कोरोना से कई गुना अधिक खतरनाक वायु प्रदूषण, पिछले साल हुईं 16.7 लाख मौतें

कोरोना से देश में अब तक 1.46 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है, दूसरी तरफ पिछले वर्ष भारत में 16.7 लाख मौतें अकेले वायु प्रदूषण के कारण हुईं, जो देश में कुल मौतों का 18 प्रतिशत है, मगर न सरकार सचेत हुई और न ही जनता में इसके लिए कोई सुगबुगाहट हुई...

Update: 2020-12-28 12:21 GMT

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

जनज्वार। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कोविड 19 से देश में अब तक 1.46 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है। मौत के ये आंकड़े डराते हैं। कोविड 19 के विस्तार को रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, लोग अपने स्तर पर सावधानी बरत रहे हैं, पूरे समाज का व्यवहार बदल गया और अब लोग बेसब्री से इसके टीके का इंतज़ार कर रहे हैं।

दूसरी तरफ पिछले वर्ष भारत में 16.7 लाख मौतें अकेले वायु प्रदूषण के कारण हो गईं, जो देश में कुल मौतों का 18 प्रतिशत है, पर न ही सरकार सचेत हुई और ना ही जनता में इसके लिए कोई सुगबुगाहट है। इन आंकड़ों को हाल में ही प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल, लांसेट में प्रकाशित किया गया है।

लांसेट में प्रकाशित लेख के अनुसार वर्ष 2019 में अकेले वायु प्रदूषण के कारण देश की अर्थव्यवस्था को लगभग 2716 अरब रुपये का नुकसान उठाना पड़ा, यह राशि देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.36 प्रतिशत है। सरकारें जितना वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का दिखावा करती हैं, उतनी ही यह समस्या विकराल होती जाती है।

वर्ष 2017 से लगातार पर्यावरण मंत्री, प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय वायु प्रदूषण पर वक्तव्य दे रहे हैं, तरह-तरह का दिखावा कर जनता को बता रहे हैं कि वायु प्रदूषण से जल्दी ही मुक्ति मिल जायेगी, पर हालत लगातार खराब होती जा रही है। वर्ष 2017 में वायु प्रदूषण के कारण देश में कुल 12.4 लाख मौतें दर्ज की गईं थीं, यह संख्या वर्ष 2019 तक बढ़कर 16.7 लाख मौतों तक पहुँच गई।

वायु प्रदूषण के कारण फेफड़े के कैंसर, ह्रदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटीज, गर्भावस्था की परेशानी और सांस संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। हाल में ही प्रकाशित वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे प्रदूषित 10 शहरों में से 6 भारत में हैं।

वायु प्रदूषण से मौत के भयावह आंकड़े समय-समय पर अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से उजागर होते हैं, पर पिछले वर्ष लैंसेट में ही प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण ने अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। अमीर अपने वाहनों और उद्योगों से लगातार हवा में जहर घोलते है, जिसका खामियाजा गरीब भुगत रहे हैं।

देश में भले ही वायु प्रदूषण मापने का एक सशक्त तंत्र विकसित किया गया हो पर यह पूरा जाल शहरों तक ही सीमित है। वायु प्रदूषण के मापने का एक भी उपकरण ग्रामीण क्षेत्र में नहीं है। एक उदाहरण के तौर पर इसे समझने के लिए पंजाब में खेतों में तथाकथित कृषि अपशिष्ट के जलने से दिल्ली के प्रदूषण को याद कीजिये।

पंजाब और हरियाणा में ग्रामीण इलाका बहुत बड़ा है, पर किसी भी ग्रामीण इलाके में कितना वायु प्रदूषण है, किसी भी सरकारी संस्था को नहीं पता है। दूसरी तरफ, अम्बाला, पटियाला, अमृतसर, लुधियाना, जालंधर, पानीपत और सोनीपत जैसे शहरों में वायु प्रदूषण के स्तर के आंकड़े रोज प्रकाशित किये जाते हैं। जाहिर है, जब ग्रामीण क्षेत्रों के वायु प्रदूषण से सम्बंधित कोई आंकड़े ही नहीं होंगें, तब इन क्षेत्रों के लिए कोई योजना भी नहीं होगी।

तमाम शहरों में अब बाजारों पर और व्यस्त चौराहों के पास बड़े-बड़े एयर प्युरिफ़ाइयर स्थापित किये जा रहे हैं, पेड़ों पर पानी का छिड़काव किया जा रहा है, और तोप के आकार वाली वाटर स्प्रे गन का उपयोग किया जा रहा है, फिर भी यह नहीं पता कि इन सब तरीकों के बाद वायु प्रदूषण में कितनी कमी आ रही हैं।

पहले भी प्रदूषण का स्तर खतरनाक श्रेणी में रहता था, और इतने तामझाम के बाद भी वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक है। इनमें से किसी भी प्रदूषण रोकने के उपाय का उपयोग देश के किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में नहीं किया गया है, और ना ही वहां पहुँचने की कोई योजना है।

गाँव के स्वास्थ्य से सम्बंधित भी पूरे आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे वहां के प्रदूषण के स्तर का स्वास्थ्य से सम्बंधित आकलन किया जा सके। बड़े शहरों तो फेफड़े के मरीजों की संख्या बढ़ते ही एक समाचार बन जाता है, पर गाँव के बारे में तो पता ही नहीं होता। वैसे तो जीवन से जुड़े हरेक मसले पर पूंजीवाद हावी है, पर प्रदूषण के मुद्दे पर तो पूंजीवादी सोच पूरे तरह से हावी है, इसमें गरीबों का और ग्रामीण क्षेत्रों का कहीं नामोंनिशान भी नहीं है।

शहरों की गरीब आबादी भी हमेशा प्रदूषण दूर करने के उपायों से छुट जाती है। दिल्ली में पिछले 5 वर्षों के दौरान घरों में लगाए जाने वाले एयर फ़िल्टर का कारोबार कई गुना बढ़ गया है, पर झुग्गी-झोपडी बस्तियों में आबादी को उसी प्रदूषित हवा में सांस लेना है, जो जानलेवा भी है।

श्रमिकों और गरीबों के लिए भी प्रदूषण उतना ही घातक है, जितना अमीरों के लिए। अमीर इसके असर से बच सकते हैं पर गरीब को तो इसे झेलना ही है। अमीर तो वातानुकूलित कमरे में बैठकर प्रदूषण को अपने से दूर कर सकता है, पर गरीबों के लिए तो रोजगार के अवसर ही ऐसे जगहों पर हैं जहां प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक रहता है, जैसे निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं और सड़क के किनारे की दुकानें।

पिछले चार वर्षों से दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ते ही निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं रोक दी जाती हैं, जिससे श्रमिकों को ही नुकसान उठाना पड़ता है।

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