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Gender Bias in Research: वैज्ञानिक शोधपत्रों और पेटेंट में महिलाओं की उपेक्षा, रिसर्च में ​महिला वैज्ञानिकों का नाम शामिल करने का आंकड़ा 50 प्रतिशत से भी कम

Janjwar Desk
24 Jun 2022 11:15 AM GMT
Gender Bias in Research: वैज्ञानिक शोधपत्रों और पेटेंट में महिलाओं की उपेक्षा, रिसर्च में ​महिला वैज्ञानिकों का नाम शामिल करने का आंकड़ा 50 प्रतिशत से भी कम
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Gender Bias in Research: हाल में किये गए अनेक अध्ययन बताते हैं कि जब शोधपत्र लिखे जाते हैं तब उससे सम्बंधित पुरुषों के नाम पर तो लेखक के तौर पर आ जाते हैं, मगर महिलाओं को छोड़ दिया जाता है....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

वैज्ञानिक जगत में पिछले कुछ वर्षों से यह चर्चा लगातार की जाती है कि महिलायें पुरुषों की अपेक्षा कम शोधपत्र प्रकाशित करती हैं और पेटेंट में भी उनकी भागीदारी कम रहती है| अधिकतर लोग यही मानते हैं कि इसका कारण महिलाओं द्वारा कम शोधपत्र प्रस्तुत करना है| हाल में किये गए अनेक अध्ययन बताते हैं कि जब शोधपत्र लिखे जाते हैं तब उससे सम्बंधित पुरुषों के नाम पर तो लेखक के तौर पर आ जाते हैं, मगर महिलाओं को छोड़ दिया जाता है|

वैज्ञानिक अनुसंधान या अध्ययन हमेशा एक टीम-वर्क होता है, और टीम में महिलायें भी होती हैं, पर उनके नामों की उपेक्षा की जाती है, भले ही उस अनुसंधान में महिला वैज्ञानिकों ने पुरुष वैज्ञानिकों से अधिक समय उस अनुसंधान को दिया हो| पुरुष बाहुल्य वाले विषय जैसे अभियांत्रिकी और भौतिक विज्ञान में तो यह भेदभाव स्पष्ट दिखता है, पर स्वास्थ्य और जीवविज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी, जहां महिला वैज्ञानिक पुरुषों की अपेक्षा अधिक है, यह असमानता स्पष्ट है|

वैज्ञानिक शोधपत्रों में और फिर पुरस्कारों में महिला वैज्ञानिकों की उपेक्षा का सबसे पहले उदाहरण रोसलिंड फ्रैंकलिन (Rosalind Franklin) का दिया जाता है| वैज्ञानिक मौरिस विल्किंस (Maurice Wilkins) के सुझाव पर इंग्लैंड की महिला वैज्ञानिक रोसलिंड फ्रैंकलिन ने वर्ष 1952 में एक्स-रे क्रिस्टलोंग्राफी (X-ray Crystallography) की मदद से डीएनए (DNA) की खोज की थी और इसकी संरचना का अध्ययन किया था| इसके बाद जेम्स वाटसन ने फ्रांसिस क्रीक (James Watson & Francis Crick) के साथ बिना फ्रैंकलिन को बताये और बिना इजाजत लिए इस काम को आगे बढ़ाया और इसकी संरचना को अपने नाम से प्रकाशित किया|

वर्ष 1953 में प्रतिष्ठित जर्नल नेचर ने वाटसन और क्रीक का शोधपत्र प्रकाशित किया था| यह महज संयोग ही था कि इसी अंक में विल्किंस और फैंकलिन का भी शोधपत्र प्रकाशित किया गया था, पर इसके बाद वाटसन और क्रीक डीएनए की खोज के पर्याय बन गए और विल्किंस और फ्रैंकलिन को लगभग भुला दिया गया| महज 37 वर्ष की आयु में वर्ष 1958 में ओवेरियन कैंसर के कारण फ्रैंकलिन की मौत हो गयी| वर्ष 1962 में वाटसन और क्रीक के साथ विल्किंस को भी नोबेल पुरस्कार मिला पर, रोसलिंड फ्रैंकलिन के काम को किसी ने याद नहीं किया|

जिस जर्नल, नेचर (Nature), में वाटसन और क्रीक का शोधपत्र प्रकाशित किया गया था, उसी जर्नल के जून 2022 अंक में वैज्ञानिक शोधपत्रों में महिला वैज्ञानिकों की उपेक्षा से सम्बंधित न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर जूलिया लेन (Prof Julia Lane) का एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है| जूलिया लेन के अनुसार विज्ञान के शोधपत्रों के प्रकाशन में पुरुष महिला असमानता ऐतिहासिक है, मगर इस पर ध्यान हाल में ही दिया गया है|

