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राजनीति

मोदी सरकार ने उस जज की वरिष्ठता घटाई जिसने भाजपा की असंवैधानिक चाहत नहीं की पूरी

Prema Negi
6 Aug 2018 3:33 AM GMT
मोदी सरकार ने उस जज की वरिष्ठता घटाई जिसने भाजपा की असंवैधानिक चाहत नहीं की पूरी
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आज फिर होगी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की न्यायिक क्षमता की जांच, पता चलेगा कि वह सरकार की टिटहरी बन गये हैं या फिर निरपेक्ष न्याय के नुमाइंदा ही हैं...

जनज्वार। तमाम वाद—विवादों के बाद उत्तराखण्ड सरकार में चीफ जस्टिस के.एम. जोसेफ की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय में किए जाने पर केंद्र की मोदी सरकार ने सहमति दी, मगर उनकी वरिष्ठता घटाकर।

माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने उनकी वरिष्ठता घटाने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि उन्होंने 2016 में मोदी सरकार द्वारा उत्तराखण्ड में सत्तासीन तत्कालीन कांग्रेसनीत हरीश रावत सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उत्तराखण्ड में कहीं कोई निरंकुशता नहीं है और राष्ट्रपति कभी भी राजा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति बेशक बहुत अच्छे इंसान हो सकते हैं, मगर गलत भी हो सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक जोसेफ के मोदी सरकार के असंवैधानिक ​फैसले को पलट दिए जाने वाले इसी निर्णय से खार खाई भाजपा ने इसका बदला वरिष्ठता घटाकर लिया है।

गौरतलब है कि 27 मार्च 2016 को केंद्र की मोदी सरकार ने उत्तराखंड में धारा 356 लगाकर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। तब हरीश रावत की सरकार लगभग एक महीने तक बर्खास्त रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसके खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जिसके बाद दिए गए फैसले में जस्टिस के एम जोसेफ और वीके विष्ट ने कहा था कि 'यह मामला ऐसी स्थिति दर्शाता है जैसे 356 का उपयोग कानून से इतर किया गया हो।' अपना फैसला देते हुए दोनों जजों की पीठ ने कहा था कि गवर्नर केंद्र सरकार का एजेंट नहीं होता।

भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब धारा 356 के तहत गवर्नर और स्पीकर के अधिकारों को किसी जज ने चुनौती दी हो।

जस्टिस जोसेफ और वीके विष्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा था, 'भारत में मोटी चमड़ी वाली सरकारों के अनेक उदाहरण हैं। राष्ट्रपति शासन के अलावा फ्लोर टेस्ट और बहुमत जानने का कोई बहुत अच्छा विकल्प नहीं है। अगर भ्रष्टाचार ही पैमाना हो तो शायद ही कोई सरकार देश में अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा करे।

गौरतलब है कि सीजेआई दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने इस साल जनवरी में हाईकोर्ट में न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति के लिए न्यायमूर्ति जोसफ और इंदू मल्होत्रा के नाम की सिफारिश की थी। मोदी सरकार ने मल्होत्रा की नियुक्ति पर तो तुरंत सहमति जता दी थी, लेकिन 30 अप्रैल को जोसेफ की सिफारिश वापस कर दी गई। कॉलेजियम ने 16 जुलाई को फिर से उनके नाम की सिफारिश की तो अब उसे मान लिया गया।

शनिवार 4 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसफ, मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस इंदिरा बनर्जी और ओडिशा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विनीत सरन को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति करने की अधिसूचना जारी हुई थी, मगर इसमें जस्टिस जोसेफ को वरिष्ठता घटाते हुए तीसरे नंबर पर रखा गया।

जस्टिस जोसेफ की वरिष्ठता को घटाने यानी उन्हें तीसरे नंबर पर रखने के केंद्र सरकार के फैसले से उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम के कुछ सदस्यों के अलावा सुप्रीम कोर्ट के कई जज भी नाखुश हैं। इसलिए कोलेजियम के कुछ सदस्यों सहित अन्य जस्टिस, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा से आज मिलकर अधिसूचना में जस्टिस जोसेफ का नाम क्रम में तीसरे स्थान पर रखने के केंद्र के फैसले पर असंतोष जाहिर करेंगे।

कहा यह भी जा रहा है कि कल मंगलवार 7 अगस्त को उच्चतम न्यायालय के शपथ ग्रहण समारोह से पहले दीपक मिश्रा से उचित कदम उठाने की मांग की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कुछ सदस्यों के मुताबिक वे इस मुद्दे पर एक ज्ञापन भी सीजेआई को सौपेंगे।

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