अमीरी गरीबी की बढ़ती खाई और राष्ट्रवाद को अफीम की तरह इस्तेमाल करती भाजपा

Update: 2018-01-30 15:23 GMT

वह दिन दूर नहीं, जब एक प्रतिशत आबादी के पास धरती के 99 प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा होगा और 99 प्रतिशत आबादी छद्म राष्ट्रवाद, धार्मिक उन्माद और जातिवाद के ज़हर में घुलकर तिल-तिल मिटने को मजबूर होगी...

शशांक यादव
एमएलसी, उत्तर प्रदेश

आक्सफेम की दावोस सम्मेलन से ठीक पहले रिपोर्ट भारत के लिये एक भद्दे दाग से कम नहीं है। देश की एक प्रतिशत जनता के पास देश की 73 प्रतिशत आमदनी का कब्जा और 58 प्रतिशत सम्पत्ति पर कब्जा आर्थिक असमानता के नये गन्दे कीर्तिमान बना रहा है।

इसे भाग्य और पिछले जन्म का फल बताकर या फिर 99 प्रतिशत जनता को कमचोर बताकर यह पूंजीपरस्त क्लब जीवन को भाग्य भरोसे छोड़ने का माहौल सफलतापूर्वक बना रहा है। अमीर का लगातार अमीर होना और गरीब की आमदनी का लगातार कम होना इस असमानता को निरन्तर बढ़ा रहा है।

जब हम कहते हैं कि यह सरकारी नीतियों और मंशा का परिणाम है तब हमें विकास विरोधी और राष्ट्र विरोधी बताकर हमारी आलोचना की जाती है। बची-खुची कसर गाय, गोबर और पद्मावत की बहस छेड़कर पूरी की जाती है। जब रोजगार के सवाल उठाते हैं तब पकौड़े बनाना सिखाया जाता है, और जब बेरोजगारों की बढ़ती फौज की बात होती है तो बताया जाता है कि 98 प्रतिशत स्नातक एकाउंटेंट बनने लायक भी नहीं हैं।

सवाल उठता है कि यह स्थिति आई क्यों? और पिछले 3 सालों में 2014 के बाद भाजपा की दिल्ली में सरकार आते ही यह असमानता और क्यों बढ़ गयी? इसका बड़ा सीधा सा कारण है। सरकार व्यापार नहीं करेगी, और निजी क्षेत्र को बढ़ावा देगी। पिछले कुछ सालों में 2,36,000 करोड़ रुपए से ज्यादा पूँजीपतियों का कर्जा माफ हो गया, लेकिन किसानों की निरन्तर बढ़ रहीं आत्महत्याओं पर सरकार मौन रही। प्रधानमंत्री मोदी भी कोई ट्विट नहीं कर पाये।

एक उदाहरण पर्याप्त है, भारतीय रेलों को डीजल सप्लाई इण्डियन आॅयल करती थी। सरकारी कम्पनी थी। हजारों लोग रोजगार से जुड़े थे। मुनाफा कमाना ध्येय नहीं था, लिहाजा कर्मचारियों की नौकरी सामाजिक सुरक्षा का हिस्सा होती थी।

पहले तेल के मूल्य को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा गया, ताकि दाम के लिए रोज-रोज सरकारी संस्तुति की जरूरत न पड़े, फिर धीरे से तेल की सप्लाई का ठेका रिलायंस को दिया गया, अब निजी क्षेत्र शुभालय के आधार पर कार्य करता है, वो अकारण क्यों रोजगार देगा। सरकारी मुनाफा प्राइवेट हाथों में गया और नौकरियाँ भी गयीं।

