जनता का कुछ भला हो या न हो पर मोदी-योगी की सूरत नजर आनी चाहिए हरेक पोस्टर पर, प्रचार पर टिका पूंजीवाद और राजनीति

विज्ञापनों में भूखों को रोटी, बेरोजगारों को नौकरी, गरीबों और समृद्धि, समाज में शांति और महिलाओं को समानता दिखाकर आश्वस्त किया जाता है कि देश में कोई समस्या नहीं है। इसके बाद भी अगर कोई समस्या तो किसी को नजर आती है तो वह निश्चित तौर पर अर्बन नक्सल है, टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य है या देशद्रोही...

Update: 2023-10-31 07:19 GMT

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

The capitalism and politics, both trust on advertisements for keeping the public in dark. दिल्ली में तमाम जगह उत्तर प्रदेश सरकार का पोस्टर लगा है, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ लिखा है – पाई पाई से गरीब की भलाई। यह बात दूसरी है कि इस पाई पाई से करोड़ों रुपये सरकार ने जनता को यह बताने के लिए खर्च कर दिए कि वह जनता के लिए प्रतिबद्ध है। दरअसल यह प्रचार का जमाना है – जनता का कुछ भला हो या न हो पर मोदी जी और योगी आदित्यनाथ की सूरत हरेक पोस्टर पर नजर आनी चाहिए।

प्रचार पूंजीवाद की देन है। घटिया से घटिया उत्पाद धुआंधार प्रचार के बाद बाजार पर छा जाता है। पान मसाला के 5 रुपये के पैकेट के लिए तीन महंगे अभिनेता साथ में आते हैं। अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर भी पान मसाला का प्रचार करते नजर आते हैं। यही पूंजीवाद है – जहाँ जहर का निर्माता भी उसे विज्ञापनों में अमृत बताकर बाजार में उतारता है तो दूसरी तरफ जिन्हें इस जहर के बारे में मालूम है वे भी चन्द पैसों के लिए परदे पर मुस्कराते हुए इसे अमृत बताते हैं। अब राजनीति भी प्रचारों तक सिमट कर रह गयी है। उत्पादों के प्रचार तो समाचार पत्रों के पन्नों तक या फिर टीवी के परदे पर थोड़ी देर तक दिखाई देते हैं, पर सत्ता का प्रचार तो इनसे आगे बढ़कर लाइव टेलीकास्ट होने लगता है और दिनभर हरेक समाचार चैनल पर दिखाया जाता है।

अब सत्ता द्वारा घोषित हरेक योजना, हरेक दावा या फिर हरेक घोषणा पूंजीवाद की तर्ज पर एक उत्पाद के तौर पर प्रस्तुत की जाती है। पूंजीवादी उत्पाद में मॉडल अलग-अलग विज्ञापनों में अलग-अलग होते हैं। इसमें भी कुछ अपवाद हैं, जैसे पातंजलि के अधिकतर उत्पादों के प्रचार में रामदेव रहते हैं। पर, सत्ता के विज्ञापनों में तो एक ही मॉडल की तस्वीर पिछले लगभग 10 वर्षों से नजर आ रही है और भाषा भी लगभग एक ही है – धन्यवाद मोदी जी वाली।

जिस तरह पूंजीवाद तमाम अंधाधुंध मुनाफ़ा कमाकर कुछ दिनों के लिए छूट का ऐलान कर देती है ठीक उसी तर्ज पर प्रधानमंत्री जी भी अब सामान्य तरीके से कुछ नहीं करते, बल्कि जनता को उपहार देते हैं, सौगात देते हैं। अब तमाम परियोजनाएं जनता की जरूरतें नहीं बल्कि प्रधानमंत्री जी की सौगात हैं। देश की 81 करोड़ जनता को प्रधानमंत्री जी अत्यधिक गरीबी और बेरोजगारी में इसलिए रखते हैं, क्योंकि उन्हें 5 किलो अनाज का सौगात दिया जा सके। देश के करोड़ों बेरोजगारों में से महज 51 हजार को नौकरी भी एक राजनीतिक उत्पाद है जिसके प्रचार के लिए लाइव टेलीकास्ट किया जाता है और सडकों के किनारे और चौराहों पर धन्यवाद मोदी जी के पोस्टर लगाए जाते हैं।

संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण बिल के संसद द्वारा पारित होने के बाद इसे भी एक बड़े राजनीतिक उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके विज्ञापनों में प्रधानमंत्री जी महिला सांसदों के साथ मुस्कराते, वी के आकार में हाथों की उंगलियाँ किये खड़े नजर आ रहे हैं। यह एक घटिया राजनीतिक उत्पाद का रंगीन विज्ञापन है, क्योंकि इस चित्र में जितने भी मुस्कराते चहरे हैं वे सभी समाज में महिलाओं को पीछे धकेलने में व्यस्त हैं।

प्रधानमंत्री जी को यदि राजनीति में महिलाओं की भागेदारी बढ़ानी है तो फिर संसद के आरक्षण का इंतज़ार क्यों करना है – बीजेपी की लोकसभा या विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों की लिस्ट फाइनल करने में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ही शामिल रहते हैं तो फिर इन उम्मीदवारों में ही 33 प्रतिशत महिलायें क्यों नहीं रहती हैं? दूसरी तरफ देश की कोई महिला सांसद ऐसी नहीं है जो महिलाओं पर अन्याय के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाती हो। यह विज्ञापन भी पान मसाला और गुटखा के विज्ञापन जैसा ही है, जिसमें प्रचार करने वाला इसकी तारीफ़ तो करता है पर इसे खाता नहीं है।

पूंजीवाद में उत्पादों का प्रचार महज एक छलावा होता है और उत्पाद की वास्तविकता नहीं बताता। राजनैतिक विज्ञापन तो पूंजीवादी विज्ञापनों से भी बड़ा छलावा हैं। इन विज्ञापनों में भूखों को रोटी, बेरोजगारों को नौकरी, गरीबों और समृद्धि, समाज में शांति और महिलाओं को समानता दिखाकर आश्वस्त किया जाता है कि देश में कोई समस्या नहीं है। इसके बाद भी अगर कोई समस्या तो किसी को नजर आती है तो वह निश्चित तौर पर अर्बन नक्सल है, टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य है या देशद्रोही है। अब तो विज्ञापनों से ही देश चल रहा है, पहले जहाँ पूंजीपतियों के विज्ञापन नजर आते थे उन सभी जगहों पर सरकार लटक रही है।

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