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Supreme Court का NIC को आदेश, आधिकारिक ईमेल से हटाएं PM मोदी की तस्वीर और 'सबका साथ सबका विकास' का नारा

Janjwar Desk
25 Sep 2021 12:40 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी की फोटो हटाने का निर्देश दिया
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 (सुप्रीम कोर्ट इस इमेल सुविधा का इस्तेमाल वकीलों को सूचना देने और नोटिस देने जैसे कार्यों के लिए करती है।)

Supreme Court ने इस पर सवाल उठाते हुए एनआईसी (NIC) द्वारा भेजे गए मेल में फुटर के रूप में पीएम मोदी और सरकार के नारे के साथ इस्तेमाल हुए बैनर को हटाने का निर्देश दिया...

Supreme Court जनज्वार। सुप्रीम कोर्ट ( supreme Court) की आधिकारिक मेल आईडी (E-mail ID) से फुटनोट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की तस्वीर और केंद्र सरकार का नारा "सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास" के इस्तेमाल पर विवाद हो गया। इस तस्वीर पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए इसे हटाने का आदेश दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने ईमेल में जुड़ी सुविधा उपलब्ध कराने वाले नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) को यह निर्देश दिया कि स्लोगन (slogan) को हटाएं और मौजूदा तस्वीर की जगह सुप्रीम कोर्ट की तस्वीर का इस्तेमाल करें। जिसके बाद नई तस्वीर के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फोटो का इस्तेमाल किया गया।

क्या है पूरा मामला

केंद्र सरकार द्वारा देश में प्रचार के लिए कई अभियान चलाए जाते हैं। नारे दिए जाते हैं। इसी कड़ी में केंद्र सरकार का एक नारा हैं, "सबका साथ,सबका विकास, सबका विश्वास"। इसी नारे के साथ राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर को आधिकारिक ईमेल के साथ जोड़कर सुप्रीम कोर्ट को मेल किया गया। इस मेल के फुटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो के साथ 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' वाले नारे वाली फोटो का इस्तेमाल किया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए एनआईसी (NIC) द्वारा भेजे गए मेल में फुटर के रूप में पीएम मोदी और सरकार के नारे के साथ इस्तेमाल हुए बैनर को हटाने का निर्देश दिया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट इस इमेल सुविधा का इस्तेमाल वकीलों को सूचना देने और नोटिस देने जैसे कार्यों के लिए करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया तस्वीर को हटाने का निर्देश

गुरुवार 22 सितंबर देर शाम वकीलों द्वारा आपत्ति जताई गई, जिसके बाद रजिस्ट्री के संज्ञान में यह बात आई कि सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक ईमेल के साथ पीएम की फोटो और एक चुनावी नारा भी जा रहा है, जिसका न्यायपालिका के कामकाज से कोई संबंध नहीं है। शुक्रवार, 23 सितंबर को शीर्ष अदालत द्वारा इसे हटाने के निर्देश जारी किए जाए।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कई वकीलों ने इस बात की पुष्टि की है कि फोटो को ईमेल के सिग्नेचर वाले हिस्से में शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार शुक्रवार की देर रात एक बयान में कहा गया कि इस राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ईमेल के फूटर में प्रयोग की गई फोटो को हटाया जाए। इसका न्यायपालिका से कोई संबंध नहीं है और इसकी जगह भारत के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट की तस्वीर का उपयोग किया जाए जिसके बाद एनआईसी ने इन निर्देशों का पालन किया।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के व्हाट्सएप ग्रुप पर उठाया गया मुद्दा

इस मामले को सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (AOR) के व्हाट्सएप ग्रुप (whatsApp Group) पर उठाया गया था। ग्रुप में लिखे गए संदेश में वकील ने लिखा कि, सर मुझे सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा नोटिस भेजा गया। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर दिखाई दे रही है। संदेश में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र अंग है, ना कि सरकार का हिस्सा।

ऐसे में आपसे अनुरोध है कि इस मामले को सीजेआई (CJI) के सामने उठाया और विरोध दर्ज कराएं। एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के सचिव Joseph Aristotle ने कहा कि वकीलों से औपचारिक (official) शिकायत प्राप्त होने के बाद आगे की कार्यवाही की योजना बनाई जाएगी।

मोदी के विज्ञापन बैनर को हटाया गया

आपको बता दें कि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AOR) ऐसे वकील होते हैं, जो सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने के योग्य होते हैं। केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (AOR) ही सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज करा सकते हैं। रजिस्ट्री अदालत में बैक_ इंड (Back- End) संचालन को संभालती है और मामलों की स्थिति पर एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (AOR) के साथ संवाद करती है।

दूसरी तरफ इस मामले पर ईमेल से जुड़ी सुविधा उपलब्ध कराने वाले नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) ने कहा कि इस स्क्रिप्ट का इस्तेमाल एनसीआई के सभी प्लेटफार्म के लिए किया जा रहा है। शिकायत के बाद सुप्रीम कोर्ट के प्लेटफार्म से इसे हटाने का कदम उठाया गया।

उन्होंने कहा कि इससे पहले हमने गांधी जयंती से संबंधित एक संदेश का इस्तेमाल किया था। इसके बाद रजिस्ट्री के द्वारा बयान जारी किया गया। जिसमें कहा गया है कि कल देर शाम रजिस्ट्री के संज्ञान में लाया गया था कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक ईमेल में फुटर के रूप में एक तस्वीर थी जिसका न्यायपालिका के कामकाज से कोई संबंध नहीं है।

कार्यवाही के बाद सर्वोच्च अदालत द्वारा एनआईसी को आधिकारिक ईमेल के फुटर से पीएम मोदी और नारे वाले विज्ञापन के बैनर को हटाने का निर्देश दिया गया। जिसके बाद नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) ने उन्हें शीर्ष अदालत की तस्वीर के साथ बदल दिया और एक अधिकारी द्वारा ईमेल का स्क्रीनशॉट (screenshot) भी साझा किया गया। जिसमें नारे और प्रधानमंत्री की तस्वीर के बजाय अदालत की तस्वीर थी।

ई-मेल में विज्ञापनों को बताया आपत्तिजनक

वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय नेकहा कि सुप्रीम कोर्ट और भारत की अन्य सभी अदालतें सरकारी कार्यालय नहीं है और सरकार के प्रचार तंत्र के रूप में इस्तेमाल करने का इसका इरादा नहीं है।

वहीं एक अन्य वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए बल्कि स्वतंत्र रूप में भी देखा जाना चाहिए। लोगों के मन में अगर न्यायपालिका की राजनीति से अलग होने की छवि को बनाए रखना है तो इस तरह के किसी भी एसोसिएशन को नजरअंदाज करना होगा।

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