अमीर मेहनत से कम और उत्तराधिकार से ज्यादा बने हैं। हमारे यहाँ अमीरों के क्लब देश का आर्थिक माहौल तय करने की हैसियत में आ गये हैं। सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये की बुलेट ट्रेन जापान के कर्जे से जापान की कम्पनी को उसी की शर्तों पर देकर काम शुरू कर दिया है। यह अगर लाभ का सौदा होता तो निजी क्षेत्र आगे आता, लेकिन यह काम निजी क्षेत्र में लाबिंग करके सरकारी पैसे से शुरू करवा दिया। जब ट्रेन चलने लगेगी, तब उस पर सरकार का कोई नियन्त्रण नहीं होगा।

सरकार सिर्फ कर्ज को डालर में अदा करेगी। जो ब्याज 1 प्रतिशत सुनने में लगता है, उसी को जब डाॅलर में अदा किया जायेगा और रुपया इसी तरह गिरता रहा तो रुपये के सम्बन्ध में यह ब्याज की दर 12 प्रतिशत से भी ऊपर जायेगी। निजी कम्पनी, बैंक फायदे में, कर्ज अदायगी का बोझ आम आदमी पर पड़ेगा, जाहिर है कि वह ज्यादा टैक्स देकर और गरीब बनेगा।

सवाल उठ सकता है कि सरकारी क्षेत्र घाटे में रहते हैं और निजी क्षेत्र बेहतर सुविधा देते हैं। निजी क्षेत्र ने डाॅक्टरों को लाॅलीपाप दिया, सरकारी अस्पतालों में डाॅक्टरों ने आना बन्द कर दिया। बढ़ती आबादी के चलते डाॅक्टरों पर जनता का बोझ बढ़ता गया।

सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में पैसे कम करती गयी और खर्च भी अस्पतालों की बिल्डिंग और मशीन में लगाती रही। डाॅक्टरों की भर्ती नहीं कर पायी। नतीजा आम आदमी निजी क्षेत्र से इलाज कराने को मजबूर हुआ, उसकी और जेब कटी।

हम दुनिया में स्वास्थ्य पर सबसे कम जीडीपी का प्रतिशत खर्च करने वाले देशों में आ गये हैं। आने वाले दिनों में माहौल बनेगा कि सरकारी अस्पताल सफेद हाथी हो गये हैं। इनको निजी क्षेत्र में दिया जाये, और फिर गरीब एक बार और गरीब बनेगा, क्योंकि सरकार स्वास्थ्य की सुरक्षा की गारन्टी नहीं दे पा रही है।

यही हाल शिक्षा का कर दिया गया। सरकारें इस मद में लगातार कटौती करके निजी क्षेत्रों को बढ़ावा दे रही हैं। चमक-दमक और कान्वेन्ट संस्कृति के स्कूलों की बाढ़ सरकारी प्राइमरी स्कूलों को खा गयी है। इस क्षेत्र में भी हम सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक हैं और यह खर्च लगातार कम हो रहा है।

मनरेगा की भाजपा ने खूब मजाक उड़ाई थी, लेकिन साबित हो गया है कि ग्रामीण क्षेत्र में फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं है।

बड़े पूँजीपतियों के कर्जों के चलते बैंकों का एनपीए धीरे-धीरे 8 लाख करोड़ रूपये छूने की स्थिति में है। सरकार के बजट का 35 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सरकारी कर्जों के ब्याज की अदायगी में जा रहा है। देश में बढ़ता साम्प्रदायिक घृणा का माहौल नये निवेश को रोक रहा है और सरकार निवेश की चाहत भी नहीं रखती।

यह सारे कारक मिलकर रोजगार सृजन को रोक रहे हैं। नये रोजगार, नहीं, तकनीक के सहारे कामगारों की संख्या कम करने की प्रवृत्ति आर्थिक असमानता को बढ़ा रही हैं। देश के आम मजदूर की 50 साल की कुल कमाई को हमारे देश के एक पूँजीपति मात्र 17 दिनों में बकौल आॅक्सफेम कमा लेते हैं।

