कौन पत्थरबाज़ सज़ा का हक़दार है और कौन पुरस्कार का

Update: 2018-12-08 14:43 GMT

भगवा उन्माद में बौराये युवा के हाथ का पत्थर रामनामी है। इन्हीं पत्थरों के पुल पर 2019 की चुनावी जलधि पार करनी है, जबकि कश्मीरी युवा के हाथों में जो पत्थर है वो बग़ावत के पत्थर हैं। वो निराशा, अवसाद और विपन्नता की कीमत पर उपजे विक्षोभ के पत्थर हैं....

सुशील मानव

जनज्वार। अप्रैल 2017 में वायरल वो वीडियो तो आपको याद ही होगा जिसमें सेना के मेजर लीतुल गोगोई एक कश्मीरी युवक को जीप में बाँधकर कश्मीर की सड़कों पर जुलूस निकालते हैं। 5 दिसंबर से एक दूसरा वीडियो वायरल हुआ है जिसमें सुमित नामक बजरंग दल का एक युवक दोनों हाथों में पत्थर लिए पुलिस टीम पर फेंक रहा है।

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पुलिस की जवाबी कार्रवाई में उस पत्थरबाज़ सुमित के मारे जाने पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 10 लाख का हर्जाना देती है। सिर्फ़ इतना ही नहीं योगी सरकार बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह के हत्यारे दूसरे तमाम पत्थरबाजों को बचाने का जतन करती हुई भी नज़र आती है। मुख्यमंत्री पहली बार मीडिया में मुंह खोलते हैं तो इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की मौत को मॉब लिंचिंग नहीं एक दुर्घटना करार देते हैं।

मुख्यमंत्री के आदेश में भी इंस्पेक्टर के हत्यारों को पकड़ने के बजाय गौकशी करने वालों को पकड़ने पर ज्यादा जोर होता है। एक तीसरा पत्थरबाज़ भी है जो पत्थरों का धंधा करता है। सरकार उस कीमती पत्थरों के व्यापारी को भी हर तरह की सहूलियतों से नवाजती है, उसे पासपोर्ट वीजा देकर विदेशों में सेटल करवाती है। जी हाँ नीरव मोदी की ही बात कर रहा हूँ। एक पत्थरबाज़ को सज़ा और दूसरे पत्थरबाज़ को पुरस्कार, भला ये नाइंसाफ़ी क्यों?

तो क्या पत्थर पत्थर का अंतर होता है या दृष्टि का अंतर ही पत्थर में फर्क़ पैदा करता है। या सोच का अंतर फर्क़ पैदा करता है। या संस्कृति का अंतर फर्क़ पैदा करता है। ये दृष्टि का अंतर आया कहाँ से। इसका एक सिरा राम के यहाँ दिखता है। जहाँ वो एक पत्थर को शीश नवाते हैं क्योंकि वो शिश्नाकार है। जबकि दूसरे पत्थर को पाँव छुआते हैं क्योंकि वो स्त्री के आकार में है। पत्थर-पत्थर का फर्क़ सिर्फ लैंगिक दृष्टिभेद के चलते ही नहीं है, ये जाति-भेद और सांप्रदायिक भेद के चलते भी है। और व्यापारिक भेद के चलते भी।

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पत्थर फेंकने वाला सज़ा का हक़दार है या पुरस्कार का ये उसकी जाति और धर्म पर निर्भर करता है। जैसे बुलंदशहर में पुलिस बल पर पत्थर फेंकने वाला सुमित सरकारी कार्य में बाधा नहीं डालता क्योंकि वो हिंदुत्व के रथ पर सवार होता है। अतः वो पुरस्कार का हक़दार है। और सरकार उसे पुलिस पर पत्थर फेंकने जैसे पुनीत कार्य करते हुए मरने पर दस लाख का पुरस्कार दे देती है।

जबकि कश्मीर में पुलिस या सेना पर पत्थर फेंकने युवा सज़ा के ह़कदार हैं। भले ही वो सेना पर इसलिए पत्थर फेंक रहे हों कि सेना ने उनके दोस्त, भाई, पिता, पति, बेटे को फर्जी में मार दिया हो। भले ही सेना ने किसी लड़की का बलात्कार करके उसे आतंकी बताकर गोली मार दी हो। लेकिन चूँकि कश्मीरी पत्थरबाजों का धर्म दिल्ली की सत्ता के धर्म से अलग है तो वो सज़ा के हक़दार हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भगवा आतंक अपने चरम पर है, और विहिप, बजरंग दल, सनातन संस्था और हिंदू महासभा जैसे अवांछित संगठनों के लोग अक्सर ही समाज का माहौल खराब करने में लगे रहते हैं। खुद रोकथाम में लगी पुलिस की जान का जोखिम बना रहता है, बावजूद इसके यूपी पुलिस रोकथाम का प्रयास करने के लिए पैलेट गन नहीं मुहैया करवाये गए। जबकि कश्मीरी युवकों के खिलाफ़ पैलेटगन का अंधाधुंध इस्तेमाल करने की सेना को इज़ाज़त है?

दरअसल भगवा उन्माद में बौराये सुमित जैसे युवा के हाथ का पत्थर रामनामी पत्थर है। इन्हीं पत्थरों के पुल पर 2019 की चुनावी जलधि पार करनी है। जबकि कश्मीरी युवा के हाथों में जो पत्थर है वो बग़ावत के पत्थर हैं। वो निराशा, अवसाद और विपन्नता की कीमत पर उपजे विक्षोभ के पत्थर हैं।

बेरोज़गार हाथों के पत्थर से सत्ताएं गिरती हैं। जो पत्थर आत्मसम्मान की रक्षा में उठते हैं उनसे ही ये सत्ताएं ख़ौफ़ खाती हैं। जो पत्थर भूख की कीमत पर उठते हैं उन्हीं पत्थरों से सत्ता के किले डगमगाते हैं। शैतान जानता है इन्हीं बेरोज़गार हाथों के पत्थरों से एक दिन शैतान मरेगा। इसीलिए वो बाग़ी, बेरोज़गार पत्थरबाजों को जीप में बाँधकर घुमाता है, जबकि बेदिमाग़ हाथों के पत्थर से रामसेतु बनेगा जिस पर चढ़कर लोक की लंका तबाह की जाएगी।

राम राजा बनेंगे और सीता को जंगल में छोड़ दिया जाएगा। उन्हीं पत्थरों से सीता की मूर्ति बनाकर चौराहे पर देवी बनाकर टाँग दिया जाएगा। नीरव मोदी सा पत्थरों का व्यापारी खोटे पत्थरों को हीरा बताकर मुँह माँगें दामों में बेचेगा और बैंकों का सफाया करके विदेशों में जा बसेगा।

हिंदू निजाम प्रेम के खिलाफ़ गुनाह की मुनादी करवा देगा। सारे बलात्कारी रोमियो स्क्वॉड में भर्ती कर लिए जाएंगे। मजनू को उसी चौराहे पर पत्थरों से मारा जाएगा और लैला रो रोकर गाएगी- “कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को।”

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