इस ऐतिहासिक असमानता के कारण पर अनुसंधान कठिन है, क्योंकि इसके लिए किसी शोधपत्र से जुड़े पूरे वैज्ञानिक दल का सटीक पता होना चाहिए और यह भी पता होना चाहिए कि दल के हरेक वैज्ञानिक सदस्य ने कितना काम किया है| जाहिर है, यह काम कठिन होने के साथ ही अत्यधिक समय लेने वाला है और बहुत प्रयास के बाद भी पहले के आंकड़े जुटाना लगभग असंभव है|

जूलिया लेन ने वर्ष 2013 से 2016 के बीच अमेरिका के 52 महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में किये जाने वाले वैज्ञानिक शोधों का पूरा विवरण खंगाला| इस दौरान इन अनुसंधान संस्थानों में लगभग 10,000 शोधदल काम कर रहे थे, जिसमें 128859 वैज्ञानिक काम कर रहे थे और इन दलों ने इस अवधि के दौरान कुल 39426 शोधपत्र प्रकाशित किये थे और 7675 पेटेंट हासिल किये थे| इतने आंकड़े एकत्रित करने के बाद जूलिया लेन का निष्कर्ष है कि महिला वैज्ञानिकों के नाम को शोधपत्रों में शामिल करने की संभावना पुरुष वैज्ञानिकों की तुलना में 50 प्रतिशत से भी कम रहती है|

बहुत सारे वैज्ञानिक शोधदलों में स्नातकोत्तर छात्र भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| इनमें महिला छात्रों में से महज 15 प्रतिशत का नाम ही शोधपत्रों में शामिल किया जाता है, जबकि पुरुष छात्रों की संख्या 21 प्रतिशत से अधिक रहती है| जूलिया लेन के दल ने अमेरिका के 2400 वैज्ञानिकों से यह जानने के लिए सीधी बात की कि क्या उनका नाम किसी शोधपत्र में योगदान देने के बाद भी छोड़ा गया है और यदि हाँ तो क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में 43 प्रतिशत महिला वैज्ञानिकों ने हाँ में जवाब दिया और अधिकतर ने कारण महिलाओं को कमतर आंकना और लैंगिक भेदभाव बताया|

अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी अपनी तरफ से एक पहल कर रहे हैं| इन वैज्ञानिकों ने पापुलेशन बायोलॉजी के क्षेत्र में महिलाओं के कार्यों को उजागर करने का प्रयास किया है| इसके लिए इस दल ने पापुलेशन बायोलॉजी के क्षेत्र में 1970 से 1990 के बीच प्रकाशित 883 शोध पत्रों को खंगाला| जर्नल्स में प्रकाशित शोधपत्रों में शीर्षक के बाद लेखकों का नाम होता है और माना जाता है इनका भरपूर योगदान है| शोधपत्र के अंत में सन्दर्भ के ठीक पहले आभार (एक्नौलेजमेंट) होता है, जिसमें अपेक्षाकृत कम योगदान देनेवालों का नाम होता है|

जर्नल में प्रकाशित शोधपत्रों में लेखकों का कितना योगदान होगा और आभार में जिनका नाम है उनके योगदान का कोई निश्चित प्रारूप नहीं है| सामान्यतया, शोधपत्र के मुख्य लेखक का ही निर्णय अंतिम होता है कि वह किसका नाम लेखक के तौर पर दे और किसके लिए सिर्फ आभार प्रकट करे|

सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के दल ने सभी 883 शोधपत्रों के लेखकों के नाम की और आभार में डाले गए नामों की अलग-अलग सूचि बनाई और फिर इनका विश्लेषण करने के बाद पता चला कि लेखकों में मात्र 7.4 प्रतिशत महिलायें थीं, जबकि आभार में 43.2 प्रतिशत नाम महिलाओं के थे| कुछ महिलाओं के नाम तो अनेक शोधपत्रों में थे, पर केवल आभार में|

इन महिला वैज्ञानिकों के काम की जानकारी जुटाने पर पता चला कि आभार में जिन महिला वैज्ञानिकों के नाम थे, उनमें से अधिकतर वैज्ञानिकों का काम शोधपत्र के लेखकों से अधिक महत्वपूर्ण था| जेनेटिक्स नामक जर्नल के फरवरी 2019 अंक में सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन प्रकाशित किया गया है| इसमें कहा गया है कि इस दल ने हालाँ कि केवल पापुलेशन बायोलॉजी के शोधपत्रों पर अध्ययन किया है, पर वे विज्ञान के अन्य विषयों पर भी ऐसा ही अध्ययन करेंगे| इस दल का अनुमान है कि विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति होगी|

इतना तो स्पष्ट है कि महिलाओं की विज्ञान में बहुत उपेक्षा की गयी है, पर अब इस चलन को बदलने की तैयारी है| यह महिलाओं के लिए तो अच्छा होगा और इससे विज्ञान का स्तर सुधारने में भी मदद मिलेगी तथा विज्ञान से हमारा जीवन स्तर सुधारने की संभावनाएं बढेंगी|

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