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रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार भेजने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का निहितार्थ क्या है?

Janjwar Desk
14 April 2021 7:36 AM GMT
रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार भेजने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का निहितार्थ क्या है?
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भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान 1980 और 1990 से रह रहे हैं जिन्हें यहां रहते हुए करीब 20 साल से अधिक समय हो चुका है, यूएनएचसीआर से रजिस्टर्ड भारत में रहने वाले रोहिंग्या की कुल संख्या 14000 है....

जनज्वार डेस्क। नॉर्थ जम्मू के डिटेंशन सेंटर में रखे गए 170 रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार भेजने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आदेश जारी करते हुए कहा कि कैंप में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को तब तक नहीं भेजा जा सकता, जब तक डिपोर्टेशन की पूरी प्रक्रिया का पालन न किया जाए।

कोर्ट ने याचिका लगाने वाले व्यक्ति की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उसने इन लोगों को रिहा करने की अपील की थी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

म्यांमार सरकार ने 1982 में राष्ट्रीयता कानून बनाया था जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया गया था। जिसके बाद से ही म्यांमार सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करती आ रही है। इस पूरे विवाद की जड़ करीब 100 साल पुरानी है, लेकिन 2012 में म्यांमार के राखिन राज्य में हुए सांप्रदायिक दंगों ने इसमें हवा देने का काम किया। रोहिंग्या मुसलमान और म्यांमार के बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय के बीच विवाद 1948 में म्यांमार के आजाद होने के बाद से ही चला आ रहा है। राखिन राज्य में जिसे अराकान के नाम से भी जाता है, 16 वीं शताब्दी से ही मुसलमान रहते हैं। ये वो दौर था जब म्यांमार में ब्रिटिश शासन था।

1826 में जब पहला एंग्लो-बर्मा युद्ध खत्म हुआ तो उसके बाद अराकान पर ब्रिटिश राज कायम हो गया। इस दौरान ब्रिटिश शासकों ने बांग्लादेश से मजदूरों को अराकान लाना शुरु किया। इस तरह म्यांमार के राखिन में पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से आने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई। बांग्लादेश से जाकर राखिन में बसे ये वही लोग थे जिन्हें आज रोहिंग्या मुसलमानों के तौर पर जाना जाता है। रोहिंग्या की संख्या बढ़ती देख म्यांमार के जनरल ने विन की सरकार ने 1982 में बर्मा का राष्ट्रीय कानून लागू कर दिया।

इस कानून के तहत रोहंग्या मुसलमानों की नागरिकता खत्म कर दी गई। रखाइन म्यांमार के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बांग्लादेश की सीमा पर बसा एक प्रांत है, जो 36 हजार 762 वर्ग किलोमीटर में फैला है। सितवे इसकी राजधानी है। यहां करीब 29 हजार मुसलमान रहते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की करीब 10 लाख की आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था। रिपोर्ट में इस 10 लाख की आबादी को मूल रूप से इस्लाम धर्म को मानने वाला बताया गया है। जनगणना में शामिल नहीं की गई आबादी को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं।

रखाइन प्रांत में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था। म्यांमार की नेता आंग सान सू की ने रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों को चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई बताकर उसका बचाव किया था।

भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान 1980 और 1990 से रह रहे हैं जिन्हें यहां रहते हुए करीब 20 साल से अधिक समय हो चुका है। यूएनएचसीआर से रजिस्टर्ड भारत में रहने वाले रोहिंग्या की कुल संख्या 14000 है। एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में कुल 40000 रोहिंगिया हैं। ये रोहिंगिया जम्मू, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली -एनसीआर और राजस्थान में अलग अलग जगहों पर रहते हैं। भारत में सबसे ज्यादा रोंहिग्या जम्मू में बसे हैं, यहां करीब 10,000 रोंहिग्या रहते हैं।

सितंबर 2017 में भारत सरकार ने रोहिंग्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में कहा था कि रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए एक खतरा हैं। सरकार ने आशंका जताई थी कि इनका कट्टरपंथी वर्ग भारत में बौद्धों के खिलाफ हिंसा फैला सकता है। खुफिया एजेंसियों का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि इनका संबंध पाकिस्तान और अन्य देशों में सक्रिय आतंकवादी संगठनों से है और ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकते हैं।

सिटिज़नशिप अमेंडमेंट ऐक्ट के बाद रोहिंगिया मुस्लिम के नागरिकता का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है। नए क़ानून के मुताबिक़ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से धार्मिक अत्याचार के शिकार हिंदू ,सिख, बौद्ध ,जैन ,पारसी और ईसाई को ही नागरिकता मिलेगी। इन सभी रोहिंगिया मुसलमानों को या तो वापस जाना होगा या फिर भारत सरकार इन्हें डिटेंशन कैम्प में ही रखेगी।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यों की पीठ ने गुरुवार को ये फैसला सुनाया। सलीमुल्लाह नाम के व्यक्ति की याचिका पर प्रशांत भूषण ने इस केस की पैरवी की। प्रशांत भूषण ने इंटरनेशनल कोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था कि इन रोहिंग्या मुसलमानों की जान को म्यांमार में खतरा है, इसलिए इन्हें डिपोर्ट नहीं किया जाना चाहिए। ये मानव अधिकारों का उल्लंघन है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने दलील दी थी कि डिंटेशन सेंटर में रखे गए रोहिंग्या शरणार्थी नहीं, बल्कि घुसपैठिए हैं। ये लोग देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि भारत घुसपैठियों की राजधानी नहीं है। इसे ऐसा नहीं बनने दिया जाएगा। सरकार कानून के मुताबिक ही अपना काम कर रही है।

सुनवाई में भूषण ने कहा था कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार को लेकर पिछले साल 23 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय अदालत ने अपना फैसला दिया। इसमें कहा था कि म्यांमार में सेना ने निर्दोष लोगों की हत्याएं की हैं। इससे करीब 7.44 लाख रोहिंग्या बेघर होकर पड़ोसी देशों में भागने को मजबूर हुए। जवाब में सीजेआई ने कहा कि यह याचिका केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। दूसरे देश के नागरिकों के लिए नहीं।

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