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लिव इन रिलेशनशिप नैतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा

Janjwar Desk
19 May 2021 12:25 PM GMT
लिव इन रिलेशनशिप नैतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा
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दो वयस्क स्त्री-पुरुष भारत में एक साथ नहीं रह सकते : कोर्ट ने कहा बिगड़ेगा समाज का ताना बाना

जोड़े ने कोर्ट में याचिका दी थी कि वह अभी एक साथ रह रहे हैं। वह जल्दी ही शादी करने वाले हैं। लेकिन लड़की के माता पिता उनके खिलाफ है। इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए....

मनोज ठाकुर की रिपोर्ट

जनज्वार ब्यूरो/चण्डीगढ़। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि "लिव-इन-रिलेशनशिप नैतिक या सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।" पंजाब के तरनतारन जिले के निवासी एक लड़का व लड़की ने कोर्ट में अपील करते हुए सुरक्षा की मांग की थी। उन्होंने अपनी अपील मे कहा था कि उनकी जान को खतरा है, वह आजादी से आ जा नहीं सकते। इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। दोनो ने बताया कि था कि वह 'लिव इन' रिलेशनशिप में हैं।

कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही यह भी बोल दिया कि इस तरह के रिलेशनशिप स्वीकार नहीं है।

जोड़े ने कोर्ट में याचिका दी थी कि वह अभी एक साथ रह रहे हैं। वह जल्दी ही शादी करने वाले हैं। लेकिन लड़की के माता पिता उनके खिलाफ है। इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।

याचिकाकर्ता के वकील जे एस ठाकुर ने कहा कि लड़की की उम्र 19 साल और लड़के की उम्र 22 साल है। दोनों एक दूसरे से शादी करना चाहते थे। दिक्कत यह है कि लड़की के आधार कार्ड और दस्तावेज उसके परिवार के पास है। दस्तावेजों के बिना लड़की यह साबित नहीं कर पा रही कि वह 18 साल की है। इसलिए उनकी शादी नहीं हो पा रही है।

कोर्ट ने यह कहा, "याचिकाकर्ता नंबर 1 (लड़की) मुश्किल से 18 साल की है जबकि याचिकाकर्ता नंबर 2 (लड़का) 21 साल का है। वे लिव-इन रिलेशनशिप में एक साथ रहने का दावा करते हैं और अपने जीवन की सुरक्षा करने की मांग करते हैं। इस पीठ का विचार है, यदि इस तरह की सुरक्षा दी जाती है, जैसा कि दावा किया गया है, तो समाज का पूरा सामाजिक ताना-बाना गड़बड़ा जाएगा, हाईकोर्ट की बेंच ने जोड़े को सुरक्षा देने से इनकार करते हुए यह भी बोला।

कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा कि, यह जोड़ा सुरक्षा की मांग कर, अपने रिश्ते को मान्यता प्रदान करना चाह रहा है। यह भी सही नहीं है। इसलिए भी उनकी याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह कहते हुए, कोर्ट ने इस याचिका खारिज कर दिया।

याचिका के खारिज होने के बाद लिव इन रिलेशन को लेकर एक नई बहस भी छिड़ गई है। क्योंकि लिव इन रिलेशन पर कोर्ट के निर्णय अलग अलग हैं। मसलन दिसंबर 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशन में रह रहे जोड़े को राहत देते हुए कहा था लिव इन रिलेशनशिप को देश में वैधानिक मान्यता प्राप्त है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को चाहे वह अभिभावक ही क्यों न हो, दो वयस्क लोगों के बिना शादी किए शांतिपूर्वक साथ जीवन व्यतीत करने में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा था कि यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जो उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के तहत प्राप्त है। कोर्ट ने लिव इन रिलेशन में रह रहे फर्रुखाबाद के जोड़े को संरक्षण देने और उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं करने का आदेश दिया है।

फर्रुखाबाद की कामिनी देवी और अजय कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने कहा कि लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और कई अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशन की विस्तृत व्याख्या की है।

हरियाणा और पंजाब की एडवोकेट आरती ने बताया कि लिव इन पर भारतीय कानून में लिव इन अपराध नहीं है। भारत में लिव इन वैध है। उन्होंने बताया कि हालांकि लोकसभा या राज्यों में लिव इन पर कोई व्यवस्थित संहिताबद्ध अधिनियम नहीं बनाया। फिर भी घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 2 (एफ) में लिव इन को परिभाषित किया है। घरेलू हिंसा अधिनियम में लिव इन में साथ रह रहे लोगों को भी संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं।

एडवोकेट आरती ने बताया कि लिव पर समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आते हैं, जिन पर लिव इन जैसी व्यवस्था को लेकर विधानों का निर्माण होता रहता है। जो कि इस तरह के मामलों में मार्गदर्शन करते हैं।

आरती के अनुसार लेकिन लिव इन में साथ रह रहा जोड़ा एक निश्चित अवधि तक साथ रहना चाहिए। यह नहीं कि आज मिले, कल अलग अलग हो गए, परसो फिर मिल लिए। वह एक साथ समय गुजार रहे हो, एक मकान या कमरे में रहते हो, साथ में चीजें शेयर करते हो। घर के काम में एक दूसरे की मदद करते हो, यदि उनके बच्चे हो जाते हैं तो अपने बच्चों के साथ प्रेम से रह रहे हो।

आरती ने बताया कि चुनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार चुनमुनिया मामले में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि महिला को अपने पुरुष साथी से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत वह भरण पोषण का अधिकार भी प्राप्त कर सकती है।

अब पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने जिस तरह से इस जोड़े की याचिका को खारिज कर दिया है। इस पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट भी इस लिव इन रिलेशनशिप को मानता है। इस तरह से यह तो लड़के और लड़की के अधिकारों का हनन है। वह दोनों जब अपनी मर्जी से एक साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें रहने दिया जाना चाहिए। यदि लड़की और लड़के की जान को खतरा है तो उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए।

पंजाब व हरियाणा में ऑनर किलिंग के मामले सामने आते रहते हैं। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को मौत के घाट उतार दिया गया है। हरियाणा में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के लिए सेफ हाउस भी बनाए गए हैं। यहां यह पुलिस की सुरक्षा में रहते हैं।

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