राष्ट्रीय

UP Election 2022: चुनावी राजनीति में बिना गठबंधन मायावती के नहीं हैं, कोई मायने और मतलब!

Janjwar Desk
12 Dec 2021 7:14 AM GMT
UP Election 2022: चुनावी राजनीति में बिना गठबंधन मायावती के नहीं हैं, कोई मायने और मतलब!
x

(बीएसपी सुप्रीम मायावती)

UP Election 2022 : यूपी में बसपा तीन बार गठबंधन में चुनाव लड़ चुकी है और इसने मायावती को राजनीति में बुलंदियों तक पहुंचाया। इस बार गठबंधन में चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस और एआईएमआईएम की ओर से खुला आमंत्रण होने के बावजूद बसपा ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया है।

Mayawati की राजनीतिक शैली पर धीरेंद्र मिश्र का विश्लेषण



UP Election 2022 : फरवरी 2022 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सभी बड़े दल छोटे दलों के साथ गठबंधन करने में लगे हुए हैं, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ( BSP ) ने अकेले ही चुनाव लड़ने के अपने बयान पर टिकी हुई है। जबकि बसपा के लिए यूपी में गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरना सियासी तौर पर मुफीद रहा। गठबंधन में चुनाव की राजनति ने पार्टी को सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाया। बसपा की रणनीति को लेकर अब बातें खुलकर सामने आने लगी हैं।

बसपा अपने 38 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में तीन बार उत्तर प्रदेश में अलग-अलग दलों के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर चुकी है। तीनों बार मायावती ( BSP Supremo Mayawati ) को सियासी फायदा मिला। बसपा पहली बार 1993 में सपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव ( UP Assembly Election 2022 ) लड़ी और 1996 में कांग्रेस के साथ हाथ मिलकर किस्मत आजमाई। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा और आरएलडी से मिलकर चुनाव लड़ा और यूपी में पार्टी को सियासी जीवनदान मिला। इसके बावजूद बसपा का गठबंधन किसी दल से लंबा नहीं चला।

पहली बार 1991 में खुला था बसपा का चुनावी खाता

दरअसल, कांशीराम ने दलित समुदाय में सामाजिक चेतना जगाने और राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए साल 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। बसपा को शुरू के दो चुनाव में कोई सफलता नहीं मिली। साल 1991 के विधानसभा चुनाव में बसपा का खाता खुला। बसपा के 12 विधायक चुनाव जीतने में कामयाब रहे। पार्टी को 10.26 फीसदी वोट मिले। इस चुनाव से बसपा को यूपी में अपने लिए सियासी उम्मीद नजर आई और दलित समुदाय के अंदर एक नई राजनीतिक चेतना जगी।

1993 में बसपा ने पहली बार सपा से मिलाया था हाथ

1992 में अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद यूपी की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार गिर गई, जिसके चलते साल 1993 में विधानसभा चुनाव हुए। राममंदिर लहर में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने हाथ मिला लिया। बसपा-सपा ने मिलकर बीजेपी का यूपी से सफाया कर दिया, जिसका फायदा दोनों ही पार्टियों को जबरदस्त मिला। बसपा 12 से 67 सीटों पर पहुंच गई और सपा को 109 सीटें मिलीं। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन 1995 में सपा-बसपा का गठबंधन टूट गया।

भाजपा के सहयोग से 1995 में पहली बार बनीं सीएम

1993 में सपा के गठबंधन का सबसे बड़ा फायदा यह रहा कि बसपा पहली बार सत्ता के सिंहासन तक पहुंची। साल 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड से सपा और बसपा के रिश्ते खराब होते चले गए। 1995 में पहली बार मायावती सूबे की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन ऐसा बीजेपी के समर्थन से हो सका था। सपा से गठबंधन टूट जाने के बाद बसपा ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। इस तरह से प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहली कोई दलित महिला बैठने में सफल रही।

1996 में कांग्रेस का साथ मिलकर लड़ी चुनाव

बसपा सुप्रीमो मायावती ( BSP Supremo Mayawati ) की सरकार बहुत ज्यादा दिन नहीं चल सकी और छह महीने के बाद गिर गई, जिसके चलते यूपी में साल 1996 में विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। सपा-बसपा गठबंधन की तरह कांग्रेस के साथ चमत्कारी नहीं रहा, लेकिन बसपा के वोटों में जबरदस्त इजाफा हुआ। 1991 में 10.26 प्रतिशत वोट पाकर 12 विधानसभा सीटों पर सिमटी बसपा ने 1996 में 27.73 मत प्रतिशत के साथ 67 सीटों पर कब्जा जमा जमाया था। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, जिसके चलते यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया। विधानसभा चुनाव के बाद बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ लिया और 1997 में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं, लेकिन छह महीने के बाद इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बीजेपी से कल्याण सिंह, ओम प्रकाश और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। बीजेपी ने बसपा के तमाम विधायकों को तोड़कर अपने साथ मिला लिया था।

