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पेट की खातिर और कितने विकास—राजेश चढ़ेंगे इन सीवरों की भेंट

Janjwar Team
27 Sep 2017 2:56 PM GMT
पेट की खातिर और कितने विकास—राजेश चढ़ेंगे इन सीवरों की भेंट
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सीवरकर्मियों की सीवर सफाई के दौरान मौत की यह न तो पहली घटना है और न अंतिम। दो माह के अंदर दिल्ली के छतरपुर, लाजपतनगर, कड़कड़डूमा, एलएनजेपी अस्पताल, मुंडका और नोएडा सेक्टर 52 में इस तरह की ढेरों घटनाएं घट चुकी हैं, पर सिवाय फौरी आश्वासनों के इन मामलों में न कुछ हो पाया है, न ही लगता है कुछ हो पाएगा। गरीबों की मौत कोई मायने नहीं रखती शासन—प्रशासन के लिए...

सीवरकर्मियों के घरों से लौटकर सुनील कुमार की रिपोर्ट

दिल्ली और एनसीआर में पिछले दो माह से लगातार सीवरेज में दुर्घटना की खबरें आ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में कम से कम 15 लोगों की जान जा चुकी है। अभी हालिया घटना 21 सितम्बर, 2017 को नोएडा के सेक्टर 110 के बीडीएस मार्केट के पास घटी जिसमें विकास, राजेश और रवीन्द्र की जान चली गई। ये तीनों मृतक आपस में मामा, भांजे, भाई थे।

उस परिवार के हालात आसानी से समझे जा सकते हैं जिसके घर में मां-बेटी ने एक साथ अपने बेटे को खोया हो, यही कारण है कि पार्वती और सविता का रो-रोकर बुरा हाल है। विकास, राजेश और रवीन्द्र झारंखड के गोड्डा जिले के रहने वाले हैं और अपने परिवार के साथ नोएडा सेक्टर 9 की झुग्गियों में रहते थे।

सबसे पहले मैं विकास के घर पर पहुंचा। विकास के घर जाने का जो रास्ता है उस रास्ते से कोई भी अनजान व्यक्ति विकास के घर तक नहीं पहुंच सकता। वह गलियां इतनी तंग थी कि दो व्यक्ति क्रास करें तो दोनों को अपने शरीर को दीवार से सटाना होता है, ऊपर से जगह के अभाव में लोगों ने गलियों को भी ढक दिया है, जिससे कि उनके रहने के लिए थोड़ी जगह मिल जाए।

जब मैं विकास के घर पहुंचा तो बिजली नहीं थी, घर में अंधेरा था। उसी अंधेरे में 6 बाई 6 के कमरे में विकास की मां, बहन, नानी, पिता, मामा शोकाकुल बैठे हुए थे। मां और नानी दोनों का रो—रोकर बुरा हाल था। विकास के पिता उपेन्द्र शाह रिक्शा चलाते हैं जिससे वह दुकानों के माल एक जगह से दूसरे जगह पर पहुंचाते हैं, मां फैक्ट्री में 4000 रुपए पर काम करती है। बहन बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी है।

विकास अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करने लगा था, जिससे परिवार को इस अंधेरे कमरे से निकाल सके। इसी कारण बारहवीं करने के बाद विकास ओपन से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था और अपने मामा राजेश के साथ 350 रुपए पाने के लिए काम पर जाने लगा।

रोज की तरह विकास अपने मामा राजेश, भाई रवीन्द्र और अखिलेश व दो और बस्ती के लोगों के साथ सेक्टर 27 में गये। वहां जाने के बाद राजेश के पास ठेकेदार सोनबीर का फोन आया, 110 सेक्टर जाने के लिए। राजेश, विकास और रवीन्द्र के साथ 110 सेक्टर के बीडीएस मार्केट पहुंचे।

बीडीएस मार्केट के बाहर पान का खोखा लगाने वाले एक दिव्यांग दुकानदार ने घटना के बारे में बताया कि सबसे पहले उन्होंने उसके पास के सीवर को साफ किया। दुकानदार ने उन सफाईकर्मियों से कहा कि जल्दी सीवर को बंद कर दें, बदबू आ रही है तो उन्होने 5 मिनट की मोहलत मांगी और सीवर सफाई करके थोड़ी दूर पर दूसरे सीवर की सफाई करने लगे जिसमें उनकी मौत हो गई।

पान के दुकानदार के अनुसार यह घटना 21 सितंबर को करीब दो-ढाई बजे की है। एक महिला ने बताया कि जब वह 6 बजे के करीब ड्यूटी से अपने घर को लौट रही थी तो लाश को निकाला जा रहा था, जहां पर पुलिस मौजूद थी और लोगों को रुकने नहीं दे रही थी। सवाल यह है कि यह घटना के तीन से चार घंटे तक प्रशासन क्या करती रहा? जब यह तीन लोग काम पर गये तो इनको सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं दिये गये, वहां पर कोई जिम्मेवार अधिकारी क्यों नहीं था?

