DDU के स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम में नामांकन से पहले कर लें तहकीकात, फर्जी साबित हो सकती है डिग्री

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा नई शिक्षा नीति के तहत 63 कोर्स की सीबीसीएस पैर्टन के तहत पढाई शुरू की जा रही है। इनमें 23 सर्टिफिकेट, 4 डिग्री व 29 डिप्लोमा तथा सात मास्टर कोर्स शामिल हैं....

Update: 2021-07-23 07:18 GMT

(वर्तमान सत्र से स्नातक स्तर पर सीबीसीएस लागू किया जाना है। अन्य पाठ्यक्रमों की तरह राष्ट्र गौरव को भी सीबीसीएस पैटर्न पर तैयार किया गया है)

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में शुरू हो रहे नए स्वत्तिपोषित पाठ्यक्रम को लेकर उहापोह की स्थिति बनी हुई है।बिना ऐकेडमिक कौंसिल से स्वीकृती कराए बिना तथा अन्य औपचारिकाता को पूरे किए बिना ही पाठ्यक्रम शुरू होने के आरोप लग रहे हैं। जिसका नतीजा है कि पाठयक्रम की वैधानिकता पर ही सवाल उठने लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक पक्ष का मानना है कि छात्रों को नामांकन के पूर्व पूरी तहकीकात कर लेेनी चाहिए।जिससे की आगे जाकर पाठ्यक्रम के वैधता पर कोई सवाल न खडा हो।

उधर खास बात है कि ऐसी ही गलतियों का खामियाजा बिहार के पूर्णिया विश्वविद्यालय के छात्र भुगत रहे हैं। पूर्णिया के तत्कालीन कुलपति राजेश कुमार ही वर्तमान में गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा नई शिक्षा नीति के तहत 63 कोर्स की सीबीसीएस पैर्टन के तहत पढाई शुरू की जा रही है। इनमें 23 सर्टिफिकेट, 4 डिग्री व 29 डिप्लोमा तथा सात मास्टर कोर्स शामिल हैं।

डिग्री व डिप्लोमा कोर्स शुरू करने के पूर्व विद्या परिषद, कार्य परिषद तथा राजभवन से अनुमोदन जरूरी होता है। जबकि सर्टिफिकेट कोर्स के लिए अनुमोदन केवल विश्वद्यिालय स्तर पर जरूरी होता है। अब सवाल उठता है कि क्या उक्त पाठयक्रम शुरू करने के पूर्व क्या अनुमोदन की सभी औपचारिकता पूरी की गई हैं।

गोरखपुर विश्वविद्यालय,गोरखपुर हिन्दी विभाग के

कमलेश गुप्त का आरोप है कि यह विद्यापरिषद के साथ सुनियोजित छल है। विद्यापरिषद के सदस्य के रूप में हम यह बात जोर देकर कहना चाहते हैं कि जिन पाठ्यक्रमों को विद्यापरिषद द्वारा पास होना बताया जा रहा है उनमें से कोई पाठ्यक्रम विद्यापरिषद के द्वारा स्वीकृत नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा विद्या परिषद की जिस बैठक में उक्त पाठ्यक्रमों का पास होना बताया जा रहा है, उसका वास्तविक पक्ष सामने रखना विद्या परिषद के सदस्य के रूप में हमारा दायित्व और धर्म है।

हमारे विश्वविद्यालय के इतिहास में (संभवतः देश-दुनिया के विश्वविद्यालयों के इतिहास में भी ।) ऐसा पहली बार घटित हुआ कि विद्यापरिषद के सदस्यों को संबंधित बैठक की संलग्नकों सहित बिंदुवार विस्तृत कार्यसूची दी ही नहीं गई।संकायाध्यक्षगण द्वारा पाठ्यक्रमों से संबंधित कुछ बातें मौखिक रूप में बताई गईं। विद्यापरिषद के सदस्यों द्वारा संलग्नकों सहित बिंदुवार विस्तृत कार्यसूची उपलब्ध न कराए जाने पर मौखिक रूप से आपत्तियां की गईं। संकायाध्यक्षगण द्वारा की गईं मौखिक बातों में भी सदस्यों द्वारा संशोधन की जरूरत बताई गई।

पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए मूलभूत ढांचे, शिक्षकों की उपलब्धता, विविध पाठ्यक्रमों में संरचनागत व क्रेडिट संबंधी असमानता, शुल्क की असमानता आदि पर सवाल उठे तो पदेन अध्यक्ष कुलपति ने उसके लिए समितियां गठित करने की बात की।विद्यापरिषद के अध्यक्ष (जो कुलपति जी ही थे)द्वारा यह व्यवस्था दी गई कि अपेक्षित सुधार के लिए उक्त पाठ्यक्रम, संबंधित पाठ्यक्रम समितियों को भेजे जाएंगे और हम लोग फिर बैठेंगे। ''यह अंतिम बैठक नहीं है।'' इसलिए किसी तरह की लिखित असहमति की जरूरत नहीं जान पड़ी।

