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चीन ने भारत की 60 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन पर किया कब्जा

Janjwar Desk
9 Jun 2020 2:47 PM GMT
चीन ने भारत की 60 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन पर किया कब्जा
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चीनी सेना ने अब वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के कई 'पेट्रोलिंग पॉइंट' पर भारतीय सेना की पहुंच को रोक दिया है जिसपर भारतीय सेना के गश्ती दल दशकों से नियमित रूप से पेट्रोलिंग करता था और उस क्षेत्र पर अपना दावा जताता था।

जनज्वार। कारगिल में जिस तरह से पाकिस्तानी सैनिको ने 1999 में घुसपैठ कर ली थी, ठीक उसी तरह की पुनरावृत्ति चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी कर रही है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की टुकड़ियों ने गलवान नदी और पैंगोंग झील क्षेत्रों में अपना डिफेंस जारी रखा है जो कि भारतीय सीमा क्षेत्र के तीन किलोमीटर तक अंदर है। इस इलाके पर भारतीय सेना दशकों से गश्त कर अपना इलाका होने का दावा किया करती थी।

जिस तरह कारगिल घुसपैठ ने पाकिस्तानी सैनिकों को श्रीनगर-जोजिला-कारगिल-लेह राजमार्ग पर हावी होने की अनुमति दी, वैसे ही गलवान नदी घाटी में रणनीतिक दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएसडीबीओ) अब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को हावी होने की अनुमति मिल गई है।

पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों ने खुद को गलवान नदी घाटी के उस मुहाने पर स्थापित कर लिया है जहां पर गलवान नदी घाटी और श्योक नदी का संगम है जो कि डीएसडीबीओ सड़क से सिर्फ एक-डेढ़ किलोमीटर दूर है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी स्पष्ट रूप से इस सड़क पर स्थायी रूप से हावी होने का इरादा रख रहा है।

हां तक कि शीर्ष चीनी अधिकारियों ने घोषणा की है कि इस मुद्दे को बातचीत के जरिए हल किया जा सकता है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के घुसपैठिए बंकर बना रहे हैं जबकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के इंजीनियर चीन के रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर को वास्तविक नियंत्रण रेखा से जोड़ रहे हैं।

रकार के सूत्रों का परंपरागत अनुमान है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पिछले महीने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने 60 वर्मकिलोमीटर से अधिक के भारतीय गश्त वाले उस इलाके पर कब्जा कर लिया है जो पैंगोंग झील के उत्तरी तट और गलवान नदी क्षेत्रों के बीच समान रूप विभाजित है।

रेडिफ डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सेना ने अब वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के कई 'पेट्रोलिंग पॉइंट' पर भारतीय सेना की पहुंच को रोक दिया है जिसपर भारतीय सेना के गश्ती दल दशकों से नियमित रूप से पेट्रोलिंग करता था और उस क्षेत्र पर अपना दावा जताता था। इनमें पेट्रोलिंग पॉइंट 14, 16, 18 और 19 हैं।

लेकिन इस साल महामारी के कारण आरक्षित सैनिकों को पीसटाइम लोकेशन पर रखा गया था। नतीजतन, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की कई घुसपैठों पर प्रतिक्रिया देने के लिए आरक्षित सैनिकों की सख्त कमी थी। जब तक उत्तरी सेना आरक्षित सैनिकों को इलाके में पहुंच पाती वहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पहले ही नई स्थितियों पर अपनी पकड़ मजबूत बना चुकी थी।

ई दिल्ली में सेना का मुख्यालय इसलिए चक्कर लगा रहा है क्योंकि लद्दाख में टॉप जनरलों को झपकी लेते हुए पकड़ा गया है। लेह में कोर कमांडर और उधमपुर में भी उत्तरी सेना के कमांडर को बदलने के बारे में चर्चा हो रही है।

1999 में कारगिल में घुसपैठ को को एक जांच में 'खुफिया एजेंसियों की विफलता' बताया गया था जिसके बाद से एक भी जनरल ने अपनी नौकरी नहीं खोई और न ही कोई बदला गया। सेना ने एक ही ब्रिगेडियर पर सारा दोष मढ़ दिया था।

रेडिफ डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, नाम ना छापने की शर्त पर एक सेवानिवृत्त रक्षा खुफिया प्रमुख मौजूदा स्थिति के लिए ऑपरेशनल विफलता के साथ साथ इंटेलीजेंस को जिम्मेदार ठहराते हैं। वह कहते हैं, 'लद्दाख में चीन के विस्तारवाद के प्रति हम हमेशा अति संवेदनशील रहे हैं ऐसा इसलिए है क्योंकि यह अक्साई चिन से जुड़ता है जिसके माध्यम से चीन ने अपने रणनीतिक पश्चिमी राजमार्ग का निर्माण किया है जो तिब्बत और शिनजियांग को जोड़ता है।'

'इस इलाके में जब हमने 255 किलोमीटर डीबीडीएसओ रोड का निर्माण किया था, श्योक की पूर्वी तरफ, खासतौर पर गलवान घाटी में आर्मी क्यों तैनात नहीं की गई?' अधिकारी ने 2013 में दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में डेपसांग में चीनी घुसपैठ का हवाला देते हुए कहा कि इसके तुरंत बाद भारत ने वहां एक लैंडिंग ग्राउंड एक्टिव किया था और सैन्य टुकड़ियों की संख्या बढ़ा दी थी।

सेना के भीतर इस बात की चिंता बढ़ रही है कि नई दिल्ली पिछले महीने चीन के द्वारा कब्जाए गए क्षेत्र को बनाए रखने की अनुमति देगा। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सार्वजनिक बयानों में पहले ही मान चुके हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा का सीमांकन इस क्षेत्र में अस्पष्ट है।

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