'UCC के नाम पर सरकार छीनना चाहती है हमारे अधिकार' उत्तराखण्ड के राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं-पत्रकारों-बुद्धिजीवियों ने लिखा जनता को खुला खत
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाले विभागों और व्यवस्थाओं को मजबूत करने कीे बजाय, सरकार यूसीसी के रूप में एक असंवैधानिक, दमनकारी और खतरनाक कानून लायी है। इसके द्वारा अधिकारियों की मनमानी और समाज में नफरत को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन जनता को इससे कोई लाभ नहीं मिलने वाला है...;

Uniform Civil Code लागू करेंगे धामी, लेकिन क्या राज्य बना सकता है ऐसा कोई कानून, जानिए क्या है नियम
Uniform Civil Code (UCC) : उत्तराखण्ड के दर्जनों राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं-पत्रकारों-बुद्धिजीवियों ने राज्य की जनता के नाम खुला खत लिखा है और कहा है कि यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड Uniform Civil Code) के नाम पर धामी सरकार हम सबके अधिकार छीन लेना चाहती है।
पत्र में लिखा है, हम उत्तराखंड के अनेक, अलग-अलग जन संगठन एवं राजनीतिक दल हैं। हम आपके संज्ञान में एक गंभीर प्रश्न लाना चाह रहे हैं। उत्तराखंड वह धरती है, जहाँ पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, जयानंद भारती और ऐसे अनेक नायकों ने इंसानियत, लोकतंत्र, समानता और आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान की। हममें से अनेक लोग उन्हीं सपनों को लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी शामिल थे।
मगर अब संस्कृति बचाने के नाम पर इन्हीं महान सिद्धांतों के विपरीत एक ऐसा कानून लाया गया है, जिससे न सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के, बल्कि सारे उत्तराखंड के निवासियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हमें याद रखना चाहिये कि कैसे नौ साल पहले देश की जनता को धोखे में कर नोटबंदी लागू की गई थी। काला धन खत्म करने के नाम पर पूरे देश को लाईन में खड़ा कर सामान्य परिवारों की जिन्दगी तबाह कर दी गई थी, मगर तमाम दावों के उलट काला धन की असली जड़ों को कोई नुकसान नहीं हुआ। हमारा मानना है कि इस नये यूसीसी कानून का भी वैसा ही नतीजा निकलने वाला है।
पढ़िए और समझिये
‘यह कानून न सांवैधानिक है और न ही समान है’: संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार पूरे भारत के नागरिकों के लिए ही समान नागरिक संहिता बन सकती है। इसे सिर्फ एक राज्य में नहीं लाया जा सकता है। धारा 3(ङ) के तहत यह कानून उत्तराखंड के सभी निवासियों पर लागू होगा, चाहे वे देश में कहीं भी रह रहे हों, जबकि संविधान के अनुसार किसी भी राज्य का कानून सिर्फ उस राज्य के सीमाओं के अंदर लागू हो सकते हैं। यह कानून एक समान संहिता भी नहीं है। अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के बाहर रख दिया गया है, जिसका मतलब यह है कि पूरा जौनसार बावर क्षेत्र इस कानून से बाहर रहेगा। गोद लेने के लिए अभी भी अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग कानून लागू होगा। इस कानून द्वारा ‘हिन्दू यूनाइटेड फैमिली’ प्रणाली को जारी रखने की अनुमति दी गयी है, जो सिर्फ एक ही धर्म के लिए है।
इस कानून से भ्रष्टाचार बढ़ेगा : इस कानून द्वारा कई सामान्य बातों को अपराध बना दिया गया है। धारा 7 एवं नियम 8 के अनुसार 26.03.2010 से पहले किये गये विवाहों का पंजीकरण छह महीने के अंदर कराना होगा; उस तारीख के बाद और कानून लागू होने तक किए गए विवाहों का पंजीकरण के लिए भी छह महीने का समय है; और कानून लागू होने के बाद जो भी विवाह होगा, उसका पंजीकरण साठ दिन के अंदर कराना होगा। यही सारे विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य है, चाहे वह कितने भी पुराने हो। पंजीकरण न करना को अपराध बनाया गया और सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभों को बंद करने की संभावना भी है। नियम 8(1)(ग) के तहत अगर किसी के मोबाइल नंबर, पता, ईमेल, धर्म में बदलाव होता है तो उसका पंजीकरण करना भी अनिवार्य है। