पर्यावरण

दिल्ली और कानपुर में बढ़ रहा वायु प्रदूषण, योजनाओं का नहीं दिख रहा असर

Janjwar Desk
3 May 2021 11:34 AM GMT
दिल्ली और कानपुर में बढ़ रहा वायु प्रदूषण, योजनाओं का नहीं दिख रहा असर
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यूनाइटेड किंगडम में वायु प्रदूषण नियंत्रण की योजनाओं का असर स्पष्ट हो रहा है, पर हमारे देश में यह बेअसर है। यूनाइटेड किंगडम के शहरों में वाहनों के आवागमन और औद्योगीकरण को भी नियंत्रित किया गया...

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

कोविड 19 ने बहुत सारी सामाजिक समस्याओं को गौण कर दिया है – दिल्ली के देश के दूसरे शहरों का वायु प्रदूषण भी ऐसी ही समस्याओं में शामिल है। हाल में की यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम और लन्दन ग्लोबल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने बताया है कि दिल्ली और कानपुर में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। इन वैज्ञानिकों का आकलन है कि देश में वायु प्रदूषण के लिए बनाई गयी योजनाओं का कोई असर वायु प्रदूषण के स्तर पर नहीं दिखाई देता है। इन वैज्ञानिकों ने वर्ष 2005 से 2018 तक एकत्रित किये गए उपग्रह के चित्रों और उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर यह अध्ययन किया है, और निष्कर्ष निकाला है कि उपग्रहों से प्राप्त उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर किसी भी क्षेत्र के वायु प्रदूषण के स्तर का अध्ययन आसानी से किया जा सकता है।

इस अध्ययन में भारत, यूनाइटेड किंगडम, बेल्जियम और जमैका के वैज्ञानिक शामिल थे, और इसे एटमोस्फियरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन के लिए भारत के दो शहरों – दिल्ली और कानपुर, तथा यूनाइटेड किंगडम के दो शहरों – लन्दन और बर्मिंघम का चयन किया गया था। वायु प्रदूषण में पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के सन्दर्भ में लन्दन और बर्मिंघम में प्रदूषण का स्तर कम हो रहा है, जबकि दिल्ली और कानपुर में इसका स्तर बढ़ता जा रहा है। जाहिर है कि यूनाइटेड किंगडम में वायु प्रदूषण नियंत्रण की योजनाओं का असर स्पष्ट हो रहा है, पर हमारे देश में यह बेअसर है। यूनाइटेड किंगडम के शहरों में वाहनों के आवागमन और औद्योगीकरण को भी नियंत्रित किया गया है, पर हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं होता।

अध्ययन के सह-लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम के वैज्ञानिक विलियम ब्लोस के अनुसार अध्ययन के निष्कर्ष का एक अप्रत्याशित पहलू भी है – दिल्ली, कामपुर और लन्दन की हवा में फॉर्मलडीहाइड की सांद्रता बढ़ रही है। हवा में अनेक स्त्रोतों से वोलेटाइल आर्गेनिक कार्बन की सांद्रता बढ़ती जा रही है, और इसकी पहचान के लिए फॉर्मलडीहाइड को मापा जाता है। वोलेटाइल आर्गेनिक कार्बन अनेक गैसों का समूह है जो वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक स्त्रोतों या फिर घरों में उपयोग में आने वाले उत्पादों से उत्सर्जित होता है। विलियम ब्लोस के अनुसार लन्दन में इसके बढ़ने का कारण लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले सौन्दर्य प्रसाधन या फिर घरों को साफ़ रखने वाले रसायन हैं, जबकि भारत में इसका कारण वाहन उत्सर्जन है। वोलेटाइल आर्गेनिक कार्बन स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं, और इनके संपर्क में लम्बे समय तक रहने से कैंसर भी हो सकता है।

इस अध्ययन के मुख्य लेखक, यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम के शोध छात्र करण वोहरा के अनुसार इस अध्ययन के द्वारा वायु प्रदूषण से सम्बंधित दो तथ्य स्पष्ट हैं। उपग्रह के चित्रों और उपकरणों के आंकड़ों की मदद से वायु प्रदूषण का लम्बे अंतराल का अध्ययन किया जा सकता है, इससे भूमि पर वायु प्रदूषण मापने के उपकरणों का जाल नहीं बिछाना पड़ता। इस तरीके से वायु प्रदूषण के आकलन द्वारा वोलेटाइल आर्गेनिक कार्बन जैसे अनजान प्रदूषक पदार्थों का स्तर भी देखा जा सकता है।