सरकार अगर इसी प्रकार पूँजीपतियों को पालने के लिए उनके कर्जों की माफी और बैंकों से कर्जा दिलाने के लिए बैंकों को रुपए 2.50 लाख करोड़ का पैकेज देती रही तो यकीन मानिये, कि आम आदमी ऐसे ही गरीबी के दलदल में फँसा रहेगा।

सरकार ईमानदार दिखने के लिए कभी-कभार आयकर के छापे डालती है, तो कभी बैंकिंग कर्ज वसूली के लिए ट्रिब्यूनल बनाती है। यह सब सिर्फ जनता को खुश रखने के चोंचले हैं। जब इनसे काम नहीं चलता है तो मीडिया का इस्तेमाल करके तयशुदा पटकथा के अनुसार 3 तलाक, भागवत जी का झण्डारोहण और पद्मावत का विरोध जैसे मसले उठवाती है। कभी अल्पसंख्यकों को विकास का बाधक मानने वालों को महिमा मण्डित करती है और चालाकी से रोजी-रोटी के सवाल दाब देती है।

इन समस्याओं से निबटा जा सकता है। दक्षिण कोरिया, चीन, मलेशिया, ब्राजील जैसी हमारी तरह की कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाओं ने समाजवादी नारे ‘दवा-पढ़ाई, मुफ्ती हो, रोटी-कपड़ा सस्ता हो’ तथा ‘बेरोजगारों को काम दो, नहीं तो रोजगार भत्ता दो’ के आधार पर कुल राष्ट्रीय जीडीपी का 6-6 प्रतिशत शिक्षा और स्वास्थ्य में लगाया, युवाओं को रोजगार सुरक्षा की गारन्टी दी, और अमीरों पर उत्तराधिकार टैक्स लगाया।

परिणाम सामने है। इन देशों ने चमत्कारी प्रगति की है। हमारे देश को विश्व का सबसे युवा देश होने का खिताब मिला है। 65 प्रतिशत से ज्यादा 35 साल से कम उम्र की आबादी है, लेकिन रोजगार ठप्प हैं। अपराधों में पकड़े जाने वाले 80 फीसदी से ज्यादा 35 साल से कम उम्र के नवयुवक हैं। सरकार ने श्रम आधारित उद्योगों से आँखें मूँद ली हैं।

अखिलेश यादव ने 22 महीने में एक्सप्रेस-वे बनाकर न केवल श्रमशक्ति को बढ़ाया, बल्कि स्थानीय व्यापार, पर्यटन और कृषि क्षेत्र को भी मजबूती प्रदान की। उधर दिल्ली ने नोटबन्दी और जीएसटी की आधी-अधूरी तैयारी को राष्ट्रवाद के छौंक में डालकर जनाक्रोश को ठण्डा किया, लेकिन बेरोजगार की फौज खड़ी कर उन्हें पकौड़े बनाने तक सीमित कर दिया।

अभी भी वक्त है लघु और मध्यम उद्योगों को ताकत मिले, नौजवानों को रोजगार की गारन्टी मिले, समाज कल्याण की योजनाओं पर सरकार खर्च बढ़ायें। अमीरों के उत्तराधिकार पर टैक्स लगाये, ताकि शीर्ष पर इकठ्ठा पैसा किसी तरह रिसकर गरीबों की जड़ों तक पहुँच सके।

अगर पाकिस्तान, ईरान और ईराक का उदाहरण देकर 3 तलाक पर कानून बनाया जा सकता है तो अमेरिका में 40 प्रतिशत, जापान में 55 प्रतिशत और कोरिया में 50 प्रतिशत उत्तराधिकार टैक्स कानून का उदाहरण देकर अमीरों की पूँजी का छिड़काव गरीबों तक किया जा सकता है। वरना वह दिन दूर नहीं, जब एक प्रतिशत आबादी के पास धरती के 99 प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा होगा और 99 प्रतिशत आबादी छद्म राष्ट्रवाद, धार्मिक उन्माद और जातिवाद के ज़हर में घुलकर तिल-तिल मिटने को मजबूर होगी।

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