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ या तलाक का पंजीकरण न करना भी अपराध है। वास्तविकता में अनपढ़, बुजुर्ग, गरीब या ग्रामीण लोगों के लिए इस प्रक्रिया को पूरा करना लगभग असंभव होगा। कई पति पत्नी बगैर तलक के लंबे समय अलग अलग रह रहे हैं, और उनको भी इसकी वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे गैरज़रूरी कामों को अपराध को घोषित कर यह कानून भ्रष्ट अधिकारियों और पुलिस को सामान्य लोगों को परेशान करने और उनसे रिश्वत माँगने का रास्ता बना रहा है।
यह कानून दमनकारी है : इस कानून के द्वारा लोगों की निजता पर गंभीर हमला किया गया है। हमारे संविधान के अनुसार हर वयस्क को अपनी मर्जी से रहने का हक है, लेकिन इस कानून के तहत हर परिवार और व्यक्ति की निजी जानकारी अब सरकार, पुलिस और तीसरे पक्षों के पास भी होगी। किसी भी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के पंजीकरण पर रजिस्ट्रार को पुलिस को सूचित करना होगा और ‘जाँच’ करनी होगी। मकान मालिकों को भी जानकारी दी जाएगी। नियम 7(1)(ग) के तहत किसी भी शादी के पंजीकरण पर माता-पिता को भी जानकारी देना जरूरी है। उत्तराखंड में पहले भी अंतर्जातीय रिश्तों के कारण लोगों की हत्यायें हो चुकी हैं। हाल के वर्षों में कथित अंतरर्धार्मिक संबंधों के बहाने अनेक नफरती और हिंसक अभियान हुए हैं, जिनमें सैकड़ों बेकसूर लोगों पर हमले हुए हैं। इस कानून के कारण ऐसे अपराधों में वृद्धि होगी। एक फ्लैट या रहने के स्थान पर जगह साझा करने वाले छात्रों या सहकर्मियों को भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा। जो महिलायें हिंसक या शराबी पतियों से भागकर कहीं और रहने लगी हैं, उन्हें भी इसके द्वारा परेशान किया जा सकता है। वैसे भी ऐसे प्रावधानों की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि किसी भी प्रकार के रिश्तों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के अधिकार पहले से ही कानूनी रूप में सुरक्षित हैं (निम्नलिखित बिंदुओं को पढ़ लें)। कुल मिलाकर यह कानून स्त्रियों की निजता, उत्तराधिकार और जीवनसाथी चुनने के अधिकार इत्यादि को नियंत्रित करने के साथ ही उन्हें घरों के भीतर कैद करने की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
इस कानून में गैरज़रूरी प्रावधान हैं : ‘घरेलू हिंसा रोकथाम अधिनियम 2005’ द्वारा ‘लिव इन रिलेशनशिप’ या विवाह में रहने वाली महिलाओं पर हिंसा करना पहले से ही गंभीर अपराध बनाया गया है। लेकिन हमारे राज्य में इस कानून को अमल में लाने के लिए बनाई गयी व्यवस्था बहुत कमजोर है (आखिरी बिंदु को पढ़ लें)। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में पैदा हुए बच्चों को भी अधिकार दिए गये हैं। नई शादियों का पंजीकरण पहले से ही अनिवार्य है। इन सारे बातों के लिए किसी नये कानून की जरूरत नहीं थी।
उत्तराधिकार को लेकर : यह कानून मुस्लिम कानून के प्रगतिशील प्रावधान को भी खत्म करता है। खासतौर पर ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ किसी व्यक्ति को अपनी मृत्यु पर अपनी संपत्ति के एक तिहाई से अधिक के लिए वसीयत करने की अनुमति नहीं देता है। इस कानून में इसको खत्म कर दिया गया है। अब पुरुषों को अपनी पत्नियों या बेटियों को विरासत से वंचित करने की पूरी छूट होगी। इसके अलावा वसीयत केवल ऑनलाइन पंजीकरण द्वारा की जा सकती है जिसके कारण बड़े-बुजुर्गों पर दबाव बना कर संपति हड़पने के मामले बढ़ेंगे।
