Indian Politics : BJP से गठजोड़ करने वाले दलित-पिछड़ी जाति के वो नेता जिनका राजनीतिक अस्तित्व है संकट में

Indian Politics : दलित नेता हाल के सालों में भारतीय राजनीति में कभी उतने हाशिए पर नहीं थे, जितने मौजूदा समय में पहुंच गए हैं।

Update: 2022-04-01 10:19 GMT

ऊपर बाएं से दाएं - प्रकाश आंबेडकर, रामदास अठावले और बाबू सिंह कुशवाहा। नीचे बाएं से दाएं - उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान और मुकेश सहनी। 

नई दिल्ली। भारत में गठजोड़ की राजनीति ( Indian politics ) में नेताओं के उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। इस बीच नया ट्रेंड यह देखने को मिल रहा है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व अन्य राज्यों में कई दलित नेता ( Dalit Leaders ) अचानक हाशिए ( marginalized  )पर चले गए हैं। ऐसे चर्चित राजनेताओं मेें एक या दो नाम नहीं बल्कि कई नाम शामिल हैं। खासतौर से दलित नेता हाल के सालों में कभी उतने हाशिए पर नहीं थे, जितने मौजूदा समय में पहुंच गए हैं।

ऐसे राजनेताओं में अगर हम बिहार से इसकी शुरुआत करें मुकेश सहनी, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, उदय नारायण चौधरी, अर्जुन राय, रमई राम, श्याम रजक अरुण कुमार, नागमणि, वृशिण, ललन पासवान आदि का नाम उभरकर सामने आ जाते हैं। उत्तर प्रदेश से नाम लें तो बाबू सिंह कुशवाहा, उदित राज, चंद्रशेखर आजाद, महाराष्ट्र से रामदास अठावले और प्रकाश आंबेडकर जैसे नेेता भी इसी कटेगरी में आते हैं। इसके अलावा देशभर में कई नाम हैं जो इन दिनों हाशिए पर चल रहे हैं।

इनमें से कुछ नेता अपने-अपने राज्य की राजनीति में हाशिए पर चले गए हैं तो कई नेता चुनाव में अपनी जमीन अब भी तलाश रहे हैं। कुछ नेताओं ने अपना अलग दल तो बना लिया है, लेकिन चुनावी वैतरणी पार करने के लिए उन्हें सहारे की जरूरत है। लिहाजा इसमें कुछ दूसरे दलों में तो कुछ दूसरे गठबंधन में भी अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं। कुछ गठबंधन की राजनीति में बात बिगड़ने से मुख्यधारा की राजनीति से बाहर हो चुके हैं।

Indian Politics : हाशिए पर जाने वाले दलित नेता 

1. मुकेश सहनी

बिहार के दरभंगा जिले के सुपौल बाजार के रहने वाले सहनी 19 वर्ष की आयु में ही पैसा कमाने के लिए मायानगरी मुंबई पहुंच गए। सेल्स मैन की नौकरी से लेकर अपने परिश्रम की बदौलत फिल्म सेट डिजाइन करने वालों के साथ मित्रता कर ली। हिट फिल्म देवदास के सेट तैयार करने के बाद उनकी गिनती चर्चित सेट डिजाइनरों में होने लगी। उसके बाद वो मुंबई से बिहार आ गए और राजनीति में हाथ आजमाया। सहनी की हैसियत बिहार की राजनीति में कम है, लेकिन वे हमेशा चर्चा में बने रहते हैं। वो बहुत कम दिनों के संघर्ष के बाद पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री के पद तक पहुंच गए, लेकिन 500 से कम दिनों के अंदर ही उन्हें ये पद गंवाना भी पड़ा।

