स्टेन स्वामी ने जारी किया बयान, बोले - मेरे कंप्यूटर में कथित माओवादी दस्तावेज मुझे फंसाने की साजिश

स्टेन स्वामी को एनआइए ने भीमा कोरोगांव मामले में गिरफ्तार किया है और उन्हें 23 अक्तूबर तक रिमांड पर लिया गया है। आठ अक्तूबर को अपनी गिरफ्तारी से दो दिन पहले जब इसको लेकर प्रक्रिया चल रही थी तो उन्होंने एक बयान तैयार किया था, जिसे उनके सहयोगी व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की ओर से जारी किया गया है। उसे हम शब्दशः प्रकाशित कर रहे हैं...

Update: 2020-10-10 02:57 GMT

स्टेन स्वामी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, झारखंड

मुझसे NIA ने पांच दिनों (27-30 जुलाई व 6 अगस्त) में कुल 15 घंटे पूछताछ की। मेरे समक्ष उन्होंने मेरे बायोडेटा और कुछ तथ्यात्मिक जानकारी के अलावा अनेक दस्तावेज़ व जानकारी रखी जो कथित तौर पर मेरे कंप्यूटर से मिली एवं कथित तौर पर माओवादियों के साथ मेरे जुड़ाव का खुलासा करते हैं। मैंने उन्हें स्पष्ट कहा कि ये छलरचना है एवं ऐसी दस्तावेज़ और जानकारी चोरी से मेरे कंप्यूटर में डाले गए हैं और इन्हें मैं अस्वीकृत करता हूँ।

NIA की वर्तमान अनुसन्धान का भीमा-कोरेगांव मामले, जिसमें मुझे 'संदिग्ध आरोपी' बोला गया है और मेरे निवास पर दो बार छापा (28 अगस्त 2018 व 12 जून 2019)मारा गया था, से कुछ लेना देना नहीं है। लेकिन अनुसन्धान का मूल उद्देश्य है निम्न बातों को स्थापित करना – 1) मैं व्यक्तिगत रूप से माओवादी संगठनों से जुड़ा हुआ हूँ एवं 2) मेरे माध्यम से बगईचा भी माओवादियों के साथ जुड़ा हुआ है। मैंने स्पष्ट रूप से इन दोनों आरोपों का खंडन किया।

छः सप्ताह चुप्पी के बाद, NIA ने मुझे उनके मुंबई कार्यालय में हाजिर होने बोला है। मैंने उन्हें सूचित किया है कि 1) मेरे समझ के परे है कि 15 घंटे पूछताछ करने के बाद भी मुझसे और पूछताछ करने की क्या आवश्यकता है , 2) मेरी उम्र (83 वर्ष) व देश में कोरोना महामारी को देखते मेरे लिए इतनी लम्बी यात्रा संभव नहीं है। झारखंड सरकार के कोरोना सम्बंधित अधिसूचना अनुसार 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुज़ुर्ग व्यक्तियों को लॉकडाउन के दौरान नहीं निकलना चाहिए, एवं 3) अगर NIA मुझसे और पूछताछ करना चाहती है, तो वो विडियो कांफ्रेंस के माध्यम से हो सकता है।

अगर NIA मेरे निवेदन को मानने से इंकार करे और मुझे मुंबई जाने के लिए ज़ोर दें, तो मैं उन्हें कहूँगा कि उक्त कारणों से मेरे लिए जाना संभव नहीं है। आशा है कि उनमें मानवीय बोध हो। अगर नहीं, तो मुझे व हम सबको इसका नतीज़ा भुगतने के लिए तैयार रहना है।

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मैं सिर्फ इतना और कहूँगा कि जो आज मेरे साथ हो रहा है, ऐसा अभी अनेकों के साथ हो रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, लेखक, पत्रकार, छात्र नेता, कवि, बुद्धिजीवी और अन्य अनेक जो आदिवासियों, दलितों और वंचितों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं और देश की वर्तमान सत्तारूढ़ ताकतों की विचारधाराओं से असहमति व्यक्त करते हैं, उन्हें विभिन्न तरीकों से परेशान किया जा रहा है।

इतने सालों से जो संघर्ष में मेरे साथ खड़े रहे हैं,मैं उनका आभारी हूँ।

लम्बे अरसे से मैं जिन सवालों को उठाते आया हूँ, उन पर एक नोट संलग्न है - क्या अपराध किया है मैंने?

