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शेल्टर होम बलात्कार कांड पर बिहार के प्रमुख अखबारों में सन्नाटा

Prema Negi
24 July 2018 10:54 AM GMT
शेल्टर होम बलात्कार कांड पर बिहार के प्रमुख अखबारों में सन्नाटा
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मुजफ्फरपुर के एक शेल्टर होम में बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले में बिहार की राजधानी पटना के अखबारों द्वारा इस खबर को प्रमुखता से पहले पन्ने पर न छापा जाना बताता है कि वह नीतीश कुमार के मूड और छवि का खास बचाव कर रहे हैं...

वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार का विश्लेषण

नीतीश कुमार ने सप्रयास अपनी छवि बनाई है बिहार के सुशासन बाबू की। इसमें मीडिया की अहम भूमिका है। भाजपा/एनडीए सरकारों की यह खास रणनीति रही है कि मीडिया को मैनेज कर लो और मनमाने तरीके से लूट खसोट जारी रखो, लेकिन धीरे—धीरे यह मुलम्मा उतर रहा है। मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम बलात्कार कांड ने इस तथ्य को बेनकाब कर दिया है कि बिहार में सत्ता का चेहरा कितना घिनौना है।

विडंबना यह कि झारखंड में मदर टेरेसा की संस्थान से कथित रूप में बच्चा बेचे जाने की घटना पर कोहराम मचाने वाले हिंदी के क्षेत्रीय अखबार मुजफ्फरपुर की घटना पर अतिरिक्त रूप से शांत दिखाई दे रहे हैं। पटना के मुख्य संस्करणों में यह खबर मुख्य पृष्ठ पर नजर नहीं आई।

प्रभात खबर और दैनिक भास्कर ने पहले पन्ने पर एक शब्द भी नहीं छापा है, तो दैनिक जागरण ने पांच लाइन हाशिए पर दिया है, जबकि हिंदुस्तान ने बॉटम में विज्ञापनों की बीच इस खबर को अटका दिया है।

हालांकि कल इस बात की पुष्टि हो गई की वहां के शेल्टर होम की कम से कम 16 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है। कल्याण विभाग के संरक्षण में एक एनजीओ द्वारा यह शेल्टर होम चलाया जा रहा था, जिसमें 44 लड़कियां रह रह रही थी। इस मामले का अनुसंधान कर रही पुलिस अधीक्षक ने बताया कि इन लड़कियों की उम्र 7 से 18 वर्ष के बीच की है। इस मामले में शेल्टर होम के संचालक ब्रजेश ठाकुर सति दस लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

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जानकारी के अनुसार न जाने कब से यह सब चल रहा था, लेकिन इसी वर्ष मई महीने में टाटा इंस्टीच्यूट आॅफ सोशल साईंस ने इस संस्था का सोसल आॅडिट किया और इस संस्थान में नर्क भोग रही लड़कियों की कहानी अपने 100 पृष्ठों की रिपोर्ट में दर्ज की। इस रिपोर्ट के आधार पर कल्याण विभाग ने पुलिस में मामला दर्ज किया और यह भीषण कहानी प्रकाश में आई।

एक पीड़ित लड़की ने तो बयान यहां तक दिया कि यौन शोषण का विरोध कर रही एक लड़की को पीटते—पीटते मार डाला गया और संस्थान के प्रांगण में ही उसे दफना दिया गया। उस लड़की के बयान के बाद कल उस जगह की खुदाई हुई, यह अलग बात कि खुदाई में कोई शव नहीं मिला। बहुत संभव है, जांच प्रक्रिया शुरू होने के बाद आनन—फानन उस शव या उसके अवशेष को गायब कर दिया गया हो।

वैसे, इस तरह की बातों के प्रकाश में आने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

राजनीति बुरी तरह विभाजित और पतित हो चुकी है और मीडिया सत्ता द्वारा संचालित। झारखंड में भाजपा सरकार चाहती थी कि पत्थरगड़ी और ईसाई मिशनरियों को मीडिया पत्रकारिता के उसूलों को ताक पर रख कर खूब प्रचारित करे, बिहार में एनडीए की सरकार इस मामले को दबाना चाहती और नीतीश की छवि को बचाना चाहती है तो क्षेत्रीय अखबार यह काम बखूबी करने में लगे हैं।

लेकिन इतिहास शायद नीतीश को माफ न करे।

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