Poetry On Chowkidar: कोई लुटेरा भी चौकीदार हो सकता है और बेच सकता है सारा देश

Poetry On Chowkidar: चौकीदार के सन्दर्भ में कवितायें कम हैं, पर हमारे देश में हाल के वर्षों में सबसे चर्चित कविता रही है – अमेरिकी महिला कवि मिरियन वेडर (Miriyam Wedder) की कविता, चौकीदार| मूलतः अंग्रेजी में लिखी कविता का अनुवाद बहुत लगों ने किया है, पर यहाँ अविनाश दास द्वारा लिया गया अनुवाद प्रस्तुत है

Update: 2021-11-21 15:34 GMT

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट

Poetry On Chowkidar: कुछ वर्ष पहले तक चौकीदार एक शिष्ट और शालीन पेशा था, पर अब इस शब्द के अर्थ बदल चुके हैं – वैसे तथाकथित न्यू इंडिया में बहुत सारे शब्दों के अर्थ बिलकुल विपरीत समझ में आते हैं| चौकीदार के जागते राहू की आवाज और डंडे की थाप का समवेत स्वर कहीं खो गया है, क्योंकि आज का चौकीदार कैमरा और टीवी के परदे से कभी ओझल होता ही नहीं| उसे जागते रहो की आवाज देने की जरूरत ही नहीं रही, क्योंकि पूरा देश ही गहरी नींद में चला गया है, बस डंडे की कर्कश आवाज लगातार सुनाई पड़ती है|

चौकीदार के सन्दर्भ में कवितायें कम हैं, पर हमारे देश में हाल के वर्षों में सबसे चर्चित कविता रही है – अमेरिकी महिला कवि मिरियन वेडर (Miriyam Wedder) की कविता, चौकीदार| मूलतः अंग्रेजी में लिखी कविता का अनुवाद बहुत लगों ने किया है, पर यहाँ अविनाश दास द्वारा लिया गया अनुवाद प्रस्तुत है| चौकीदार कविता में चिल्लाता है, सब ठीक है| जब देश में सब डूब रहा हो तब भी कई चौकीदार सब चंगा है, का जाप करते हैं.

चौकीदार/मिरियन वेडर/अविनाश दास

तँग-सँकरी गलियों से गुज़रते

धीमे और सधे क़दमों से

चौकीदार ने लहराई थी अपनी लालटेन

और कहा था — सब कुछ ठीक है|

बन्द जाली के पीछे बैठी थी एक औरत

जिसके पास अब बचा कुछ भी न था बेचने के लिए

चौकीदार ठिठका था उसके दरवाज़े पर

और चीख़ा था ऊँची आवाज़ में — सब कुछ ठीक है|

घुप्प अन्धेरे में ठिठुर रहा था एक बूढ़ा

जिसके पास नहीं था खाने को एक भी दाना

चौकीदार की चीख़ पर

वह होंठों ही होंठों में बुदबुदाया — सब कुछ ठीक है|

सुनसान सड़क नापते हुए गुज़र रहा था चौकीदार

मौन में डूबे एक घर के सामने से

जहाँ एक बच्चे की मौत हुई थी

खिड़की के काँच के पीछे झिलमिला रही थी एक पिघलती मोमबत्ती

और चौकीदार ने चीख़ कर कहा था — सब कुछ ठीक है|

चौकीदार ने बिताई अपनी रात

इसी तरह

धीमे और सधे क़दमों से चलते हुए

तँग-सँकरी गलियों को सुनाते हुए —

सब कुछ ठीक है|

सब कुछ ठीक है|

शहनाज इमरानी की कविता, मोहल्ले का चौकीदार, में हमारे बचपन के चौकीदार के जीवन का और उसकी समस्याओं का जीवंत वर्णन है|

मोहल्ले का चौकीदार/शहनाज इमरानी

अपने हाथ का तकिया बना कर

अक्सर सो जाता है

अपनी छोटी-छोटी आँखे और चपटी सी नाक लिए

सब को हाथ जोड़ कर सर झुकाता है

नाम तो बहादुर है पर डर जाता है

ख़ुद को साबित करने के लिए

चौकन्ना हाथ में लिए लाठी

उसे पटकता है ज़मी पर

चिल्लाता है ज़ोर से 'जागते रहो'

अपनी चौकन्नी आँखों का

एक जाल-सा फैलाता है

फिर भी सड़क का कोई कुत्ता बिना भौंके

निकल ही जाता है

हर महीने लोगों के दरवाज़े खटखटाता है

कुछ दरवाज़े तो पी जाते हैं उसकी रिरियाहट को

कुछ देते है आधा पैसा

कुछ अगले महीने पर टाल देते हैं

मेमसाब घर जाना है

माँ बहुत बीमार है

इस बार तो पूरा पैसा दे दो

और मेमसाब कुछ सुने बगैर

दरवाज़ा बन्द कर के कहती है

छुट्टा नहीं हैं फिर आना ।

जनकवि का शताब्दी वर्ष और मेरे मोहल्ले का चौकीदार, नामक कविता अरुण चन्द्र राय ने लिखी है| इसमें जनकवि मुक्तिबोध के शताब्दी वर्ष के बहाने बताया गया है कि जनकवि अनेक हुए, जनता की समस्याओं को समझाने वाले भी बहुत हुए, पर कविताओं से समाज नहीं बदला. कवितायें बुद्धिजीवियों के बीच ही रहीं, जनता तक नहीं पहुँचीं|

