मानवता को अंधेरी गुफाओं में धकेलना चाहता है धार्मिक कट्टरवाद, उसका चेहरा बदल सकता है लेकिन एजेंडा कभी नहीं

निदा नवाज की टिप्पणी
जनज्वार। किसी भी विचारधारा से सहमति जताने से पहले यह सोचना बेहद ज़रूरी है कि क्या स्वयं हम उसको अपने जीवन में या अपने परिवार के लिए पसन्द करेंगे। आजकल बहुत से मुसलमान मित्र "तालिबान" की प्रशंसा कर रहे हैं। उन्हें मशवरा है कि आत्ममंथन करें। कहीं न कहीं उनके भीतर कट्टरवाद पल रहा है। उन्हें तालिबानियों का क्रूर और बर्बर इतिहास पढ़ना चाहिए।
तालिबानियों का विरोध करने वालों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके मन के साथ-साथ फेसबुक के पन्ने तक हिन्दू संकीर्ण कट्टरवाद से भरे पड़े हैं। ऐसे लोगों को मशवरा है कि स्वयं किसी अन्य धर्म से सम्बंधित कट्टरवाद से ग्रस्त होने की सूरत में वे विरोध करने का हक़ खो चुके हैं। पहले अपने आपको हिन्दू कट्टरवाद से मुक्त करें फिर जमकर तालिबानियों का विरोध करें, वह विरोध ऊर्जावान होगा और प्रभावशाली भी।
हम कश्मीर में "तालिबान' के एक कठोर और निर्दय रूप को भोग चुके हैं। उन्होंने भी गाड़ियों में लगे टेप रिकार्डर्स तोड़े दिए थे कि गाना बजाना इस्लाम में गुनाह है। उन्होंने भी मुख़ालफ़त का उत्तर गोलियों से दिया था, मुझे याद है जब पहली बार मेरा अपहरण केवल इस लिए किया गया था क्योंकि में एक केंद्रीय विद्यालय में पीजीटी हिंदी था। दूसरी बार इस लिए क्योंकि उन्हें मैं नास्तिक लग रहा था और तीसरी बार इस लिए क्योंकि मैंने "अक्षर-अक्षर रक्त भरा" में उनका खुलकर विरोध किया था। उन्होंने इस हद तक हमारे सामाजिक ताने बाने को बिखेर दिया है कि तीन दशक गुज़रने के बाद भी हम उसको फिर से समेटने में असमर्थ हैं।
"तालिबान" मेरी नज़र में एक कट्टरवादी विचारधारा है जो हर जगह हमें विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। यह एक बीमार मानसिकता है जो कभी संघी आतंकवादियों के रूप में इख़लाक़ के हत्यारे बनकर हमारे समक्ष आती है तो कभी शहीद अवतार सिंह पाश के क़ातिल बनकर। कभी यह मानसिकता शहीद मशीरुल हक़ पर गोलियां चलाती है तो कभी जंतर-मंतर पर मानवता को शर्मसार करती है।
बहुत से मित्र "तालिबान" को एक धर्म विशेष से सम्बंधित होने के कारण समर्थन करते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि ऐसा करने से वे विश्व में मौजूद सभी प्रकार के धार्मिक कट्टरवादों का समर्थन कर रहे हैं। वे बौद्ध आतंकवाद को भी फिर जस्टिफाई कर रहे हैं, जो म्यांमार में रोहिंग्याओं का नरसंहार कर रहा है, वे फिर संघी आतंकवाद को भी जस्टिफाई कर रहे हैं जो हमारे देश में कुछ समय से सर चढ़कर बोलने लगा है, वे फिर उस जातीय आतंकवाद को भी जस्टिफाई कर रहे हैं जो जार्ज फ्लॉयड (George Floyd) को पांव तले मसलता है।
हमें यह मानकर चलना चाहिए कि सभी प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद पूरी मानवता को आदिकालीन अंधेरी गुफाओं में वापस धकेलना चाहते हैं। समय के साथ इनका चेहरा बदल सकता है, इनका एजेंडा कभी नहीं। ये सभी धार्मिक कट्टरवाद एक दूसरे के सहायक हैं और मानव समाज के बड़े दुश्मन और इनका विरोध करना बेहद ज़रूरी। हमें भाईचारे, सौहार्द और धर्मनिरपेक्षता के हक़ में और हर प्रकार की तालिबानी/संघी मानसिकता के विरोध खड़ा होना होगा ।