इस तरह संशोधन की अपेक्षा वाले पाठ्यक्रमों को यथावत कार्य परिषद में भेज देना और अब उसे सभी निकायों द्वारा पास घोषित करना एक तरह का सुनियोजित छल है। यह इन सभी संवैधानिक निकायों को ध्वस्त करना है।

वर्तमान सत्र से स्नातक स्तर पर सीबीसीएस लागू किया जाना है। अन्य पाठ्यक्रमों की तरह राष्ट्र गौरव को भी सीबीसीएस पैटर्न पर तैयार किया गया है। यह कोर्स दो क्रेडिट का होगा। सभी कोर्सेज के साथ राष्ट्र गौरव के सीबीसीएस पैटर्न पर आधारित कोर्स की स्वीकृति एवं उनका संचालन विश्वविद्यालय के अधिनियम, परिनियम और शासनादेश के अंतर्गत किया जाएगा।इससे प्रमाणित होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने पहले झूठा दावा किया था। राष्ट्र गौरव को भी सीबीसीएस पैटर्न पर तैयार किया गया है।''इस दावे का आधार क्या है?यह पाठ्यक्रम कहां, किसके द्वारा तैयार किया गया है? विश्वविद्यालय प्रशासन को यह किस तिथि में मिला है?.''यह कोर्स दो क्रेडिट का होगा।'' यह कौन तय करेगा?यह किस पाठ्यक्रम समिति में तय हुआ है?विश्वविद्यालय प्रशासन अपने झूठे दावों से विश्वविद्यालय की छवि धूमिल कर रहा है।

उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालय के विद्यापरिषद जैसे सर्वोच्च अकादमिक निकाय की अवमानना करते हुए झूठे दावों से समाज को दिग्भ्रमित करने वाले व्यक्ति को विश्वविद्यालय के कुलपति जैसे गरिमामय पद पर एक पल भी बने रहने का कोई हक नहीं है।

पूर्व कुलपति प्रोफेसर अशोक कुमार ने जताई चिंता

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अशोक कुमार ने कहा है कि विगत कई दिनों से मुझे समाचार पत्रों के माध्यम से और सोशल मीडिया के माध्यम से दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के विभिन्न प्रकार के समाचार मिल रहे है। क्योंकि मैंने '2014 से 2017 तक गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक कुलपति' के रूप में कार्य किया है अतः विश्व विद्यालय की के बारे में जब कोई भी सूचना प्राप्त होती है तो मेरी जिज्ञासा अवश्य रहती है ! मैं हमेशा यह चाहता हूं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय 'प्रदेश में नहीं बल्कि देश में और विश्व में प्रथम स्थान' प्राप्त करें !

जैसा कि आप सब जानते हैं विश्वविद्यालय वास्तविक रुप से 'छात्रों' के लिए होता है और विश्व विद्यालय में कार्यरत 'शिक्षक,अधिकारीगण एवं कर्मचारी गण विश्वविद्यालय में छात्रों की सहायता' हेतु कार्यरत होते हैं! यदि विश्वविद्यालय की छवि पर कोई असर पड़ता है तो वह वास्तव में 'छात्रों के भविष्य' के ऊपर बहुत प्रभावशाली होता है इसलिए हमें चाहिए कि हम सब मिलकर विश्व विद्यालय की छवि हमेशा अच्छी रखें और यदि कभी किसी प्रकार का मतभेद हो तो 'बातचीत के माध्यम से हमें उन मतभेदों का हल ढूंढना चाहिए' ताकि समाज में विश्वविद्यालय की छवि स्वस्थ रहें और छात्रों का भविष्य उज्जवल बने। छात्रों, कर्मचारियों, शिक्षकों और अधिकारियों को, यह गर्व रहे कि वह दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय का एक अंग है !