राजेश अपनी पत्नी चमेली और तीन साल की बेटी अंजली के साथ सेक्टर 9 की झुग्गी में 2200 रुपए के किराये पर रहते थे। राजेश की शादी 2008 में हुई, तब से वह पत्नी के साथ यहीं रह रहे थे और ठेकेदार सोनबीर के पास काम कर रहे थे। चमेली तीन माह की गर्भवती है और ऊपर से पति के मरने का दुख उनके जीवन पर भारी पड़ रहा है।

चमेली कहती है कि वह रोज 5 बजे के करीब राजेश को फोन करती थी। घटना वाले दिन जब उसने राजेश को फोन किया तो राजेश का फोन बंद था, उसके बाद विकास को फोन किया उसका भी फोन बंद था, रवींद्र के फोन पर घंटी जा रही थी, लेकिन कोई फोन उठा नहीं रहा था। ठेकेदार को फोन करने पर उसका फोन भी स्विच ऑफ जा रहा था।

कुछ समय बाद चमेली ने राजेश के दोस्त बबलेश शर्मा को फोन किया तो उन्होंने कहा कि तुम दस सेक्टर आ जाओ। चमेली के दस सेक्टर पहुचंने पर बबलेश अपनी बाइक से उसे सेक्टर 34 के अस्पताल ले गये। उसके बार—बार पूछने के बाद भी उसे कुछ नहीं बताया गया। अस्पताल में पुलिस वाले ने चमेली को राजेश की लाश दिखायी।

चमेली के रोने—धोने पर पुलिस ने चमेली और बबलेस को गाड़ी में बैठा लिया और कुछ दूर ले जाकर उन्हें छोड़ दिया और बबलेश से कहा कि इसे घर ले जाओ। गर्भवती महिला जिसका पति अभी अभी अकाल मौत के मुंह में डाल दिया गया हो उसकी क्या हालत हो रही होगी। सांत्वना तो दूर पुलिस द्वारा बीच रास्ते में उसको गाड़ी से उतार देना उसकी अमानवीय छवि का दर्शाता है।

विकास के पिता भूप सिंह को भी उनके बेटे की मौत की खबर उनके गांव के लोगों से मिली। वे लोग सेक्टर 34 के अस्पताल गये और पुलिस में शिकायत दर्ज करनी चाही। पुलिस ने घटनास्थल फेस 2 थाने को बताया और वहीं जाकर रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही। जब वे लोग फेस 2 थाने पहुंचे तो उनसे कह गया, 'सुबह 8 बजे आना मामला दर्ज हो जायेगा।'

भूप सिंह बताते हैं कि वे लोग रात में मोरचरी के पास थे, उसी समय रात के दो बजे डॉक्टर को पोस्टर्माटम के लिए बुलाया। इस पर झुग्गी के लोगोंं ने काफी संख्या में पहुंच कर विरोध किया तो पोस्टमार्टम को रोक दिया गया और डॉ. को वापस जाना पड़ा। भूप सिंह का कहना है कि पुलिस चाह रही थी कि बिना रिपोर्ट दर्ज किये मामले को दबा दिया जाए। यहां तक कि इन परिवारों वालों को दुर्घटना के बारे में जानकारी अलग-अलग माध्यमों से पता चली। पुलिस-प्रशासन का कोई भी व्यक्ति उनको इस घटना की जानकारी देने नहीं गया। इससे पता चलता है कि पुलिस-प्रशासन की मंशा ठीक नहीं थी।

विकास की मां सविता बताती हैं कि पुलिस ने उनके बेटे की लाश को निकाल कर उन्हें नहीं सौंपा। उनसे कहा गया कि खुद जाकर पहचान कर लाश निकाल लाओ। सविता के अनुसार कुछ लोगों ने लाश निकालने की कोशिश की, लेकिन बदबू के कारण वह लौट आये। अंत में विकास के दोस्त सलीम ने जाकर तीनों के शवों को निकाल कर बाहर लाये और उनकी अंतिम क्रिया कर्म किया गया। इन लाशों के अंतिम क्रिया कर्म के लिए भी प्रशासन द्वारा कोई सुविधा पीड़ित परिवारों को नहीं दी गई।

