित नेता, मुंबई), सुरेन्द्र गडलिंग (25 वर्षों से मजलूम निर्दोष आदिवासियों और दलितों को कानूनी सहायता पहुंचाते रहे नागपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता), महेश राऊत (प्रधानमंत्री फ़ेलोशिप के अंतर्गत कुछ वर्ष पूर्व तक गढ़चिरोली जिले में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता जो अब सूरजागढ़ लोह अयस्क खदानों के विरोध में उठ खड़े हुए आदिवासी आंदोलन के नेता हैं)।

दिल्ली के प्राध्यापक और शोध छात्र रोना विल्सन (राजबंदियों की रिहाई समिति CRPP के मीडिया सचिव) की भीमा कोरेगाव हिंसा के बहाने की गयी गिरफ्तारी केवल सत्ताधारी वर्ग कि घबराहट और पाँव तले से खिसकती जमीन के अहसास से उपजी है।

ये सभी सामाजिक सरोकार रखने वाले समर्पित कार्यकर्ता हैं जो सरकारी झूठ का पर्दाफ़ाश करते हुए अपनी बेगुनाही जरूर साबित करेंगे।

(स्वतंत्र पत्रकार तुषार कांति शोमा सेन के पति हैं।)

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