जैसा की ज्ञात हुआ है की गोरखपुर विश्वविद्यालय को एक 'अंतरराष्ट्रीय संस्थान द्वारा 96 और 100 के बीच में भारतीय विश्वविद्यालय की रंकिंग मे स्थान' प्राप्त हुआ है यह विश्वविद्यालय के लिए गर्व की बात है लेकिन हमारी जिम्मेदारी बनती है अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग को और अच्छा बनाएं और इसलिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय में एक अच्छा वातावरण रहे, एक अच्छी छवि रहे।

इसी संदर्भ में मैं कहना चाहता हूं की विगत कुछ दिनों में विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा और विश्वविद्यालय के शिक्षक के द्वारा विश्वविद्यालय में हो रही 'गतिविधियों में विरोधाभास' है! समाचार पत्रों के माध्यम से मुझे यह ज्ञात हुआ है की विश्वविद्यालय सन 2021-2022 सत्र में विभिन्न प्रकार के 'नए स्व वित्त पोषित पाठ्यक्रम' शुरू करना चाहता है जैसे कि कृषि विभाग और विभिन्न प्रकार के 70 से भी ज्यादा सर्टिफिकेट और डिप्लोमा , डिग्री पाठ्यक्रम शामिल हैं।

यह सब पाठ्यक्रम स्ववित्त पोषित कार्यक्रम के अंतर्गत विश्वविद्यालय में लागू होंगे जहां तक मेरी जानकारी है !

किसी भी 'नए पाठ्यक्रम को शुरू करने के लिए सर्वप्रथम एक रूपरेखा संबन्धित विभाग' मे बनाई जाती है , पाठ्यक्रम की रूपरेखा विश्व विद्यालय की फैकल्टि में अनुमोदित कराने के बाद विद्या परिषद में अनुमोदित कराई जाती है और उसके पश्चात विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद मे अनुमोदित' करायी जाती है। जब विश्वविद्यालय के स्तर पर पाठ्यक्रम अनुमोदित हो जाता है तब विश्वविद्यालय प्रशासन नए पाठ्यक्रम का प्रस्ताव राज्य सरकार को प्रेषित करता है। राज्य सरकार पाठ्यक्रम के प्रस्ताव की विभिन्न स्तर पर जांच करता है।

'राज्य सरकार स्वीकृति के बाद नए पाठ्यक्रम का प्रस्ताव माननीय राज्यपाल को प्रेषित करता है। जब माननीय राज्यपाल द्वारा यह अनुमोदित हो जाता है। तब उस पाठ्यक्रम को प्रारंभ' किया जा सकता है।राज्य सरकार और राज्यपाल के अनुमोदन के बिना कोई भी पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय में लागू नहीं किया जा सकता चाहे वह सर्टिफिकेट कोर्स या डिप्लोमा कोर्स या डिग्री कोर्स' हो।

"2000-7 (7) 94 दिनांक 4 फरवरी 2000 स्ववित्त पोषित पाठ्यक्रम हेतु विश्वविद्यालय द्वारा संपूर्ण योजना तैयार की जाएगी जिसमें अध्यादेश का प्रस्ताव, प्रवेश प्रक्रिया, शिक्षण शुल्क, पाठ्यक्रम की रूपरेखा, निर्धारित मानकों के अनुरूप पदों की आवश्यकता, फर्नीचर उपकरण आए हुए वक्त प्रबंधन आदि का उल्लेख को इस योजना पर शासन से पूर्व क्लीयरेंस प्राप्त करना होगा शासन से क्लीयरेंस के बाद ही पदों के सृजन की कार्यवाही की जाएगी।"

आज विश्वविद्यालय में इन्हीं के बारे में इन्हीं पाठ्यक्रमों के बारे में विरोधाभास है! 'शिक्षक के अनुसार नए पाठ्यक्रमों को विभिन्न संकायों द्वारा नियमानुसार पारित नहीं' कराया गया है एवं इन पाठ्यक्रमों की अभी भी 'वैधानिक अनुमति शासन से प्राप्त नहीं' हुई है।लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन समय-समय पर समाचार पत्रों के माध्यम से यह अवगत कराता है कि विश्वविद्यालय ने सभी पाठ्यक्रम नियमानुसार शासन के द्वारा अनुमति प्राप्त करने के बाद प्रारंभ किए जा रहे हैं।

मैं समझता हूं जब किसी भी चीज में विरोधाभास हो तो उसका समाधान संवाद के माध्यम से किया जा सकता है इसीलिए यह आवश्यक है कि इस पूरे विषय के बारे में 'प्रशासन और शिक्षकों के बीच एक संवाद' हो, विभिन्न पहलुओं पर बातचीत हो और सभी विरोधाभास तथ्यों के बारे में एक 'पारदर्शिता समाज के सामने आए विशेष तौर से विद्यार्थियों के सामने' आए।

