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राजनीति

राफेल मामले में फिर फंसी मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Prema Negi
10 April 2019 1:40 PM GMT
राफेल मामले में फिर फंसी मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
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राफेल मामले में मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में गलत हलफनामा देना पड़ा भारी

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने राफेल स्कैम मामले में केंद्र सरकार की शुरुआती आपत्ति को ख़ारिज कर दिया है। सरकार ने मामले में पहले सुनाए गए फै़सले को बनाए रखने और पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने की बात कही थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया है।

मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ़ की पीठ कर रही है। दरअसल कोर्ट में सरकार का पहले गलत हलफनामा देना पड़ा भारी और इस दौरान अंग्रेजी अख़बार द हिन्दू में एक के बाद एक विस्फोटक खुलासों के दस्तावेजों ने देशभर में तहलका मचा दिया।

यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब लोकसभा चुनाव प्रचार पूरे उफान पर है। गुरुवार 11 अप्रैल को पहले चरण का मतदान है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के राजनीतिक निहितार्थ तो निश्चित हैं और इससे राफेल डील में अनियमितताओं के आरोपों को प्रथमदृष्टया वैधता मिलती दिख रही है।

अब तक भाजपा राफेल में उच्चतम न्यायालय द्वारा क्लीनचिट मिलने का सार्वजनिक दावा करती रही है, लेकिन अब इस पर न्यायालय का गम्भीर प्रश्नचिन्ह लग गया है। उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले से चुनाव में “चौकीदार की ईमानदारी” पर और गर्माहट आनी निश्चित है।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी नराफेल मुद्दे पर रक्षात्मक है और उसने इसे रक्षा बलों और देश की सुरक्षा से जोड़ रखा है। अब विपक्ष का पहले से अधिक आक्रामक होना तय है। राहुल गाँधी पहले से लगातार 'चौकीदार चोर है' जैसे नारे उछाल रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय सरकार की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए राफेल मामले में रिव्यू पिटिशन पर नए दस्तावेज के आधार पर सुनवाई की फैसला किया है। तीन सदस्यीय पीठ ने एकमत से दिए फैसले में कहा कि जो नए दस्तावेज पब्लिक डोमेन में आए हैं, उन आधारों पर मामले में रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई होगी।

पीठ ने कहा कि जहां तक राफेल फैसले पर समीक्षा याचिका की सुनवाई का सवाल है, इस पर बाद में विस्तृत सुनवाई की जाएगी। उच्चतम न्यायालय अब पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए नई तारीख तय करेगा। राफेल मामले में उच्चतम न्यायालय को यह तय करना था कि इससे संबंधित डिफेंस के जो दस्तावेज लीक हुए हैं, उस आधार पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई की जाएगी या नहीं।

केंद्र ने सुनवाई का किया था विरोध

केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में लीक दस्तावेजों के आधार पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई का विरोध किया था और कहा था कि ये दस्तावेज अत्यंत गोपनीय हैं और इस कारण पुनर्विचार याचिका खारिज किया जाना चाहिए। हालांकि उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान जस्टिस के. एम. जोसेफ ने कहा था कि आरटीआई ऐक्ट 2005 में आया है और ये एक क्रांतिकारी कदम था ऐसे में हम पीछे नहीं जा सकते।

केंद्र ने लीक दस्तावेजों को बताया था गोपनीय

सरकार ने कहा था कि जो दस्तावेज प्रशांत भूषण ने पुनर्विचार याचिका के साथ पेश किए हैं वह गोपनीय दस्तावेज है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं। ये दस्तावेज साक्ष्य अधिनियम के तहत भी गोपनीय दस्तावेज हैं। साक्ष्य अधिनियम के तहत गोपनीय दस्तावेज पेश नहीं किया जा सकता। जो दस्तावेज राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो, दो देशों के सम्बंध पर असर डालता हो उन्हें गोपनीय दस्तावेज माना गया है।

