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300 करोड़ के घोटाले को उजागर करने के चलते गया था मंत्री पद, आत्मकथा में शांता कुमार के खुलासे से भाजपा में भूचाल

Janjwar Desk
25 Feb 2021 11:24 AM GMT
300 करोड़ के घोटाले को उजागर करने के चलते गया था मंत्री पद, आत्मकथा में शांता कुमार के खुलासे से भाजपा में भूचाल
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आत्मकथा में शांता ने लिखा है कि वर्ष 2003 में ग्रामीण विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनका ग्रामीण विकास मंत्रालय मुझे दिया गया। कुछ दिन बाद तमिलनाडु के दो सांसद मिलने आए।

नई दिल्ली। पूर्व मुख्यमंत्री व मार्गदर्शक मंडल के सदस्य रहे शांता कुमार (Shanta Kumar) ने अपनी आत्मकथा 'निज पथ का अविचल पंथी' ने सत्ताधारी भाजपा की राजनीति में सियासी हलचल पैदा कर दी है। आत्मकथा में शांता ने अटल (Atal Bihari Vajpayee) सरकार के कार्यकाल के दौरान ग्रामीण विकास मंत्रालय (Ministry of Rural Development) में हुए 300 करोड़ के घोटाले का खुलासा करने पर उनका केंद्रीय मंत्री पद छीनकर ईमानदारी की सजा देने का दर्द जाहिर किया है। शांता ने आत्मकथा में यह बात मानी है कि साल 2003 में ग्रामीण विकास मंत्री रहे वेंकैया नायडू (M. Venkaiah Naidu) के मंत्रालय में 300 करोड़ रूपये का घोटाला हुआ था।

आत्मकथा (Autobiography) में लिखा गया है कि उन्होंने घोटाले को दबाने से मना किया तो बड़े नेताओं के दबाव में उनका ग्रामीण विकास मंत्री का पद छीन लिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, आरएसएस, संसदीय कार्य मंत्री रहे प्रमोद महाजन सहित किसी भी नेता ने तब उनका साथ नहीं दिया था। उन्होने कहा कि उस वक्त पार्टी छोड़कर लोकसभा में प्रमाणों सहित घोटाले का खुलासा करने का मन बना लिया था, लेकिन पत्नी संतोष शैल्जा ने ऐसा करने से रोक लिया था। पत्नी ने समझाया कि मैंने पूरा जीवन जिस पार्टी के लिए लंबा संघर्ष किया, उसे इतनी बड़ी हानि होगी कि मैं स्वयं उसके लिए खुद को कभी क्षमा नहीं कर सकूंगा।

आत्मकथा में शांता ने लिखा है कि वर्ष 2003 में ग्रामीण विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनका ग्रामीण विकास मंत्रालय मुझे दिया गया। कुछ दिन बाद तमिलनाडु के दो सांसद मिलने आए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में आंध्र प्रदेश को 90 करोड़ स्वीकार किए गए थे, लेकिन मंत्रालय से जब पत्र जारी हुआ तो 90 करोड़ का 190 करोड़ कर दिया गया। तीन वर्ष से आंध्रप्रदेश को प्रति वर्ष 100 करोड़ अधिक जा रहा है। लोकसभा में भी यह प्रश्न लगने नहीं दिया गया। शांता ने लिखा है कि उन्होंने आरोपों के आधार पर जब जांच की तो आरोप सही निकले। जांच में पाया गया कि योजना आयोग की फाइल में स्वीकृत राशि 90 करोड़ थी। मंत्रालय से जब धन भेजा गया तो 190 करोड़ भेजा गया। अधिकारियों से जब पूछा तो उनके पास कोई जवाब नहीं था।

शांता ने लिखा है कि उन्होंने 300 करोड़ के घोटाले की फाइल संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन को भी दिखाई। उन्होंने मुझे बताया कि इस विभाग के उस समय जो मंत्री थे, वह अब पार्टी के अध्यक्ष हैं। इसलिए चिंता छोड़ो और यह सब भूल जाओ। फिर मैंने फाइल प्रधानमंत्री को भी दिखाई। अटल जी हैरान होकर कहने लगे यह क्या हो रहा है, फिर चुप हो गए। शांता ने लालकृष्ण आडवाणी सहित योजना आयोग के अध्यक्ष केसी पंत को भी यह बात बताई। लेकिन किसी के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था।

शांता ने किताब में लिखा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडू मुझसे नाराज थे, क्योंकि मैंने उनके प्रदेश को हर साल मिलने वाला 100 करोड़ रोक दिया था। मेरे खिलाफ अपनी ही पार्टी के हिमाचल और देश से कुछ नेता एकजुट हो गए। मुझ पर अनुशासनहीनता के आरोप लगाकर अटल जी पर मेरा इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। आखिरकार अटल जी ने मुझसे इस्तीफा ले लिया, लेकिन मैंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। कभी सार्वजनिक रूप से इस बारे में बात नहीं की थी। उन्होने लिखा है कि संघ पर से भी विश्वास हिल गया था। संघ ने भी सहायता नहीं की।

अपनी आत्मकथा में शांता ने लिखा है कि गुजरात में दंगों के बाद अटल जी की राय पार्टी से अलग थी। उन्होंने राजधर्म की एक बार चर्चा की। फिर चुप हो गए। गोवा कार्यसमिति की बैठक से पहले मेरे सामने उन्होंने अरुण जेटली को क्या कहा था मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, पर बैठक में वह चुप हो गए थे। अयोध्या मंदिर आंदोलन में भी वे सक्रिय नहीं रहे। उनके पार्टी के साथ मतभेद थे।

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