डॉ भीमराव अंबेडकर के इस्लाम के प्रति विचार

Dr Bhimrao Ambedkar : डाॅ. अम्बेडकर ने लिखा कि केवल एक जमीन के टुकड़े पर रहने से ही देश नहीं बनता, बल्कि रहने वाले लोगों में यदि आपस में घृणा का भाव है तो वह साथ साथ किसी मजबूरी में तो रह सकते हैं, पर लंबे समय तक यह संभव नहीं है....

Update: 2022-10-01 12:01 GMT

डाॅ. योगेश मित्तल की टिप्पणी

Dr Bhimrao Ambedkar : डॉ भीमराव अम्बेडकर एक विद्वान, दूरदृष्टा व अपने विचारों में स्पष्टता रखने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने भारत को गहराई से समझा और जब धर्म के आधार पर भारत के विभाजन की मांग मुस्लिम लीग द्वारा उठाई गई, उन्होंने उस मांग के पीछे के कारणों को जानने का प्रयास किया और अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में अपने विश्लेषण को प्रकाशित किया।

उन्होंने देखा भारत विविधताओं से भरा देश है, अनेक भाषाएं, अनेक वेशभूषा, अनेक पूजा पद्धति, अनेक प्रकार के खान पान के होते हुए भी कोई भी समुदाय भारत से अलग होने की बात नहीं करता था। किसी छोटे समूह द्वारा कभी यह मांग की भी जाती थी तो उसको किसी बड़े समूह का समर्थन प्राप्त नहीं होता था।

अंबेडकर का कहना था मुस्लिमों का भाई भाई वाला भाव केवल मुस्लिमों के लिए ही है, यह बात और पुख्ता हुई जब खिलाफत आन्दोलन चला जो की पूर्णतः इस्लामिक आन्दोलन था जिसका भारत से कोई लेन देन नहीं था। उसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोग खुल कर हिस्सा ले रहे थे, जिसका एक मात्र उद्वेश्य तुर्की पर खलीफा का राज्य पुनः स्थापित करना था।

मुस्लिम लीग को भारत के अधिकांश मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान बनाने की बात न मानने पर डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा कर दी और 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे मनाया गया जिसमें 4000 से अधिक हिंदुओ की बंगाल में हत्या कर दी गई। डाॅ. अम्बेडकर ने लिखा कि केवल एक जमीन के टुकड़े पर रहने से ही देश नहीं बनता, बल्कि रहने वाले लोगों में यदि आपस में घृणा का भाव है तो वह साथ साथ किसी मजबूरी में तो रह सकते हैं, पर लंबे समय तक यह संभव नहीं है।

डॉ. अम्बेडकर ने इतिहास के उन पन्नों को उद्धृत किया जिसमें इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा भारत की जनता पर किए गए भयंकर अत्याचारों का वर्णन है। कितने मन्दिर तोड़ दिए गए, उसकी जगह मस्जिदें खड़ी हो गईं, मंदिरों के धन को लूट लिया गया, स्त्री व पुरुषों पर भयंकर अत्याचार हुए, उन्हें गुलाम के रूप में अरब ले जाया गया।

अंबेडकर ने साफ तौर पर लिखा मुगलों का आक्रमण करने का कारण केवल लूट नहीं था, बल्कि गैर मुस्लिमों को बलात इस्लाम धर्म कबूल कराना था जो कबूल न करे उसकी सजा मौत थी। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया है कि लालच देकर भी इस्लाम कबूल करवा लिया जाता था। उस समय कुरान इस्लाम के मानने वाले कुछ ही लोगों को मिल पाती थी, डॉ अम्बेडकर को यदि कुरान मिल गई होती तो वह उसमें से भी ऐसी आयतों को अवश्य ही उद्धृत करते, जिसमें इस्लाम को किसी भी तरह से फैलाने का हुक्म है और गैर मुस्लिम को किसी भी प्रकार मुसलमान बनाने अन्यथा उन्हें मार देने का हुक्म है।

उन्होंने अपनी पुस्तक में डाॅ. टाइटस एक अमरीकी इतिहासकारद्ध के लेखन से यह उद्धृत किया कि 'मोहम्मद गौरी जिसने कि मोहम्मद गजनी का स्थान लिया था, ने अजमेर पर कब्जा करने के लिए मूर्ति वाले मंदिरों को तोड़ दिया और उसकी जगह मदरसे और मस्जिदें खड़ी कर दी।' पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में डाॅ टाईटस का लिखा कई जगह उद्धृत किया गया, एक स्थान पर लिखा है कि 'कुतुब उद दीन ऐबक ने हजारों मन्दिर तोड़ दिए और उनकी नींव पर मस्जिदें खड़ी कर दीं। मंदिरों से मिले पत्थरों से दिल्ली की जामा मस्जिद बनाई गई और उसकी दीवारों पर कुरान खुदवा दी गई, 27 मंदिरों के पत्थरों से यह मस्जिद तैयार की गई।' (Pakistan or the Partition of India, page 41)

