हाशिये का समाज

आदिवासी महिलाओं ने बनाया ऐसा साबुन कि अमेरिका से आ रहे ऑर्डर, पर कीमत भी है खास

Janjwar Desk
27 Aug 2021 3:30 AM GMT
आदिवासी महिलाओं ने बनाया ऐसा साबुन कि अमेरिका से आ रहे ऑर्डर, पर कीमत भी है खास
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इन आदिवासी महिलाओं के बनाए नेचुरल साबुन के विदेशों से ऑर्डर मिल रहे हैं

आदिवासी महिलाएं अपने दम पर ऐसा साबुन बना रहीं हैं जिनके खरीददार देश के मेट्रोज तो क्या अमेरिका से भी मिल रहे हैं, शुरु में कठिन संघर्ष करनेवाली इन महिलाओं के हुनर को अब विदेशों में भी पहचान मिल रही है..

जनज्वार। कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। यह कहावत मध्य प्रदेश की इन आदिवासी महिलाओं पर बिल्कुल फिट बैठता है। ये आदिवासी महिलाएं अपने दम पर ऐसा साबुन बना रहीं हैं जिनके खरीददार देश के मेट्रोज तो क्या अमेरिका से भी मिल रहे हैं। शुरूआत में कठिन संघर्ष करनेवाली इन आदिवासी महिलाओं के हुनर को अब विदेशों में भी पहचान मिल रही है।

मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की आदिवासी महिलाओं द्वारा तैयार किए गए साबुन का अब अमेरिका से भी ऑर्डर आ रहा है। हालांकि अभी इनको इंपोर्ट-एक्सपोर्ट की न तो उतनी समझ है न ही उसका लाइसेंस आदि है, फिर भी इन्होंने हिम्मत की है और लाइसेंस आदि पाने की कोशिश में जुट गई हैं।

बता दें कि इनके द्वारा बनाए गए ये साबुन पूरी तरह से नेचुरल और हर्बल हैं। ये बकरी के दूध और अन्य जड़ी बूटियों से साबुन बनाती हैं। खास बात ये है कि जिन महिलाओं द्वारा ये साबुन बनाई जा रही हैं, वो दिनभर खेतों में सोयाबीन काटती हैं और शाम में अपने खाली समय का सदुपयोग साबुन बनाने में करती हैं।

शुरुआती संघर्ष और लोगों के ताने सुनने के बाद खंडवा जिले के पंधाना विधानसभा क्षेत्र के गांव उदयपुर में रहने वाली ये आदिवासी महिलाएं अब सफलता की नई इबारत लिख रही हैं। इनके द्वारा बनाई गई साबुन अब विदेशों में सप्लाई होने जा रही है।

हालांकि पूरी तरह से नेचुरल और हर्बल होने के कारण इनके साबुन की लागत ज्यादा है, लिहाजा, इनका एक साबुन 250-350 रुपए का बिकता है। लेकिन आयुर्वेदिक और पूरी तरह प्राकृतिक होने के चलते इस साबुन की बहुत डिमांड है और डिमांड में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, महिला रेखाबाई बराडे, ताराबाई भास्कले और काली बाई कैलाश ने गांव के एक छोटे से कमरे में 3 साल पहले इस काम की शुरुआत की। ये महिलाएं दिनभर अपना पुराना काम करतीं। यानि खेतों में सोयाबीन काटा करतीं और रात में बकरी के दूध और अन्य जड़ी-बूटियों से साबुन बनाने की कोशिश करतीं। कई बार साबुन बनाने की कोशिश की, लेकिन सफलता कोसों दूर थी। ऊपर से अपनों की बातें सुनना सो अलग, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और एक साल बाद साबुन बनाने में सफलता पा ही ली।

भावती बताती हैं कि इको फ्रेंडली साबुन में सुगंधित तेल और फ्लेवर के लिए आम, तरबूज आदि चीजें मिलाई जाती हैं। इसलिए थोड़ा महंगा है। ईको फ्रेंडली साबुन की पैकिंग भी जूट की थैलियों में की जाती है। पैकिंग के वक्त घास में इसके डिब्बों को रखा जाता है। अब इसे वे ऑनलाइन वेबसाइट के माध्यम से बेचती हैं। हाल ही में अमेरिका से ऑर्डर आया है, एक्सपोर्ट के नियम पता कर इन्हें विदेश भी भेजेंगे। अब इनकी आर्थिक स्थिति भी काफी सुधर गई है।

उन्होंने कहा, "अब गांव की अन्य महिलाओं को भी इससे जोड़ना है, लेकिन हमारे पास पर्याप्त संसाधन और जगह की कमी है। फिलहाल एक दिन में 33 साबुन बना लेते हैं, लेकिन रखने के लिए जगह नहीं है, इसलिए बनाने का काम रुका है। फिलहाल सिर्फ पैकिंग की जा रही है।"

ये खास साबुन कई फ्लेवर में मौजूद हैं, जिनमें सुगंधित तेल और दार्जलिंग की चायपत्ती, आम, तरबूज आदि चीजें मिलाकर तैयार किया जाता है। इन साबुन की पैकिंग में पर्यावरण का भी पूरा ख्याल रखा जाता है और इन साबुनों को जूट के पैकिट में पैक किया जाता है।

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