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सरकारी मुनाफाखोरी की सोच के कारण हुई जहरीली शराब पीने से पंजाब में 100 लोगों की मौत

Janjwar Desk
2 Aug 2020 4:03 AM GMT
सरकारी मुनाफाखोरी की सोच के कारण हुई जहरीली शराब पीने से पंजाब में 100 लोगों की मौत

वैध और अवैध दोनों रूप में शराब विनाश का ही कारण बनता है। उस पर सरकार की राजस्व केंद्रित आबाकारी नीति खतरे को कई गुणा बढा देती है...

पूर्व आईपीएस वीएन राय की टिप्पणी

जनज्वार। पंजाब ज़हरीली शराब (हूच) कांड में 100 से अधिक मौत होने की खबर है। ऐसे कांड में मरने वाले, सस्ती शराब के आदी, आर्थिक रूप से समाज के निचले तबके के लोग होते हैं। बेशक त्रासदी बड़ी हो जाये तो मीडिया की सुर्ख़ियाँ संबंधित नेताओं, बिचौलियों और अधिकारियों को वक्ती तौर पर नंगा करने वाली ज़रूर बन जाती हैं।

पंजाब इस मामले में अकेला राज्य नहीं है। इसके पीछे रेवेन्यू केंद्रित आबकारी नीति से राज्य की आय बढ़ाते जाने और उसकी आड़ में अपनी जेब के लिए अधिक से अधिक पैसा बनाने की होड़ होती है। अगर पूर्ण शराब बंदी हो तो और भी पौ बारह। सीधा समीकरण है, जितना ज़्यादा नियंत्रण उतनी ज़्यादा उगाही। मोदी के गुजरात में नेता-बिचौलिया-अफ़सर गठजोड़ के लिए यह तीस हज़ार करोड़ और नीतीश के बिहार में यह दस हज़ार करोड़ सालाना का जेबी कारोबार बन चुका है।

गुजरात और बिहार में पूर्ण शराब बंदी के चलते पंजाब और हरियाणा से व्यापक शराब तस्करी इन दोनों राज्यों में होती आयी है। पंजाब में हाल में आबकारी नीति को अपने.अपने संरक्षित शराब कार्टेल के हिसाब से तय कराने के चक्कर में प्रभावशाली मंत्रियों ने अमरिंदर सिंह के वफ़ादार मुख्य सचिव की छुट्टी करा दी। कुछ माह पहले हरियाणा में भी पकड़ी गयी शराब को खुर्द-बुर्द कर गुजरात भेजने वाला गिरोह उजागर हुआ लेकिन इनेलो मंत्रियों की हिस्सेदारी ने जाँच को जकड़ रखा है।

दरअसल, नियमित होने वाली छुट-पुट हूच मौतें तो ख़बर बनती ही नहीं जबकि पंजाब जैसी बड़ी त्रासदी पर कनिष्ठ अधिकारियों के निलंबन-जांच की चादर उढ़ा दी जाती है। फ़िलहाल पंजाब में भी यही चलन देखने को मिल रहा है। एक दर्जन से ऊपर इंस्पेक्टर स्तर के आबकारी और पुलिसकर्मी निलंबन की लिस्ट में हैं और मंडल कमिश्नर जाँचकर्ता के रूप में।

पिछले दस वर्ष में देश में हुई अन्य प्रमुख हूच त्रासदियों पर एक नज़र डालिये जिनमें सौ से अधिक मौत हुईं, जाँच का नाटक चला और समाज के लिए आत्मघाती आबकारी नीति नेता-बिचौलिया-अधिकारी गठजोड़ के साये में बदस्तूर जारी रही। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, सरकार किसी पार्टी की हो। मोदी मॉडल या राम राज्य का दावा ही क्यों न हो।

क्या समझना मुश्किल है कि स्कूलों और अस्पतालों जैसी सामाजिक ज़रूरतों तक को निजी हाथों में सौंपने वाली सरकारें, शराब के कारोबार पर कुंडली मारे क्यों बैठी हैं?

वर्षवार हूच त्रासदी वाले राज्यों की सूची :

2009 गुजरात

2011 बंगाल

2012 ओढिशा

2013 उत्तर प्रदेश

2015 बंगाल

2015 मुंबई

2016 बिहार

2018 उत्तर प्रदेश

2019 आसाम

(पूर्व आइपीएस अधिकारी वीएन राय जनज्वार के सलाहकार संपादक हैं।)

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