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किसानों के विरोध से मोदी सरकार पर पड़ा असर, RECP में नहीं शामिल होगा अभी भारत

Vikash Rana
4 Nov 2019 2:35 PM GMT
किसानों के विरोध से मोदी सरकार पर पड़ा असर, RECP में नहीं शामिल होगा अभी भारत
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सरकार का आरसीईपी से पीछे हटना किसानों की बड़ी मगर पहली जीत है। अभी आगे और संघर्ष बाकी है। अगर किसान जरा सी भी ढिलाई बरतेंगे, सरकार फिर वही काला कानून लाद देगी...

जनज्वार दिल्ली- गुपचुप तरीके से RECP पर समझौता करने जा रही सरकार ने किसानों और पार्टियों के भारी विरोध के बाद यू टर्न ले लिया है. देश के हर कोने कोने में किसान संगठनों द्वारा जारी आंदोलन का असर हैं कि सरकार विश्व के 16 देशों मे हो रही RECP (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी) में शामिल नहीं हो रहा है. हालांकि सरकार की ओर से कारण स्पष्ट्र नहीं किया गया है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार से लेकर झारखंड तक किसान, किसान संगठनों और पार्टियों ने जमकर विरोध किया.

दिल्ली में किसान संघर्ष समिति के बैनर तले विरोध प्रदर्शन करते हुए स्वराज इंडिया के अध्यक्ष और किसान नेता योंगेद्र यादव ने सरकार का आरसीईपी से पीछे हटना किसानों की बड़ी मगर पहली जीत है। अभी आगे और संघर्ष बाकी है। अगर किसान जरा सी भी ढिलाई बरतेंगे, सरकार फिर वही काला कानून लाद देगी।

खिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के आह्वान पर देश भर के किसान "NO TO RCEP" कहने के लिए एक साथ आए। 250 से अधिक किसान संगठनों के फ़ॉरम AIKSCC ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) मुक्त व्यापार समझौते में कृषि को शामिल करने के खिलाफ केंद्र सरकार को चेतावनी देने के लिए 4 नवंबर को आज विरोध प्रदर्शन किया. AIKSCC के नेतृत्व में किसानों ने 500 से अधिक केंद्रों पर RCEP के पुतले जलाए, जिनमें से ज्यादातर जिला मुख्यालय हैं.



AIKSCC ने बताया कि वाणिज्य मंत्री ने 9 दिनों पहले तक RCEP समझौते को समाप्त कर दिया था, किसान एकता और विपक्ष ने प्रधानमंत्री को इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से अस्थायी रूप से वापस पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। यह भारत के किसानों के लिए एक जीत है। किसानों, श्रमिकों, छोटे व्यापारियों और कई राजनीतिक दलों के एंटी-आरसीईपी स्टैंड के अनुसार, भारत सरकार समझौते पर हस्ताक्षर करने पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो गयी है, RCEP का खतरा जारी है क्योंकि यह कहा गया है कि ये फरवरी 2020 में संपन्न होगा।

स्वराज इंडिया के महासचिव अभिक साहा ने कहा, 'भारत को मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने से दूर रहना चाहिए और कृषि को ऐसे किसी भी समझौते से दूर करना चाहिए। EU–US FTA कृषि में शामिल नहीं है. वर्तमान में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका के दबाव में है कि भारत सस्ते अनाज, दाल, मुर्गी, दूध आयात करे। RCEP डील से भारतीय बाजारों को दूध, दूध उत्पादों, कपास, गेहूं, मसालों, नारियल, रबर के बाढ़ का खतरा है.'

किसान आंदोलनों में सक्रिय और AIKSCC के सहयोगी सगंठनों से जुड़े अर्जुन प्रसाद ने बताया, ' RECP एग्रीमेंट में जो फ्री ट्रेड की ट्रीटी हो रही है उसमे कोई आयात या निर्यात के लिए कर नहीं और शून्य कर के आधार पर समान को लाया जाएगा। जिसके लिए 21 पॉइंट का एक दस्तावेज भी बनाया जा रहा है. इस शून्य कर के कारण हमारे दुग्ध उत्पादकों और किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला हैं.'

AIKSCC से जुड़े पी कश्यप प्रसाद ने RCEP पर अपनी राय रखते हुए कहा, 'आज भारत के भविष्य को लेकर भारत का प्रधानमंत्री वहां पर मौजूद है लेकिन भारत की संसद को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है भारत की जनता जिसमें सबसे ज्यादा किसान हैं उसकों इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है उनकों नहीं पता है कि इस दस्तावेज में क्या क्या हैं और उनके भविष्य में क्या असर डाल सकता हैं'

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