'भले ही लाशों के टीले बन जाएँ, पर लॉकडाउन नहीं लगाऊंगा'

पिछले वर्ष ट्रम्प के जाने तक भारत, अमेरिका, ब्राज़ील और ब्रिटेन में घुर दक्षिणपंथी और छद्म राष्ट्रवादी सरकार एक साथ ही थी और इन चारों देशों की सरकारों के मुखिया बहुत गहरे मित्र भी हैं....

Update: 2021-04-28 15:30 GMT

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

भले ही हजारों लाशों के टीले बन जाएँ, पर लॉकडाउन नहीं लगाऊंगा – यह हमारे प्रधानमंत्री जी के विचार तो हैं, पर यह कथन उनके घनिष्ट मित्र ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का है और आजकल यूनाइटेड किंगडम में इस वक्तव्य पर खूब चर्चा की जा रही है। हमारे प्रधानमंत्री जी को भी पिछले वर्ष मार्च में कोरोना से लड़ने का पहला हथियार समझ में आया था, और अब जबकि कोविड 19 से अनगिनत लाशें बिछ रही हैं, तब लॉकडाउन कोई विकल्प ही नहीं नजर आ रहा है।

बोरिस जॉनसन ने यह वक्तव्य नवम्बर 2020 में मंत्रियों की बैठक में चार सप्ताह के दूसरे लॉकडाउन की घोषणा के समय, तीसरे लॉकडाउन से सम्बंधित प्रश्न के जवाब में दिया था। इसका खुलासा लम्बे समय तक उनके प्रमुख सलाहकार रहे डोमिनिक कम्मिंस ने किया है और इनके अनुसार सबूत के तौर पर उस समय की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है| हालां कि प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के बाद भी वहां तीसरे चरण का लॉकडाउन जनवरी में लगाया गया था।

आश्चर्य यह है कि ब्रिटेन में यह मुद्दा ऐसे समय तूल पकड़ रहा है जिस समय दुनिया में सबसे तेज टीकाकरण का कार्यक्रम चल रहा है| वहां की 60 प्रतिशत से अधिक टीके के लिए योग्य आबादी को टीका लगाया जा चुका है। हालांकि सबसे पहले डेली मेल द्वारा इस वक्तव्य को उजागर करने के बाद से प्रधानमंत्री और दूसरे वरिष्ठ मंत्री लगातार इससे इनकार करते रहे हैं, पर अब बोरिस जॉनसन के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी है। वहां यह भी मांग की जा रही है कि कोविड 19 से निपटने में तथाकथित सरकारी लापरवाही की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए| कोविड 19 से यूनाइटेड किंगडम में लगभग 130000 मौतें हो चुकी हैं।

पिछले वर्ष ट्रम्प के जाने तक भारत, अमेरिका, ब्राज़ील और ब्रिटेन में घुर दक्षिणपंथी और छद्म राष्ट्रवादी सरकार एक साथ ही थी और इन चारों देशों की सरकारों के मुखिया बहुत गहरे मित्र भी हैं। इन चारों की नीतियाँ भी एक जैसी हैं। यह महज संयोग नहीं था कि कोविड 19 का कोहराम भी सबसे अधिक इन देशों में ही देखा जा रहा है। घुर दक्षिणपंथी और छद्म राष्ट्रवादी सरकारें किस तरीके से काम करती हैं, इसे इन चारों नेताओं की नीतियों से आसानी से समझा जा सकता है।

इन चारों देशों में सरकारों को लाखों मौतों से कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि इस मौत के तांडव के बीच भी उन्हें चुनावों और अपनी ताकत बढाने के ही ध्यान रहता है। इन सबके बीच भारत की स्थिति थोड़ी सी अलग है – अमेरिका, ब्राज़ील और ब्रिटेन में वैज्ञानिकों ने कोविड 19 से सम्बंधित अधिकतर फैसले लिए, जबकि हमारे देश में हमारे प्रधानमंत्री ने सभी फैसले बिना किसी से सलाह लिए ही किये।

यह एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है कि एक वक्तव्य पर भी प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा माँगा जा रहा है, दूसरी तरफ हमारे प्रधानमंत्री आज भी गर्व से मन की बात सुना रहे हैं, और कोविड 19 से होने वाली मौतों को भी विपक्ष पर थोप रहे हैं। कोई लोकतंत्र और कितना मर सकता है, यह देखना और भुगतना अभी बाकी है।

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