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हाईकोर्ट ने कहा नहीं भंग होगी बदरी—केदार मंदिर समिति

Janjwar Team
6 Sep 2017 10:24 PM GMT
हाईकोर्ट ने कहा नहीं भंग होगी बदरी—केदार मंदिर समिति

राज्य में सत्तासीन त्रिवेंद्र रावत सरकार के बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को भंग करने के आदेश को निरस्त करते हुए बताया गलत

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को सरकार द्वारा भंग करने से संबधित आदेश पर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने पूर्ण रूप से रोक लगाते हुये मामले को निरस्त कर दिया है।

गौरतलब है कि एकलपीठ ने पूर्व में सरकार के समिति को भंग करने के आदेश को खारिज किया था, जिसको सरकार ने खंडपीठ में चुनौती दी थी। खंडपीठ ने एकलपीठ को फिर से मामला सौंपकर उसे शीघ्र निस्तारित करने के आदेश दिये थे। कल 5 सितम्बर को मामले को सुनने के बाद सरकारी आदेश पर रोक लगाते हुये कोर्ट ने मामले को अंतिम रूप से निस्तारित कर दिया।

बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य दिवाकर चमोली व दिनकर बाबुलकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वर्तमान सरकार ने एक अप्रैल 2017 को बिना किसी कारण के बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को भंग कर दिया था। उसकी जगह वहां संस्कृति सचिव शैलेश बगौली को प्रशासक नियुक्त कर दिया था, जिसको उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पूर्व में न्यायमूर्ति सुंधांशु धुलिया की एकलपीठ ने सरकार के इस आदेश को मंदिर समिति एक्ट 1939 के सेक्शन 11(अ) के विपरीत मानते हुये सरकार के आदेश पर रोक लगाते हुये मंदिर समिति को बहाल कर दिया था। साथ ही सरकार को यह भी आदेश दिये थे कि वह बद्री-केदार मंदिर समिति के एक्ट के आधार पर उचित निर्णय ले, परंतु सरकार ने आठ जून 2017 को एक्ट का संज्ञान लेते हुये मंदिर समिति को फिर से भंग कर दिया।

इस पर मंदिर समिति के सदस्यों ने इस आदेश को फिर से हाईकोर्ट में पुन: चुनौती दी। एकलपीठ ने फिर एक बार भंग मंदिर कमेटी को बहाल कर दिया। 15 जून 2017 के एकलपीठ के आदेश के विरूद्ध सरकार ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को सही मानते हुये एकलपीठ को निर्देश दिये कि वह इस मामले की शीघ्र सुनवाई करते हुये मामले को शीघ्र निस्तारित करें।

5 सितंबर को न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने व मंदिर समिति एक्ट के सेक्शन पांच, 11 व 11 (2) का अवलोकन करने के बाद सरकार के मंदिर समिति को भंग करने के आदेश को एक्ट के विरूद्ध मानते हुए आदेश को खारिज कर दिया। इसके साथ ही याचिका को पूर्ण रूप से निस्तारित कर दिया।

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