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एक मुस्लिम चरवाहे ने की थी अमरनाथ गुफा की खोज

Janjwar Team
14 July 2017 10:33 AM GMT
एक मुस्लिम चरवाहे ने की थी अमरनाथ गुफा की खोज
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शुरुआत में चमत्कार की आस में हर साल अपने जीवन में कष्टों को दूर करने और सुख समृद्धि के लिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों अमरनाथ गुफा में आते थे, मगर मुस्लिमों में बुत पूजा की मनाही के कारण उनका यहां आना बंद हो गया। इस पूरी कथा को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ बता रहे हैं तैश पोठवारी

कश्मीर में अमरनाथ यात्रा कब शुरू हुई? यह देखते ही देखते हिन्दुओं के एक प्रमुख तीर्थ स्थल में कब तब्दील हो गई? यह एक ऐसा सवाल है जिसका सीधा जवाब किसी हिन्दू धर्म के जानकार या पंडित के पास नहीं है।

या फिर उसके पीछे एक ऐसी सच्चाई है जिसका जिक्र तो हर कहीं होता है, यहां तक कि अमरनाथ यात्रा की आधिकारिक वेबसाइट में भी इसका जिक्र है। मगर अमरनाथ यात्रा का इतिहास क्या है, ये कब शुरू हुई इसकी चर्चा करने से हर कोई बचता है। जवाब में पौराणिक कथाओं के सुने सुनाए धार्मिक किस्से—कहानियों को सुनाकर इसे टाल दिया जाता है।

अमरनाथ गुफा की खोज आज से 117 वर्ष पहले 1850 में एक गुर्जर मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक ने तब की थी, जब वह अपनी भेड़ को ढूंढ़ते—ढूंढ़ते गुफा तक पहुंचा। वापिस लौटने पर उसने गांव में कहानी सुनाई कि एक नई गुफा के पास उसे एक साधु मिला, जिसने उसे कोयले से भरा थैला दिया जो घर पहुँचने पर सोने में बदल गया। जब वह वापिस साधु से मिलने गया तो साधु उसे गायब मिला।

उसने आसपास के गांवों में इस बात का प्रचार करना शुरू कर दिया। इसी से प्रभावित होकर आसपास के गांवों के लोगों जिनमें हिन्दू भी बड़ी संख्या में रहते थे, ने वहां आकर पूजा करनी शुरू कर दी। ऐसा भी कहा जाता है कि शुरुआत में चमत्कार की आस में हर साल अपने जीवन में कष्टों को दूर करने और सुख समृद्धि के लिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों गुफा में आते थे। मुस्लिम धर्म में किसी बुत की पूजा की मनाही होने के कारण यहां मुस्लिमों का आना कम होता गया और हिंदू धर्म में चूंकि मूर्ति पूजा होती है इसलिए हिंदुओं की तादाद बढ़ती गई और धीरे—धीरे यह हिंदू आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।

जब यह चमत्कारी गुफा हिन्दुओं में प्रसिद्ध हो गई तो गुफा की खोज करने वाले मुस्लिम बूटा मलिक ने हिन्दू पुजारियों के साथ मिलकर चढ़ावे की रकम को आपस में बांटने के लिए एक लिखित समझौता किया। यह समझौता किसी और ने नहीं बल्कि जम्मू के राजा डोगरा गुलाब सिंह 1792 -1852 के आदेश से हुआ।

समझौते के तहत राजा ने आदेश दिया कि चूंकि गुफा और यात्रा की खोज बूटा मलिक ने की है इसलिए अमरनाथ गुफा के मंदिर में पूजा के समय हमेशा उनके परिवार का एक सदस्य मौजूद रहेगा और चढ़ावे का कुछ हिस्सा मंदिर के पुरोहित उनकी आने वाली पीढ़ियों को देते रहेंगे। बाकी आमदनी पर हिन्दू पुरोहितों जिनमें पीढ़ी—दर—पीढ़ी गिरी महंत रहे, उनका अधिकार रहेगा।

अमरनाथ यात्रा की आय का बंटवारा बूटा मलिक और गिरी महंतों की पीढ़ियों में साल 2000 तक श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के गठन तक बिना विवाद के आपसी सहमति से होता रहा। 12 फरवरी, 2001 को अमरनाथ श्राइन एक्ट बना और इसके जरिए अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने अमरनाथ मंदिर की आय में पीढ़ी दर चला आ रहा परिवारों का हिस्सा समाप्त कर दिया।

इसके तहत दोनों पार्टियों को एक ही बार पैसा लेकर वन टाइम सेटलमेंट करने को कहा गया। अपना भारी आर्थिक नुकसान होते देख हिन्दू पुरोहितों ने श्राइन बोर्ड के खिलाफ केस किया, जिसकी सुनवाई के लिए जस्टिस एच एन मिश्रा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। ट्रिब्यूनल ने 23 जनवरी, 2004 को अपना फैसला सुनाया।

जम्मू कश्मीर के उस समय के उप राज्यपाल एसके सिन्हा जो उस समय श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष भी थे, ने अगस्त 2005 को महंत दीपेंद्र गिरी को 10244000 का चेक दिया। इस सारे चले विवाद में महंत दीपेंद्र गिरी ने अमरनाथ यात्रा की आय में पुश्तैनी हक़ खत्म किये जाने की एवज में 3 करोड़ मुआवजा माँगा। श्राइन बोर्ड के सामने उन्होंने खुद एक सवाल के जवाब में माना कि पिछली 3 वर्षों में अमरनाथ मंदिर से 10580141 रुपए उनकी आमदन हुई और जिसकी एवज में मंदिर पर उन्होंने सिर्फ 539702 रूपए खर्च किये।

अब्दुर जब्बार मलिक जो बूटा मलिक वंशज हैं, उन्हें श्राइन बोर्ड ने 112000 रुपए मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि यह न के बराबर है। उसूलन आमदनी का एक तिहाई हिस्सा उन्हें पीढ़ी—दर—पीढ़ी देने का समझौता हुआ था।

खबरों के मुताबिक फिलहाल बूटा मलिक के वंशज अमरनाथ गुफा के आसपास मजदूरी आदि करके जीवन निर्वहन करते हैं।

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