2007 में बसपा को मिला बहुमत

साल 2002 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, जिसके चलते बसपा ने फिर बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई और मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं। इस तरह गठबंधन की सीढ़ियों के सहारे आगे बढ़ती बसपा उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन पांच साल के बाद 2012 में सत्ता से बेदखल होने के बाद लगातार पार्टी का ग्राफ लगातार गिरा है.।

2017 में सिमट गई बसपा

2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुला और 2017 के विधानसभा चुनाव में वह 19 सीटों पर सिमट गई।

2019 बसपा में फिर आई जान

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती सपा प्रमुख अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरीं। इस गठबंधन का सबसे बड़ा फायदा मायावती की बसपा को मिला जबकि सपा और आरएलडी का कोई सियासी लाभ नहीं मिला। लोकसभा में बसपा जीरो से 10 सासंद वाली पार्टी बन गई। सपा 5 सीटों पर सिमट गई जबकि आरएलजडी के अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी भी जीत नहीं सके। लोकसभा चुनाव के बाद ही मायावती ने सपा और आरएलडी के साथ गठबंधन तोड़ लिया।

यूपी चुनाव 2022 : एकला चलो की रणनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में बीजेपी से लेकर सपा तक गठबंधन करने की कवायद में जुटे हैं तो बसपा प्रमुख मायावती किसी भी दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। अपने ऐलान पर वह अभी तक अडिग भी हैं। उन्होंने विधान परिषद के चुनाव के दौरान ही कह दिया था कि वो यूपी में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। बसपा के साथ कांग्रेस से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक गठबंधन करने की कवायद में हैं, लेकिन उनको मायावती की हरी झंडी नहीं मिल सकी है। हाल ही में मायावती की मां के निधन पर प्रियंका गांधी खुद उनके आवास पर गहरी संवेदना जाहिर करने पहुंची थी। उसके बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि बसपा—कांग्रेस के बीच गठबंधन हो सकता है, पर वैसा कुछ हुआ नहीं। ऐसे में देखना है कि मायावती 2022 के चुनाव में अकेले मैदान में उतरकर क्या करिश्मा दिखा पाती हैं? बसपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने कहा कि फिलहाल उनकी पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। अन्य किसी दल के साथ उत्तर-प्रदेश के चुनाव में जाने की अब तक सहमति नहीं बनी है। कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर उन्होंने कहा कि चर्चा हो रही है, लेकिन यह गठबंधन होगा या नहीं। इसको लेकर अभी तक कोई निर्णायक फैसला नहीं हुआ है।

मायावती : इसलिए भाग रही हैं गठबंधन से दूर

UP Election 2022 : मायावती ( Mayawati ) के सियासी इतिहास से साफ है कि उन्होंने हर बार गठबंधन केवल अपने लाभ के लिए किया। इस मामले में उनकी सोच साफ है कि जब गठबंधन से कोई और सीएम या पीएम हो सकता है तो कम सीट होने पर दलित सीएम क्यों नहीं हो सकता। गठबंधन की राजनीति का लाभ उठाकर वो भाजपा के सहारे 1995, 1997 और 2002 में सीएम बनीं। गठबंधन के दम पर वो अपनी पार्टी की बहुमत वाली सरकार भी बनाई। इसके बाद बसपा ने साल 2017 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों के साथ गठबंधन किया था लेकिन मोदी लहर में बसपा को कुछ हासिल नहीं हुआ। जबकि बसपा को यूपी में सियासी जीवनदान मिल गया।

इसके बावजूद मायावती बसपा से इसलिए गठबंधन नहीं करना चाहती, क्योंकि कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं है। सपा प्रमुख अखिलेश और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी 2019 लोकसभा चुनाव में गच्चा खाने के बाद उन भरोसा नहीं करते। एआईएमआईएम के साथ भी मायावती हाथ नहीं मिलाना चाहती हैं। ओवैसी के साथ हाथ मिलाने में उन्हें सियायी खतरा नजर नहीं आता। संभवत: इसी बात को भांपते हुए वह एकला चलो की रणनीति पर काम कर रही हैं।

Next Story

विविध