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केजरीवाल की क्या मजबूरी जो 'मोदी भक्त' तुषार मेहता को बना रहे दिल्ली दंगों का वकील

Nirmal kant
2 Jun 2020 3:53 PM GMT
केजरीवाल की क्या मजबूरी जो मोदी भक्त तुषार मेहता को बना रहे दिल्ली दंगों का वकील
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यह वही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता हैं जिन्होंने पिछले दिनों कोरोना के समय मजदूरों के पलायन की पीड़ा और दुर्दशा दिखाने वाले पत्रकारों को गिद्ध कहा था....

जनज्वार ब्यूरो। एक अप्रत्याशित और हैरान कर देने वाले फैसले में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली दंगों में दिल्ली सरकार की पैरवी के लिए भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को अपना वकील नियुक्त किया है। गौरतलब है कि यह वही तुषार मेहता हैं जिन्होंने पिछले दिनों कोरोना के समय मजदूरों के पलायन की पीड़ा और दुर्दशा दिखाने वाले पत्रकारों को गिद्ध कहा था।

यही नहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में उच्च न्यायालय द्वारा कोरॉना को लेकर सरकार की बदइंतजामी पर सरकार को फटकार लगाने की तुलना उन्होंने उच्च न्यायालय द्वारा समानांतर सरकार चलाने से की। इससे पहले रेलवे द्वारा मजदूरों से टिकट के पैसे लिए जाने को लेकर भी वह झूठ बोल चुके हैं कि यह पैसे लिए ही नहीं गए। तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में व्हट्सएप्प के फर्जी संदेश को भी कोट कर चुके हैं।

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सॉलिसिटर जनरल के रूप में उनकी पहचान सरकार को सही या गलत की सलाह देने के बजाय सरकार के कट्टर समर्थक के रूप में सरकार के हर सही गलत फैसले को लोकतंत्र के अंतिम सत्य के रूप में संवैधानिक संस्थाओं के ऊपर सरकार के एक आदेश की तरह थोपना है और सरकार की आलोचना या व्यवस्था की कमियां उजागर करने वाले को नकारात्मक मानसिकता वाला देश का विरोधी बताना है। एक ऐसे समय में जब देश के मीडिया एवं बौद्धिक तबके में उनको हटाने की मांग शुरू हुई है। जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दल भी उनको हटाने की मांग कर चुके हैं।

से में अरविंद केजरीवाल का उन्हें दिल्ली के दंगों के लिए दिल्ली सरकार का वकील नियुक्त करना देश के भविष्य की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि हिंदुत्व की राजनीति के आगे केजरीवाल ने न सिर्फ पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया है बल्कि हिंदुत्व की राजनीति के खेल में वे एक मझे हुए खिलाड़ी बन गए हैं जो भाजपा को खासकर दिल्ली में हिंदुत्व का कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने देना चाहते।

शुरुआत बहुत पहले हो गई थी। दिल्ली चुनावों के दौरान शाहीन बाग पर चुप्पी साधे रखना और वहां बिल्कुल ना जाना। दिल्ली दंगों के दौरान और अल्पसंख्यकों पर पुलिस की एकतरफा कार्रवाई के दौरान उनका एकदम निष्क्रिय रहना इसका काफी पहले संकेत दे चुके थे कि उनकी नई राजनीति है मुस्लिम भाजपा को हराने के लिए कहीं और नहीं जा सकते। और मेरी अपनी राजनीति एक सुधारवादी हिंदू नेता की बनी रहे। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कन्हैया व अन्य के खिलाफ दिल्ली पुलिस को देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी।

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कोरोनावायरस के दौरान दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों में एकतरफा एक धर्म विशेष और सिविल सोसायटी के खिलाफ एकतरफा उल्टी कार्रवाई की, जिसके अरविंद केजरीवाल खुद पैदाइश हैं। अरविंद केजरीवाल एकदम चुप रहे और अब जबकि माना जा रहा है कि तुषार मेहता के दिल्ली सरकार के पक्षकार बनने से दिल्ली दंगों में पीड़ित का मुजरिम बनना तय है।

रविंद केजरीवाल ने धर्मनिरपेक्षता और फासीवाद के कंधों पर चढ़कर आ रहे कट्टर राष्ट्रवाद इन दोनों विषयों से अपने और अपनी राजनीति को किनारा कर लिया है। शायद केंद्र और दिल्ली के अगले चुनावों में हमें फिर 'केंद्र में मोदी-दिल्ली में केजरीवाल' का नारा फिर से सुनाई दे। शायद भाजपा के बाद हिंदुत्व की राजनीति और राष्ट्रवाद के असली नायक और वारिस वही हैं।

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