अनुच्छेद-19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर कुछ अपवाद भी हैं। जहां देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला होगा वहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रोक के दायरे में आती है। आरटीआई के तहत भी देश की संप्रभुता से जुड़े मामले को अपवाद माना गया है। सरकारी गोपनीयता कानून की धारा-3 और 5 में भी रोक है।

पब्लिक डोमेन में हैं दस्तावेज

इस दौरान याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि ये तमाम दस्तावेज पब्लिक डोमेन में है। जो दस्तावेज पहले से लोगों के सामने है, उस पर कोर्ट विचार न करे क्योंकि ये प्रिविलेज्ड दस्तावेज है, यह बेकार की दलील है। एविडेंस ऐक्ट के तहत जो दस्तावेज पब्लिक डोमेन में लाने से रोका गया है, वे वैसे दस्तावेज हैं जो पहले से गोपनीय हैं और प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन इस मामले में डिफेंस के दस्तोवज पहले से लोगों के सामने है। केंद्र सरकार ने अभी तक मामले में केस दर्ज नहीं किया। पहली बार 18 नवंबर को ये रिपोर्ट वेबसाइट पर छपी। सीएजी रिपोर्ट सरकार ने पेश किया है। उसमें डिफेंस डील से संबंधित जानकारी है।

भूषण की दलील थी कि सरकार ने खुद सीएजी रिपोर्ट को कोर्ट में पेश किया। ऐसे में उनकी ओर से पेश दस्तावेज को प्रिविलेज्ड दस्तावेज कैसे कह सकते हैं। उधर प्रेस काउंसिल कहता है कि मीडियाकर्मी सोर्स बताने के लिए बाध्य नहीं हैं। एसपी गुप्ता से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे रखी है कि कोई दस्तावेज गोपनीय है या नहीं और देश की सुरक्षा से जुड़ा है, इस बात को पब्लिक इंट्रेस्ट में परखा जाएगा।

इस मामले में दस्तावेज पहले से पब्लिक में है। सरकार खुद की अपने लोगों को इस तरह की जानकारी लीक करती रही है। रक्षामंत्री की फाइल नोटिंग भी इसी तरह लीक की गई। 2जी मामले और कोल ब्लॉक मामले में भी दस्तावेज पब्लिक डोमेन में आए थे और उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि विसल ब्लोअर का नाम बाहर लाने की जरूरत नहीं है। अगर दस्तावेज केस के लिए जरूरी हैं तो यह बात औचित्यहीन है कि उसे कहां से और कैसे लाया गया है। अगर दस्तावेज करप्शन के केस के लिए औचित्यपूर्ण है तो इस बात का मतलब नहीं रह जाता कि ये कहां से लाया गया।

पहले सुप्रीम कोर्ट ने दी थी क्लीनचिट

उच्चतम न्यायालय ने राफेल मामले में जांच की मांग से संबंधित याचिका को 14 दिसंबर 2018 को खारिज कर दिया था, जिसके बाद पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है, जिस पर ओपन कोर्ट में सुनवाई हुई थी। 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस ऐतराज पर फैसला सुरक्षित कर लिया था कि क्या अत्यंत गोपनीय दस्तावेज पर विचार करते हुए पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई हो या नहीं।

पिछले साल मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा था कि प्रक्रिया में विशेष कमी नहीं रही है और केंद्र के 36 विमान खरीदने के फैसले पर सवाल उठाना सही नहीं है। न्यायालय ने कहा था कि विमान की क्षमता में कोई कमी नहीं है।अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय ने कहा था, हम पूरी तरह से संतुष्ट है कि राफेल सौदे की प्रक्रिया में कोई कमी नहीं रही।

देश को सामरिक रूप से सक्षम रहना आवश्यक है। न्यायालय के लिए अपीलकर्ता प्राधिकारी के रूप में बैठना और सभी पहलुओं की जांच करना संभव नहीं है। हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे साबित होता हो कि इस सौदे में किसी के व्यापारिक हित साधे गए हों।

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