वर्ष 2019 में कानपुर को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा मिल चुका है, और दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषत राजधानी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कोविड 19 से देश में अब तक 2 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी हैI मौत के ये आंकड़े डराते हैंI कोविड 19 के विस्तार को रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, लोग अपने स्तर पर सावधानी बरत रहे हैं, पूरे समाज का व्यवहार बदल गया और अब लोग बेसब्री से इसके टीके की कतार में खड़े हैं। दूसरी तरफ पिछले वर्ष भारत में 16.7 लाख मौतें अकेले वायु प्रदूषण के कारण हो गईं, जो देश में कुल मौतों का 18 प्रतिशत है, पर ना ही सरकार सचेत हुई और ना ही जनता में इसके लिए कोई सुगबुगाहट हैI इन आंकड़ों को हाल में ही प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल, लांसेट में प्रकाशित किया गया है।

ग्रीनपीस साउथ ईस्ट एशियाकी एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले 5 शहरों में वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2020 के दौरान 1,60,000 व्यक्तियों की असामयिक मृत्यु हो गयीI इसका कारण हवा में भारी मात्रा में मौजूद पीएम् 2.5 के कण हैं जो सीधा फेफड़े तक पहुँच जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक ऐसी मौत, 54000 मौत, दिल्ली में दर्ज की गयी और वायु प्रदूषण के जानकार लोगों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि दिल्ली हमेशा ही वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर से घिरी रहती हैI इसके बाद जापान की राजधानी टोक्यो का स्थान है, जहां 40000 असामयिक मौतें दर्ज की गईं हैं।

स्विट्ज़रलैंड स्थित संस्था आईक्यू एयर ने वर्ष 2020 के दौरान दुनिया के 106 देशों में वायु प्रदूषण, विशेषकर पीएम2.5 के स्तर, के आधार पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, इसके अनुसार दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से 9, 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 22 और 50 सबसे प्रदूषित शहरों में से 35 भारत में स्थित हैं। वायु प्रदूषण के स्तर के अनुसार दिल्ली दुनिया में 10वां सबसे प्रदूषित शहर है, पर किसी भी देश की राजधानी के सन्दर्भ में इसका स्थान पहला हैl दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर चीन का होटान शहर है, और उत्तर प्रदेश का गाजियाबाद दूसरे स्थान पर, और बुलंदशहर तीसरे स्थान पर है।

इसके बाद क्रम से बिसरख, नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा, कानपुर, लखनऊ, भिवंडी और दिल्ली का स्थान हैl सबसे प्रदूषित 30 शहरों में मेरठ, आगरा, मुज़फ्फरनगर, फरीदाबाद, जींद, हिसार, फतेहाबाद, बंधवारी, गुरुग्राम, यमुना नगर, रोहतक, धारूहेड़ा और मुजफ्फरपुर के नाम शामिल हैंl वैसे वायु प्रदूषण सरकारों का चरित्र तो नहीं देखता, फिर भी तथ्य यह है कि दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 22 भारत में हैं, और इनमें से 19 शहर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में स्थित हैं। इनमें से 11 शहर तो अकेले प्रधानमंत्री के उत्तम प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश में स्थित हैं।

स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर 2020 नामक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण 5 लाख से अधिक नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है, और अत्यधिक प्रदूषण में पलने वाले बच्चे यदि बच भी जाते हैं तब भी उनका बचपन अनेक रोगों से घिरा रहता हैI वायु प्रदूषण का घातक असर गर्भ में पल रहे शिशुओं पर भी पड़ता है, इससे समय से पूर्व प्रसव या फिर कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं, और ये दोनों की शिशुओं में मृत्यु के प्रमुख कारण हैंI ऐसी अधिकतर मौतें विकासशील देशों में होती हैI रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्गों पर वायु प्रदूषण के असर का विस्तार से अध्ययन किया गया है, पर शिशुओं पर इसके प्रभाव के बारे में अपेक्षाकृत कम पता हैI इस रिपोर्ट को हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट नामक संस्था ने प्रकाशित किया है।

हम हमेशा बात करते हैं कि आनेवाली पीढी के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जायेंगे, पर यदि वायु प्रदूषण का यही हाल रहा तो सत्य तो यही है कि हम आनेवाली पीढियां ही नहीं छोडके जायेंगेI जो जिन्दा रहेंगे उनके भी फेफड़े और मस्तिष्क सामान्य काम नहीं कर रहे होंगे।

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