पर्यावरण

2019 में सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण 5 लाख शिशुओं ने जन्म के एक महीने के अंदर ही दुनिया को कहा अलविदा

Janjwar Desk
14 Sep 2021 8:25 AM GMT
2019 में सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण 5 लाख शिशुओं ने जन्म के एक महीने के अंदर ही दुनिया को कहा अलविदा
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वायु प्रदूषण बन रहा बच्चों के लिए जानलेवा, सिर्फ एक साल में 5 लाख नवजातों ने तोड़ा दम

वायु प्रदूषण का यही हाल रहा तो सत्य तो यही है कि हम आनेवाली पीढियां ही नहीं छोड़कर जायेंगे, जो जिन्दा रहेंगे, उनके भी फेफड़े और मस्तिष्क सामान्य काम नहीं कर रहे होंगे...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

जनज्वार। संयुक्त राष्ट्र के इन्टरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (Inter-Governmental Panel on Climate Change) द्वारा हाल में प्रकाशित छठी असेसमेंट रिपोर्ट (6th Assessment Report) में कहा गया है कि दुनिया गंभीरता से यदि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को रोकने के लिए एकजुट होती है तो इसका सबसे जल्दी असर वायु प्रदूषण (Air Pollution) के स्तर पर पड़ेगा और जाहिर है इससे होने वाली लाखों असामयिक मौतों को रोका जा सकेगा।

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने का सबसे आसान तरीका है जीवाश्म इंधनों (Fossil Fuels) के उपयोग में भारी कटौती। जीवाश्म ईंधनों – कोयला, पेट्रोलियम और गैस – से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए इसके उपयोग को कम करना होगा और उपयोग कम करने के लिए इसके उत्खनन और उत्पादन को कम करना होगा।

एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दुनिया के देश जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को कम करने की प्रतिबद्धता की घोषणा कर रहे हैं, कोयला और पेट्रोलियम कम्पनियां (Coal and Petroleum Companies) भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन कम करने की घोषण कर रही हैं – पर कोई भी देश या कंपनी जीवाश्म ईंधनों के उत्खनन और उत्पादन को कम करने की बात नहीं करते हैं। दूसरी तरफ नए क्षेत्रों में भी जीवाश्म ईंधनों को खोजा जा रहा है और उसके उत्खनन (Extraction) की तैयारियां की जा रही हैं।

वैज्ञानिक जर्नल नेचर (Scientific Journal, Nature) में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लन्दन (University College of London) के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर पॉल एकिंस (Prof Paul Ekins) की अगुवाई में किये गए अध्ययन को प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन में आकलन किया गया है कि यदि तापमान वृद्धि (Global Warming) को इस शताब्दी के अंत तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना है तो फिर कितने जीवाश्म ईंधन को पृथ्वी के नीचे ही रहने देना होगा, यानी उत्खनन नहीं करना होगा।

इस आकलन का आधार दुनिया के देशों द्वारा वर्ष 2018 में घोषित जीवाश्म इंधन के भण्डार हैं। इस अध्ययन के अनुसार पूर्व-औद्यगिक काल (pre-industrial era) की तुलना में पृथ्वी का सतही तापमान (surface temperature of Earth) अब तक औसतन 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जबकि पेरिस समझौते (Paris Agreement on Climate Change) के तहत इस शताब्दी के अंत तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बृद्धि को रोकने का लक्ष्य है – इसलिए जाहिर है 0.3 डिग्री सेल्सियस का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। यदि दुनिया जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है तब 0.3 डिग्री सेल्सियस को ध्यान में रखते हुए सबसे पहले जीवाश्म ईंधनों के उत्पादन पर लगाम लगाना होगा।

इस अध्ययन के अनुसार दुनिया में इस समय ऊर्जा के कुल स्त्रोत (all energy sources) में से 80 प्रतिशत जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है और कुल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन (Emission of Greenhouse Gases) में से 89 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं। यदि 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को पाना है तब अध्ययन के अनुसार वर्ष 2018 के जीवाश्म ईंधन के भण्डार के हिसाब से दुनिया के 89 प्रतिशत कोयला भण्डार, 58 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थों और 59 प्रतिशत गैस के भण्डार को जमीन के अन्दर ही पड़े रहने देना होगा, यानी उनका उत्खनन और उत्पादन नहीं करना होगा। इसके बाद भी केवल 50 प्रतिशत संभावना है कि तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहे।

पेट्रोलियम पदार्थों (Petroleum products) और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) के उत्पादन में हरेक वर्ष 3 प्रतिशत की कमी लानी होगी। इस अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया 4 गीगाटन कार्बन प्रतिवर्ष के वायुमंडल में उत्सर्जन को रोकने में कामयाब रहेगी।

अमेरिका और रूस में संयुक्त तौर पर दुनिया में कोयले के कुल भण्डार में से लगभग आधा भंडार स्थित है, वहां के भण्डार में से 97 प्रतिशत को जमीन के नीचे ही छोड़ना होगा। ऑस्ट्रेलिया बड़ी तेजी से कोयले के नए भंडारों और इसके उत्खनन की योजना बना रहा है पर अध्ययन के अनुसार इसे कोयले के कुल भंडार में से 97 प्रतिशत को जमीन के नीचे ही दबे रहने देना होगा। चीन और भारत में दुनिया के कुल कोयला भंडार में से लगभग एक-चौथाई स्थित है, यहाँ इसमें से 76 प्रतिशत का उत्खनन नहीं करना होगा। इसी तरह मध्य-पूर्व में पेट्रोलियम के उत्खनन में दो-तिहाई कटौती और कनाडा में 83 प्रतिशत की कटौती करनी होगी। अध्ययन के अनुसार उत्तरी ध्रुव (Arctic) के आसपास के क्षेत्रों में पेट्रोलियम का उत्खनन पूरी तरह से बंद करने की जरूरत है।

सेव द चिल्ड्रेन इंटरनेशनल (Save the Children International) नामक संस्था द्वारा कराये गए एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में 19 वर्ष तक आयु के 93 प्रतिशत से अधिक बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां वायु प्रदूषण का स्तर उनके स्वास्थ्य और विकास (Health and Development) को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अनुसार वर्ष 2019 में अकेले वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में 5 लाख शिशुओं की मृत्यु जन्म के बाद पहले महीने में ही हो गयी। अध्ययन में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ़ पोर्ट्समाउथ की वैज्ञानिक डॉ क्रेस्सिडा बोव्येर (Dr Cressida Bowyer of University of Portsmouth) के अनुसार विकासशील देशों के शहरों में कचरे को खुले में जलाने के कारण वायु प्रदूषण का स्तर अत्यधिक हो जाता है। समस्या यह है कि प्लास्टिक कचरे का पर्याप्त प्रबंधन नहीं किया जाता और इसे भी जैविक ईंधनों के साथ जलाया जाता है, जिससे हवा केवल प्रदूषित ही नहीं, बल्कि विषैली (not only polluted but toxic too) भी हो जाती है।

हम हमेशा बात करते हैं कि आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जायेंगे, पर यदि वायु प्रदूषण का यही हाल रहा तो सत्य तो यही है कि हम आनेवाली पीढियां ही नहीं छोड़कर जायेंगे। जो जिन्दा रहेंगे, उनके भी फेफड़े और मस्तिष्क सामान्य काम नहीं कर रहे होंगे।

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