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संस्कृति

यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं

Janjwar Team
24 Nov 2017 9:43 AM GMT
यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं
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'सप्ताह की कविता' में आज ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं

'खून चाटती हुई वायु में /पैनी कुसी खेत के भीतर /दूर कलेजे तक ले जाकर /जोत डालता है मिट्टी को /यह धरती है उस किसान की /नहीं कृष्ण की नहीं राम की /नहीं तेग तलवार धर्म की...'

राजनीतिक व्यंग्य हालाँकि नागार्जुन का स्थायी भाव है, पर केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में एक बाँकापन है, जो उन्हें नागार्जुन से अलग करता है- 'हमका न मारौ नजरिया /ऊँची अटरिया माँ बैठी रहौ तुम, /राजा की ओढ़े चुनरिया। /वेवेल के संग माँ घुमौ झमाझम, /हमको बिसार गुजरिया...' केदार जी के यहां श्रम की चुनौतीपूर्ण अभिव्यक्ति की कठोर गतिशील कविताएँ भी हैं।

एक श्रमिक की संतान के जन्म पर वे लिखते हैं -'माता रही विचार अंधेरा हरनेवाला और हुआ /सुन ले री सरकार कयामत ढाने वाला और हुआ /एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ...' इन पंक्तियों को पढ़कर आमजन के भीतर शिथिल पड़ी श्रमिक ग्रंथियाँ भी सक्रिय हो उठती हैं।

हम कुछ गढ़ने को बेचैन हो उठते हैं - जिंदगी को वह गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं/लौह के सोये असुर को कर्म रथ में जोतते हैं /जिंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं... और श्रम की जीवित प्रतिकृति हमारे समक्ष खड़ी हो जाती है।

हर कवि कभी न कभी काल को चुनौती जरूर देता है। श्रीकांत वर्मा सा काल-कवलित होने से डरता कवि अपवाद ही होता है। उर्वशी में शौर्य के दंभ में पुरूरवा नहीं दिनकर ही हुँकारते हैं - मेरी बाँहों में गरुड़ गजराज का बल है /उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं... शमशेर भी काल से सीधी होड़ लेते हैं - काल तुझसे होड़ है मेरी/ अपराजित तू...

केदार जी भी सूरज से आँखें मिलाते हैं - मैंने आँख लड़ाई गगन विराजे राजे रवि से, शौर्य में, /धरती की ममता के बल पर मैंने ऐसी क्षमता पाई... सूर्य काल की घड़ी की एक सूई है। दिनकर दंभ में खुद को ही सूर्य कह देते हैं, इसीलिए वे अंत में हारते हैं काल से और हरिनाम लेते हैं। काल से होड़ शमशेर भी लेते हैं व अपने को अपराजित कहते हैं, पर वे यह नहीं भूलते कि उनकी अपराजितता अपराजित काल का ही अंश है।

केदार जी का भावार्थ भी वही है, पर यहाँ काल को चुनौती का यथार्थ ज्यादा स्पष्ट है। सूर्य अगर बड़ी सूई है, तो धरती काल की छोटी सूई है। और काल की इकाई में उनका बड़प्पन-छुटपन कोई मानी नहीं रखता, दोनों एक-दूजे के अग्र व अनुगामी साथ-साथ हैं। और यह चुनौती दोनों के अंतरसंबंधों का उद्घाटन है। इस चुनौती के पीछे ममता की, प्यार की शक्ति काम करती है। आइए पढ़ते हैं केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं - कुमार मुकुल

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

जो जीवन की आग जलाकर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा।

मजदूर का जन्‍म
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!
हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ!
सूरज-सा इन्सान,
तरेरी आँखोंवाला और हुआ!!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!
माता रही विचार,
अँधेरा हरनेवाला और हुआ!
दादा रहे निहार,
सबेरा करनेवाला और हुआ!!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ।
जनता रही पुकार,
सलामत लानेवाला और हुआ!
सुन ले री सरकार!
कयामत ढानेवाला और हुआ!!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!

खजुराहो के मंदिर
चंदेलों की कला-प्रेम की देन देवताओं के मन्दिर
बने हुए हैं अब भी अनिंद्य जो खड़े हुए हैं खजुराहो में,
याद दिलाते हैं हम को उस गए समय की
जब पुरुषों ने उमड़-उमड़ कर
रोमांचित होकर समुद्र-सा,
कुच-कटाक्ष वैभव-विलास की
कला-केलि की कामिनियों को
बाहु-पाश में बांध लिया था,
और भोग-सम्भोग-सुरा का सरस पान कर,
देश-काल को, जरा-मरण को भुला दिया था।

चले गए वे कामकण्ठ-आभरण पुरुष-जन;
चली गईं वे रूप-दीप-दीपित-बालाएँ;
लोप हुई वे मदन-महोत्सव की लीलाएँ;
शेष नहीं रह गईं हृदय की वे स्वर-ध्वनियाँ!

किन्तु मूर्तियाँ पुरुष-जनों की
और मूर्तियाँ कामिनियों की
ज्यों की त्यों निस्पन्द खड़ी हैं उसी तरह से
देव-मन्दिरों की दीवारों पर विलास के हाव-भाव से।

काल नहीं कर सका उन्हें खण्डित कृपाण से
किन्तु किसी दुर्धर मनुष्य ने
गदा मार कर कहीं-कहीं पर तनिक-तनिक-सा तोड़ दिया है;
और आज तक इसीलिए वे
उसे कोसती हैं क्षण-प्रतिक्षण।
नर हैं तो आजानु-बाहु उन्नत ललाट--
रागानुराग-रंजित शरीर हैं,
अधर-पान, कुच-ग्रहण,
और आलिंगन में आसक्त लीन हैं।
तिय हैं तो आकुलित केश-पट-नदी-वेश,
कामातुर-मद विह्वल अधीर हैं,
सदियों से पुरुषों की जांघों पर बैठी करती विहार हैं।

इन्हें नहीं संकोच-शील है;
यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं,
आदि काल से इसी मोद के अधिकारी हैं;
चाहे हम-तुम कहें इन्हें, ये व्याभिचारी हैं!

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