सुल्तान फिरोज शाह के एक लेख को उजागर किया गया है जिसमें उन्होंने लिखा है कि 'जो हिंदू नए मन्दिर बनाने का प्रयास करते थे, जो कि पैगंबर के नियम के विरुद्ध था, उसको ढहा दिया जाता था, व उन काफिर नेताओं को मार दिया जाता है या सड़कों पर नंगा करके घुमाया जाता था।' शाहजहां के काल में लिखे गए बादशाह नामा को भी उद्धृत करते हुए लिखा है कि 'अकबर के समय बनारस में जिसको कि काफिरों का गढ़ माना जाता था, बहुत सारे मन्दिर बनने शुरू हुए पर अधूरे ही रह गए, अकबर के फरमान से वो सभी मन्दिर तोड़ दिए गए, बताया गया कि इलाहाबाद क्षेत्र में 76 मंदिरों को तोड़ दिया गया।' " (Pakistan or the Partition of India, page 42)

धर्म परिवर्तन को लेकर डॉ टाईटस के इस लेख को भी डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है कि 'कुतुब दीन ऐवक जिसकी प्रतिष्ठा मंदिरों को तोड़ने को लेकर मोहम्मद जैसी थीए ने 12वीं सदी के अंत व 13वीं सदी के शुरू में हिंदुओं के मुस्लिम में धर्मान्तरण को पुरस्कार से जोड़ दिया। इसमें एक घटना कोइल ;अलीगढ़द्ध की है, जिसमें जो पुरस्कार के लालच में इस्लाम में आ गए उन्हें छोड़ दिया गया और सभी को तलवार से काट दिया गया।' (Pakistan or the Partition of India, page 43)

उस समय का दर्द बयां करना अत्यन्त कठिन है फिर भी सत्य को उजागर करना भी एक कर्तव्य है। हिंदुओं पर अत्यधिक कर लगाए जाते थे जिससे कि वो आर्थिक रूप से समृद्ध न हो पाएं। डॉ टाईटस के शब्दों में 'मोहम्मद के समय काफिरों का केवल कत्ल ही नहीं किया जाता था व उनके मंदिरों को ही नहीं तोड़ा जाता था बल्कि उनके धन को लूट लिया जाता था और उन लोगों को गुलाम बना लिया जाता था । उन सुंदर पुरुष और महिलाओं को गुलाम बना कर गजनी भेज दिया गया, जो लगभग 5 लाख थे।' (Pakistan or the Partition of India, page 43-44)

सवाल ये उठता है इतने बड़े कत्लेआम, इतनी बड़ी लूट, मंदिरों का टूटना, मंदिरों की लूट, जजिया कर, इतना बड़ा अपमान, इससे हमने क्या सीखा, हमने जो भी सीखा पर डाॅ. अम्बेडकर मुस्लिम मानसिकता को समझ गए, इसीलिए लंबे समय तक हिंदुओं में जातिवाद के कारण अपमानित होते हुए भी उन्होंने पिछड़े वर्ग के लोगों को इस्लाम कबूल करने की सलाह नहीं दी, बल्कि स्वयं भी बौद्ध हो गए और अपने पिछड़े वर्ग के साथियों को भी बौद्ध धर्म अपनाने की सलाह दी।

उनका विचार था कि आरक्षण के माध्यम से धीरे धीरे पिछड़े वर्गों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी तो वह सब दुबारा से देश की मुख्यधारा में शामिल हो जायेंगे। जबकि प्राचीन भारतीय इतिहास में कहीं अस्पृश्यता का जिक्र नहीं है, जन्म आधारित जातिगत व्यवसाय की अनिवार्यता भी प्राचीन भारतीय इतिहास में कहीं दिखाई नहीं देती, परंतु ये कहीं न कहीं समाज के कुछ घटकों ने व सत्ताधारी शासकों ने स्वार्थ वश समाज में इस विकृति को पोषण दिया। हम डॉ अम्बेडकर के ऋणी हैं जिन्होंने वस्तुस्थिति को समझ कर समाज को एक दिशा दी, एक बहुत बड़े जन समूह को इस्लाम में जाने से बचा लिया और पिछड़ों को मुख्य धारा में वापिस लाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को बनाया।

(कंप्यूटर विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े रहे योगेश मित्तल पिछले 33 साल से लेखन में सक्रिय हैं।)

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