जनकवि का शताब्दी वर्ष और मेरे मोहल्ले का चौकीदार/अरुण चन्द्र राय

मुक्तिबोध हुए हैं

हिन्दी के बड़े कवि

उनका शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है

स्कूलों में, कालेजों में, विश्वविद्यालयों में

संस्थानों में

कुछ लोग कहते हैं कि

उनसे भी बड़े कवि थे त्रिलोचन, नागार्जुन और कई अन्य नाम लेते हैं वे

इनकी कविताओं से सरकारें हिल जाया करती थीं

सुनाते हैं विश्वविद्यालय के लोग मँचो से

यह भी सुनाते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था डर जाती थी

वे सब कहाए जनकवि, मज़दूरों के कवि, लोककवि

उनकी कविताओं से डरते-डरते

पूँजीपतियों ने लील लिए जंगल, पहाड़ और नदियाँ

कब्ज़ा कर लिया सरकारों पर, संस्थानों पर, विश्वविद्यालयों पर

उन्होंने खड़े कर लिए समानान्तर संस्थान, विश्वविद्यालय, कालेज और स्कूल

और उनके शिष्य करते रहे गोष्ठियाँ, सेमीनार, बहस

निकालते रहे पत्रिकाओं के विशेषाँक

अपने मोहल्ले के चौकीदार से, जो कि आया है इन्ही कवियों के गाँव की तरफ़ से

पूछता हूँ कवियों के नाम , उनका हालचाल तो अनमने ढंग से मुस्काता है

जवाब में वह गाता है कबीर के दोहे और तुलसी दास की चौपाइयाँ|

अवधेश्वर प्रसाद सिंह की कविता, पूछिए जरा इनसे दाल क्यों काला हुआ, सामाजिक व्यवस्था को दर्शाती एक सशक्त कविता है|

पूछिए जरा इनसे दाल क्यों काला हुआ/अवधेश्वर प्रसाद सिंह

पूछिये इनसे ज़रा दाल क्यों काला हुआ।

भाय से बढ़कर यहाँ आज क्यों साला हुआ।।

पत्थरों के नोंक से तब शिकारी थे यहाँ।

नोंक की करके नकल आज ये भाला हुआ।।

लेखनी के जोर से रोज खाना खा लिया।

आज वह ही तो यहाँ जात का लाला हुआ।।

शोर चौकीदार का हो रहा है सब जगह।

फिर यहाँ क्यों पूछिये पंग घोटाला हुआ।।

चोर बोले जोर से शोर में वादे दबे।

आज क्यों वोटर गले फूल का माला हुआ।।

चौंकिये मत देखिये तथ्य को भी जानिये।

झूठ से सच को दबा झूठ मतवाला हुआ।।

राष्ट्रीय जनता दल ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर वर्ष 2019 में चौकीदार के अलावा सब चौकीदार नामक कविता प्रचारित की थी|

चौकीदार के अलावा सब चौकीदार/राष्ट्रीय जनता दल

यौन शोषण वाला भी चौकीदार!

दंगाई भी चौकीदार!

हत्यारा भी चौकीदार!

तड़ीपार भी चौकीदार!

भ्रष्टाचारी भी चौकीदार!

चोर भी चौकीदार!

जूते बरसाने वाला भी चौकीदार!

भगौड़ा भी चौकीदार!

"बिन तलाक" वाला भी चौकीदार!

चौकीदार के अलावा सब चौकीदार

इस लेख के लेखक की एक कविता चौकीदार में आज के दौर का समाज है, जिसमें जाहिर है कोई लुटेरा भी चौकीदार हो सकता है और बेच सकता है सारा देश|

चौकीदार/महेंद्र पाण्डेय

संगठित गिरोह का सरगना

चौकीदार बन बैठा

लूट अब दबे पाँव नहीं होती

नगाड़ों की थाप पर होती है

डंके की चोट पर होती है|

हरेक लूट के बाद चौकीदार

सबसे पहले नजर आता है

पहले के चौकीदारों को जिम्मेदार ठहराता है

अपने आप को दाग साफ़ बताता है

आंसूओ टपकाते हुए लोगों से कहता है

यदि मैं गलत हूँ, चौराहे पर पीटो मुझे

उसे मालूम है

न्याय व्यवस्था, कानून उसकी मुट्ठी में हैं

तभी तो तनकर अब वो

सड़क पर हवाई जहाज से उतरता है

भाड़े के श्रोताओं को बुलाता है

फिर गरीबी की बातें करता है

विकास के सपने दिखाता है

पुराने चौकीदारों पर फब्तियां कसता है

सुना है, जो गलत को गलत साबित करते हैं

मारे जा रहे हैं

बाकी काल कोठरी में बंद हैं

ताजा खबर है, चौकीदार बहरूपिया हो गया है

देश का सबकुछ बिक चुका है

ध्यान से सुनो,

दूर से नगाड़े की आवाज आ रही है

शायद कुछ नीलाम हो रहा है|

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