यह कानून भेदभावपूर्ण है : यह कानून इस्लाम की कुछ परम्पराओं के बारे में बात करना भी अपराध बनाता है, जिनमें वे परम्परायें भी शामिल हैं जो महिला विरोधी नहीं हैं। जैसे आपसी तलाक के लिए खुला या मुबारत प्रावधान (धारा 32)। लेकिन किसी भी अन्य धर्म की किसी प्रथा को अपराध नहीं बनाया गया है, चाहे वे महिला विरोधी हों या न हों। गोद लेने की प्रक्रिया में यह भी अंतर है कि बाकी समुदायों के लोगों को ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ द्वारा दी गयी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा, लेकिन हिन्दू परिवारों के लिए अभी भी अलग कानून होगा जिसमें प्रक्रिया आसान है। ऐसे भेदभावपूर्ण प्रावधानों से अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न होगा।
स्पष्टता का अभाव : यह कानून स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता है कि किस प्रकार के कार्य को विवाह की मान्यता मिलेगी और न यह कहता है कि अगर विवाह पंजीकृत नहीं है तो वह वैध नहीं है। इस अस्पष्टता से विवाद पैदा हो सकते हैं। हिंदू संयुक्त परिवारों के लिए उत्तराधिकार के प्रावधान भी स्पष्ट नहीं हैं।
साथियो, सच्चाई यह है कि भारत में कोई भी ऐसा समुदाय नहीं है, जहाँ पर महिलाओं को बराबर का हक मिलता हो, और न ही कोई ऐसा समुदाय है जिसमें महिलाओं को हिंसा और उत्पीड़न का सामना न करना पड़ता हो। यह भी ध्यान रखना होगा कि यह कानून एक ऐसी सरकार द्वारा लाया जा रहा है, जिसने घरेलू हिंसा की घटनाओं पर कार्यवाही करने के लिए स्थापित किए गए वन-स्टॉप सेंटरों एवं महिला हेल्पलाइन को बेहद कमजोर कर दी है। राज्य में वन अधिकारों की मान्यता न होने, भूमि पर अधिकार से वंचित रहने, सुरक्षित रोजगार न मिलने, कल्याणकारी योजनाओं में कटौती होने एवं बढ़ते हुई अपराधों से महिलायें सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाले विभागों और व्यवस्थाओं को मजबूत करने कीे बजाय, सरकार यूसीसी के रूप में एक असंवैधानिक, दमनकारी और खतरनाक कानून लायी है। इसके द्वारा अधिकारियों की मनमानी और समाज में नफरत को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन जनता को इससे कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
इसलिए साथियो, हम आह्वान करना चाहते हैं कि हम सब इस कानून का विरोध कर हमारे संवैधानिक अधिकार, भारत की विविधता एवं हर समुदाय में महिलाओं की सुरक्षा एवं समान अधिकार के लिए संघर्ष करे।
निवेदक
मुनीष कुमार - समाजवादी लोक मंच
राजीव लोचन साह - उत्तराखंड लोक वाहिनी
कमला पंत, चन्द्रकला, निर्मला बिष्ट, इत्यादि - उत्तराखंड महिला मंच
डॉ SN सचान, राष्ट्रीय सचिव - समाजवादी पार्टी
समर भंडारी, राष्ट्रीय कौंसिल सदस्य - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
राजेंद्र पुरोहित, राज्य सचिव - भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)
इंद्रेश मैखुरी, राज्य सचिव - भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा - ले)
शंकर गोपाल, विनोद बडोनी, राजेंद्र शाह, इत्यादि - चेतना आंदोलन
रज़िया बैग, पूर्व अध्यक्ष - उत्तराखंड बार कौंसिल
डॉ रवि चोपड़ा - उत्तराखंड इंसानियत मंच
इस्लाम हुसैन, Adv हरबीर सिंह कुशवाहा एवं डॉ विजय शंकर शुक्ला - सर्वोदय मंडल उत्तराखंड
हीरा जंगपांगी - महिला किसान अधिकार मंच
भोपाल - क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन
नरेश नौडियाल, महासचिव एवं दिनेश उपाध्याय - उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी
तरुण जोशी - वन पंचायत संघर्ष मोर्चा
भुवन पाठक, अजय जोशी एवं शंकर बर्थवाल - सद्भावना समिति उत्तराखंड
याकूब सिद्दीकी - उत्तराखंड नुमाइंदा संगठन
लताफत हुसैन - तंजीम ए रहनुमा ए मिल्लत
ख़ुर्शी अहमद - जमीयत उलेमा ए हिन्द
राकेश अग्रवाल - सामाजिक कार्यकर्ता, देहरादून
आरण्य रंजन - सामाजिक कार्यकर्ता, खाड़ी
स्वाति नेगी - स्वतंत्र पत्रकार
एवं राज्य के अन्य संगठन और साथी