इस घटना के तीन दिन बाद जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो उसी सीवर की सफाई का काम चल रहा था। जहां पर पानी निकासी के लिए एक पम्पिंग सेट लगा था, लेकिन वह भी खराब था। पास खड़े मजदूर पम्पिंग सेट में पानी डाल रहे थे जिससे कि वह पानी को निकाल पायें। इससे यह पता चलता है कि यूपी की योगी सरकार कितनी कुंभकर्णी नींद में सो रही है कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी वहां पर किस तरह की मशीन लगाई गई है और चार दिन बाद भी उस सीवर की सफाई नहीं कि जा सकी है।

नोएडा के 110 सेक्टर का इतिहास शुरू होता है 2004 से। यह इलाका बहुत ही उजाड़ था, जहां पर सबसे पहले ‘श्रमिक कुंज’ के नाम से एक कमरे का रूम, दो मंजिला 920 घर बनाये गये और उसको मजदूरों के लिए एलॉट किया गया। जब वहां यह मजदूर बस गये तो वहां पर लोट्स और केन्द्रीय सोसाईटी जैसी बहुमंजली इमारतें बनाकर धनाढ्य लोगों को बसाया गया। यानी पहले दासों को बसाया गया जिससे कि बहुमंजली इमारतों में रहने वालों के लिए सेवक मिल सकें। जब उनके सीवर जाम हो जाते हैं तो अंधेरी जगह पर रहने वाले लोगों को ले जाकर अंधेरे सीवर में उतार दिया जाता है, जहां पर असमय वह काल के ग्रास बन जाते हैं।

यह घटना न तो पहली है और न अंतिम। दो माह के अंदर दिल्ली के छत्तरपुर, लाजपतनगर, कड़कड़डूमा, एलएनजेपी अस्पताल, मुंडका और नोएडा सेक्टर 52 में इस तरह की ढेरों घटनाएं घट चुकी हैं। इस तरह की मौतें दिल्ली, एनसीआर या देश के बड़े शहरों में ही लगातार हो रही हैं।

9 सितम्बर को ही बिहार के सिवान जिले में 4 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान हो गई। इस तरह से भारत में हर साल सैकड़ों की संख्या में सीवरसफाईकर्मियों की मौत होती है, जिसका सरकार के पास कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हर मौत के बाद मशीन से सफाई कराने का फरमान जारी किया जाता है, फिर वही ढाक के तीन पात।

यहां तक कि केन्द्र सरकार ने 2013 में ‘प्रोहिबिशन ऑफ एंप्लॉयमेंट मैनुअल स्कैंवेंजर एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट’ कानून पास किया है, जिसके अन्तर्गत यह दर्ज है कि किसी भी व्यक्ति को सीवर में नहीं उतारा जायेगा।

इसके अलावा 2014 में सुप्रीम कोर्ट और 1996 में बाम्बे हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि सीवरेज में किसी व्यक्ति को नहीं उतारा जायेगा और अगर आपात स्थिति में जरूरत पड़ी तो सभी सुरक्षा उपकरण के साथ अधिकारियों और एम्बुलेंस, फायर बिग्रेड की उपस्थित में ही सीवर में कोई व्यक्ति उतरेगा।

वर्ष 2000 में मानवाधिकार आयोग ने भी सीवर में इंसानों को उतारने पर रोक लगा रखी है। कानून इतना कड़ा होने के बावजूद भी मनमाने तरीके से लोगों को सीवर में उतार कर उसकी जान ली जा रही है और हर मौत के बाद एक वक्तव्य जारी कर कुछ मुआवजे के साथ अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर दी जाती है।

अभी न जाने कितने विकास, राजेश या रवीन्द्र की जानें जाएंगी। सीवर में मरने वाला कोई भी व्यक्ति किसी धन्नासेठों, अफसरशाह, मंत्री के घर का या रिश्तेदार नहीं होता है, वह सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े कमजोर तबके से होते हैं। आखिर इन मौतों के जिम्मेवार कौन हैं? क्या वक्तव्य दे देने से या कर्मचारियों को गिरफ्तार करने या निलम्बन करने से इस समस्या का समाधान हो सकता है?

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