2. चिराग पासवान

हाजीपुर से देश के बड़े दलित नेताओं शुमार रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान फिल्मी दुनिया में हाथ आजमाने के बाद राजनीति में आये। 2014 लोकसभा जमुई चुनाव जीतकर सांसद बने। वह 5 नवंबर 2019 से 15 जून 2021 तक अपने पिता की पार्टी लोजपा के अद्दयक्ष भी रहे। बिहार विधानसभा चुनाव 2022 में वो काफी सुर्खियों में रहे। चिराग नीतीश कुमार से सियासी सौदेबाजी में मात खा गए। नीतीश की स्थिति तो कमजोर हुई, लेकिन अब वो खुद राजनीति के हाशिए पर चले गए हैं। यहां तक कि वो लोजपा को भी संभालकर नहीं रख पाये।

3. उपेंद्र कुशवाहा

नीतीश कुमार के साथ ही बिहार में उपेंद्र कुशवाहा का भी बहुत तेजी से उभार हुआ। वह मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे लेकिन 10 दिसंबर 2018 को टीम मोदी से अलग हो गए। उसके बाद उनका ग्राफ गिरता गया। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी से बात नहीं बनने पर एआईएमआईएम के साथ मिलकर चुनाव लड़े। कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी एक भी सीट नहीं जीत पाई। हाल ही में उन्होंने जेडीयू में अपनी पार्टी आरएलएसपी का विलय कर दिया। अब पुराने तेवर में लौटने की उनकी उम्मीद न के बराबर है।

4. रमई राम

रमई राम ने बिहार विधानसभा चुनाव में अब तक नौ बार जीत दर्ज की। इतना ही नहीं, वह करीब 20 साल तक राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों में मंत्री भी रहे। बिहार विधानसभा में अबतक सबसे अधिक समय तक प्रतिनिधित्व करने वाले नेता हैं। अब वो बिहार की राजनीति में उम्र के साथ मिसफिट भी हो गए हैं। वर्तमान में मुख्यधारा की राजनीति से बाहर हैं।

5. बाबू सिंह कुशवाहा

यूपी के दलित नेता बाबू सिंह कुशवाहा बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं। कुशवाहा बहुजन समाज पार्टी के लिए लंबे समय तक काम कर चुके हैं। उन्हें सालों तक मायावती का सबसे करीबी माना जाता था। वे विधान परिषद के सदस्य और दो बार कैबिनेट मंत्री रहे। एक दौर में कुशवाहा बहुजन समाज पार्टी में दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति थे। लखनऊ में दो चिकित्सा अधिकारियों की लगातार हत्याओं के बाद सब कुछ बदल गया और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान में वह जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष हैं। यूपी विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

6. उदित राज

उदित राज का जन्म इलाहाबाद के राम नगर में हुआ था। उन्होंने 2014 में ईडियन जस्टिस पार्टी का विलय भाजपा में कर दिया था। उदित राज 2014 में संपन्न लोकसभा चुनाव में उत्तर-पश्चिम दिल्ली से भाजपा सांसद बने थे। वह एससी—एसटी संगठनों के अखिल भारतीय संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। 1988 में यूपीएससी ने भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुना था। वर्तमान में वो कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

7. रामदास अठावले

रामदास अठावले राज्यसभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और दो कार्यकालों के लिए पंढरपुर निर्वाचन क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व किया हैं। 1974 में दलित पैंथर आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की वजह से चर्चा में आये। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के साथ उनके घनिष्ठ संबंध के कारण उनके आईएनसी के साथ भी घनिष्ठ संबंध हैं। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं। वे मोदी सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री हैं पर उनकी सियासी हैसियत सामान्य सांसद और विधायकों से ज्यादा नहीं है।

8. प्रकाश आंबेडकर

प्रकाश आंबेडकर भारतीय राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील हैं। वे बहुजन महासंघ के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। 2018 में उन्होंने वंचित बहुजन आघाड़ी स्थापना की। वे संसद के दोनोँ सदन राज्यसभा व लोकसभा के सांसद रह चुके हैं। वे भारत रत्न डॉ. भीमराव आम्बेडकर के पौत्र हैं। इसके बावजूद प्रकाश आंबेडकर को यूपीए में जगह नहीं मिली। उनकी वंचित बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन औवैसी की एमआईएम से है।

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