पर्यावरण

बड़े प्रदूषकों की नेट जीरो एमिशन योजनायें वास्तविकता कम, जुमलेबाजी ज़्यादा

Janjwar Desk
10 Jun 2021 11:08 AM GMT
बड़े प्रदूषकों की नेट जीरो एमिशन योजनायें वास्तविकता कम, जुमलेबाजी ज़्यादा
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रिपोर्ट कहती है कि सरकारों को इस खतरनाक योजना पर विश्वास करना और उसे मजबूत करना बंद कर देना चाहिए और इसके बजाय 2030 तक आवश्यक उत्सर्जन में कमी लाने के लिए वास्तविक कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए.....

जनज्वार। जैसे-जैसे जलवायु संकट के प्रभाव और अधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं, दुनिया भर के लोग, महिलाओं और युवाओं के साथ, इन प्रभावों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। लेकिन जवाब में, दुनिया के बड़े प्रदूषक और सरकारें अपने द्वारा उत्पन्न पर्यावरण संकट के समाधान के रूप में अपनी "नेट ज़ीरो एमिशन" योजना को दिखा रहे हैं, जो कि असल में सिर्फ जुमलेबाजी है और असल करवाई से बचने का तरीका है।

यह नतीजा है एक रिपोर्ट का जिसका शीर्षक है द बिग कॉन: हाउ बिग पॉल्यूटर्स आर एडवांसिंग ए "नेट ज़ीरो" क्लाइमेट एजेंडा टू डिले, डिसीव एंड डीनाइ ," ("एक बड़ी धोखेबाज़ी: बड़े प्रदूषक कैसे देरी करने, धोखा देने और मना करने के लिए एक "नेट ज़ीरो" जलवायु कार्यावली को बढ़ावा दे रहे हैं,") । इस हाल ही में जारी रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि बड़े प्रदूषकों का "नेट ज़ीरो एमिशन" का वादा सिर्फ वास्तविक कार्रवाई से ध्यान हटाने और जलवायु संकट की जिम्मेदारी से बचने और प्रदूषण को जारी रखने की उनकी निरंतर योजना का हिस्सा है।

रिपोर्ट कहती है कि ऐसे में सरकारों को इस खतरनाक योजना पर विश्वास करना और उसे मजबूत करना बंद कर देना चाहिए, और इसके बजाय 2030 तक आवश्यक उत्सर्जन में कमी लाने के लिए वास्तविक कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, और बड़े प्रदूषकों को उनके धोखे के लिए जिम्मेदार ठहराना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु ट्रीटी (संधि) की वर्चुअल चर्चा के बीच, यह नई रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि जैसे-जैसे नयी-नयी "नेट ज़ीरो" योजनाएं शुरू की गई हैं, वैज्ञानिक, शैक्षणिक और कार्यकर्ता समुदायों ने पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए इन योजनाओं की अक्षमता के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की है।

कॉरपोरेट एकाउंटेबिलिटी, द ग्लोबल फॉरेस्ट कोएलिशन और फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ इंटरनेशनल द्वारा लिखित रिपोर्ट को एक्शनऐड इंटरनेशनल, ऑयलवॉच, थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क और इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिसी स्टडीज सहित साठ से अधिक पर्यावरण संगठनों से इंडोर्समेंट (समर्थन) मिला था।

"द बिग कॉन" इन "नेट ज़ीरो" योजनाओं के संदिग्ध अंकगणित, अस्पष्ट लक्ष्यों और अक्सर अप्राप्य तकनीकी आकांक्षाओं को उजागर करने में हालिया रिपोर्टों की एक श्रृंखला में शामिल होता है, जिसमें जीवाश्म ईंधन और ऊर्जा, विमानन, प्रौद्योगिकी, खुदरा, वित्त और कृषि उद्योग सहित कई प्रमुख प्रदूषणकारी उद्योगों की योजनाओं का विश्लेषण किया जाता है। इसमें उन कुछ रणनीतियों पर गहराई से नज़र डालना भी शामिल है जिन्हें इन उद्योगों ने यह सुनिश्चित करने के लिए तैनात किया है कि उनका "नेट ज़ीरो" एजेंडा जलवायु संकट की वैश्विक प्रतिक्रिया का प्राथमिक सिद्धांत बन जाए।

रिपोर्ट में हाइलाइट किए गए कुछ प्रमुख निष्कर्षों में शामिल हैं:

रणनीति:

  • विमानन और जीवाश्म ईंधन उद्योगों सहित बड़े प्रदूषकों ने अमेरिका में टैक्स क्रेडिट के पारित होने को सुनिश्चित करने में मदद करने के लिए बड़े पैमाने पर लॉबी (पैरवी) की, जिसे 45Q कहा जाता है, जो कार्बन कैप्चर और स्टोरेज को सब्सिडी देता है। योग्य होने के लिए जगह में सही सिस्टम नहीं होने के बावजूद, उन्हीं निगमों ने क्रेडिट से शायद लाखों में कमाई करी है।
  • इंटरनेशनल एमिशन ट्रेडिंग एसोसिएशन, शायद बाजार और ऑफसेट पर सबसे बड़ा वैश्विक लॉबिइस्ट (दोनों प्रदूषकों की ""नेट ज़ीरो" जलवायु योजनाओं" के स्तंभ") ने अपने एजेंडे को दूसरों से आगे बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ता में अपनी बड़ी आकृति के बल का इस्तेमाल किया है।
  • निगमों ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट फॉर टेक्नोलॉजी, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और इंपीरियल कॉलेज लंदन सहित प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थानों में बहुत भारी वित्तीय योगदान किया है ताकि इन संस्थानों द्वारा किए जाने वाले "नेट ज़ीरो" संबंधित शोध के प्रकार को आकार दिया जा सके और प्रभावित किया जा सके।
  • एक उदाहरण में, एक्सॉन मोबिल ने अनुसंधान पूरा होने से पहले औपचारिक रूप से समीक्षा करने का अधिकार ख़ुद के पास बरक़रार रखा और कुछ मामलों में स्टैनफोर्ड के ग्लोबल क्लाइमेट एंड एनर्जी प्रोजेक्ट में परियोजना विकास टीमों में अपने स्वयं के कर्मचारियों को लगा दिया ।

योजनाएं:

  • 2030 तक, अकेले शेल ही हर साल अपने उत्सर्जन की भरपाई के लिए 2019 में संपूर्ण वैश्विक स्वैच्छिक कार्बन ऑफसेट बाजार क्षमता में उपलब्ध से ज़्यादा अधिक ऑफसेट खरीदने की योजना बना रहा है।
  • वॉलमार्ट की जलवायु योजना पूरी तरह से अनपे मूल्य श्रृंखला उत्सर्जन की उपेक्षा करती है, जो निगम के कार्बन पदचिह्न के अनुमानित 95 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार है।
  • एनी आने वाले वर्षों में अपने तेल और गैस उत्पादन को बढ़ाने की योजना बना रहा है, एक ऐसा कारनामा जिसे निगम ने वनीकरण योजनाओं के माध्यम से ऑफसेट करने का प्रस्ताव किया है जिन्हें नकली जंगलों के रूप में वर्णित किया गया है।
  • दुनिया के सबसे बड़े परिसंपत्ति प्रबंधक, ब्लैकरॉक, ने 2050 तक अपने पोर्टफोलियो में "नेट ज़ीरो" उत्सर्जन तक पहुंचने का वादा किया है। लेकिन 2020 में अपने अधिकांश जीवाश्म ईंधन शेयरों को "निकट भविष्य में" बेचने की प्रतिज्ञा के बावजूद, यह अभी भी अपनी नीति में लूपहोल (प्रतिज्ञा से निकलने का छुपा रास्ता) के कारण US$ 85 बिलियन (अरबों) की कोयला संपत्ति का मालिक है।
  • 2035 तक अपनी आपूर्ति श्रृंखला में वनों की कटाई को समाप्त करने के लिए जेबीएस की प्रतिबद्धता का अर्थ है कि यह अपनी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े वनों की कटाई को तुरंत समाप्त करने—जेबीएस के लिए अपने उत्सर्जन को कम करने के यकीनन सबसे प्रभावी और सबसे तेज़ तरीकों में से एक—के बजाय अगले 14 वर्षों (2035 तक) के लिए वनों की कटाई में योगदान जारी रखेगा।

क्लाइमेट जस्टिस एंड एनर्जी प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर, फ्रेंड्स ऑफ़ द अर्त इंटरनेशनल, सारा शौ, कहती हैं, "इस रिपोर्ट से पता चलता है कि बड़े प्रदूषकों की 'नेट ज़ीरो' योजनाएँ एक बड़े धोखा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। सच्चाई यह है कि शेल जैसी कम्पनियों को जीवाश्म ईंधन से अपने उत्सर्जन को कम करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बजाय वे वृक्षारोपण और ऑफसेटिंग योजनाओं की बातें कर अपनी छवि सुधारने में लगे हैं। हमें इस तथ्य के प्रति तेज़ी से जागरूकता होनी चाहिए कि हम छल-कपट में फस रहे हैं। कार्रवाई की कमी को अस्पष्ट करने वाला नेट ज़ीरो का वादा हमें जोखिम में डाल रहा है।"

आगे, रेचल रोज़ जैक्सन, निदेशक, जलवायु नीति और अनुसंधान, कॉर्पोरेट एकाउंटेबिलिटी, कहती हैं, "ये बड़े खिलाड़ी जालसाज़ तामीरें बनाते हैं ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि दुनिया अपनी उम्मीदों को उन योजनाओं पर टिकाएगी जो कि असल में सिर्फ धोखे से ज्यादा कुछ नहीं। यदि हम तुरंत सही रास्ते पर नहीं आते हैं, तो दुनिया तेज़ी से जलवायु विनाश का रुख कर लेगी।"

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