मेरा विश्वविद्यालय के सभी वर्गों, यहां तक ऐेकेडमीक परिषद से यह अनुरोध है की इन विषयों पर एक विस्तृत चर्चा हो और पाठ्यक्रमों की संचालन के पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाए की पाठ्यक्रम वैधानिक रूप से सभी प्रकार से सभी नियमों का पालन करके पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय में शुरू करने की सहमति है। यह विषय मे छात्रों के हितों को देखना चाहिए ताकि भविष्य में उनको किसी प्रकार की कठिनाई ना हो। मेरा मानना है कि 'ऐसे गंभीर विषय पर राज्य सरकार स्वम संज्ञान' लेना चाहिए और इस विषय का समाधान शीघ्र से शीघ्र करना चाहिए।

ऐसी गलतियों का खामियाजा भुगत रहे पूर्णिया विश्वविद्यालय के छात्र

बिहार के पूर्णिया विश्वविद्यालय में बिना मान्यताप्राप्त विषयों की पढ़ाई और नए संकाय की शुरूआत करना कोई नई बात नहीं है। विवि की स्थापनाकाल से ही इस तरह के प्रयोग होते आ रहे हैं की फजीहत ही क्यों न हो। नया मामला एक दर्जन स्व-वित्तपोषित कोर्स का है, जिसमें दो वर्ष बाद भी पढ़ाई की शुरूआत नहीं हो पाई है जबकि इन स्व-वित्तपोषित कोर्स में नामांकन के लिए पूर्णिया विवि की ओर से 17 जून, 2019 को अखबार में विज्ञापन भी निकाला गया था। लेकिन नामांकन आज तक सिफर है, पढ़ाई तो दूर की बात है।

विवि के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर राजेश सिंह के आदेश पर कुलसचिव की ओर से विवि के सत्र 2019-20 में स्व-वित्तपोषित कोर्स में नामांकन के लिए यह विज्ञापन जारी किया गया था। यही गोरखपुर विश्वविद्यालय के इस समय कुलपति हैं। इन कोर्स में मास्टर ऑफ फिजिकल एजुकेशन, एमएससी इन फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी, एमएससी इन मॉलीकूलर ब्रीडिग, पीजी डिप्लोमा इन ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी, एमएससी इन फिशरीज साइंस, एमएससी इन बायोइनफॉर्मेटिक, एमएससी इन जीआइएस एंड रिमोट सेंन्सिग, एमएससी इन हॉर्टीकल्चर एंड लैंडस्केप, पीजी डिप्लोमा इन एस्ट्रोलॉजी एंड पामिस्टी, मास्टर ऑफ आर्ट्स इन गांधीयन थाउट, मास्टर इन लाइब्रेरी एंड इनफॉर्मेशन साइंस, मास्टर इन कंपनी सेक्रेट्री, एमबीए और एलएलएम शामिल है।

इनमें सिर्फ एलएलएम और एमबीए में पूर्णिया विवि में सत्र 2019-20 में नामांकन लिया गया था। जिसकी परीक्षा कोरोनाकाल में 2020 में ऑनलाइन ली गई थी, लेकिन आज तक परीक्षाफल घोषित नहीं हुआ है। परीक्षा विभाग की मानें तो एलएलएम में 10-12 विद्यार्थी एवं एमबीए में लगभग 32 विद्यार्थी 2020 में आयोजित ऑनलाइन परीक्षा में शामिल हुए थे।

सिर्फ एकेडमिक काउंसिल और सिडिकेट से पारित

जानकार बताते हैं कि इन स्व-वित्तपोषित कोर्स में नामांकन समेत पढ़ाई शुरू करने को लेकर विवि के एकेडमिक काउंसिल एवं सिडिकेट से प्रस्ताव पारित कराकर राजभवन को स्वीकृति के लिए भेजी गई थी, लेकिन दो वर्ष बाद भी राजभवन से इन कोर्स के संचालन की स्वीकृति पूर्णिया विवि को नहीं मिली है। विश्वविद्यालय की ओर से एलएलएम और एमबीएम में सत्र 2019-20 में नामांकन भी ले लिया गया था जिसकी परीक्षा पिछले वर्ष हुई थी, लेकिन आज तक परीक्षाफल जारी नहीं हो सका है।

इस तरह से नवसृजित विवि द्वारा बगैर संसाधन के एक दर्जन से अधिक वित्त-पोषित कोर्स में एक सत्र से नामांकन की प्रक्रिया को शुरू करना विवि की कार्य संस्कृति पर भी सवाल खड़ा करता है। इसके पूर्व विवि की ओर से छह कॉलेजों में अलग-अलग संकाय एवं विषयों में सत्र 2919-20 से पढ़ाई की अनुमति दी गई थी जिसपर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने पिछले वर्ष नामांकन पर रोक लगाते हुए इन संकाय एवं विषयों में नामांकित छात्रों को आसपास के कॉलेजों में शिफ्ट करने का निर्देश विवि को दिया था।

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