स्टेन स्वामी

जीवन और मृत्यु एक है,

जैसे नदी और समुन्दर एक है(कवि खलील जिब्रान)

पिछले तीन दशकों में मैं आदिवासियों और उनके आत्मा सम्मान और सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार के संघर्ष के साथ अपने आप को जोड़ने और उनका साथ देने का कोशिश की है। एक लेखक के रूप में मैं उनके विभिन्न मुद्दों का आकलन करने का कोशिश करता हूँ। इस दौरान मैं केंद्र व राज्य सरकारों की कई आदिवासी विरोधी और जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध अपनी असहमति लोकतान्त्रिक रूप से जाहिर किया हूँ। मैंने सरकार और सत्तारूढ़ी व्यवस्था के ऐसे अनेक नीतियों के नैतिकता, औचित्य व क़ानूनी वैधता पर सवाल किया है।

1. मैंने संविधान की पांचवी अनुसूची के गैर कार्यान्वयन पर सवाल किया है। यह अनुसूची, अनुच्छेद 244 क भारतीय संविधान, स्पष्ट कहता है कि राज्य में एक आदिवासी सलाहकार परिषद का गठन होना है जिसमें केवल आदिवासी रहेंगे एवं समिति राज्यपाल को आदिवासियों के विकास एवं संरक्षण सम्बंधित सलाह देगी।

2. मैंने पूछा है कि क्यों पेसा कानून को पूर्ण रूप से दरकिनार कर दिया गया है। 1996 में बना पेसा कानून ने पहली बार इस बात को माना कि देश के आदिवासी समुदायों की ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन की अपनी संपन्न सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास है।

3. सर्वोच्च न्यायालय के 1997 के समता निर्णय पर सरकार की चुप्पी पर मैंने अपनी निराशा लगातार जताई है। इस निर्णय का उद्देश्य था आदिवासियों को उनकी ज़मीन पर हो रहे खनन पर नियंत्रण का अधिकार देना एवं उनकी आर्थिक विकास में सहयोग करना।

4. 2006 में बने वन अधिकार कानून को लागू करने में सरकार के उदासीन रवैया पर मैंने लगातार अपना दुःख व्यक्त किया है। इस कानून का उदेश्य है आदिवासियों और वन.आधारित समुदायों के साथ सदियों से हो रहे अन्याय को सुधारना।

5. मैंने पूछा है कि क्यों सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले जिसकी ज़मीन, उसका खनीज को लागू करने में इच्छुक नहीं है एवं लगातार बिना ज़मीन मालिकों के हिस्से के विषय में सोचे, कोयला ब्लाॅक का नीलामी कर कंपनियों को दे रही है।

6. भूमि अधिग्रहण कानून - 2013 में झारखंड सरकार के 2017 के संशोधन के औचित्य पर मैंने सवाल किया है। यह संशोधन आदिवासी समुदायों के लिए विनाश का हथियार है। इस संशोधन के माध्यम से सरकार ने सामाजिक प्रभाव आकलन की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया एवं कृषि व बहुफसलिया भूमिका गैर कृषि इस्तेमाल के लिए दरवाज़ा खोल दिया।

7. सरकार द्वारा लैंड बैंक स्थापित करने के विरुद्ध मैंने कड़े शब्दों में विरोध किया है। लैंड बैंक आदिवासियों को समाप्त करने की एक और कोशिश है क्योंकि इसके अनुसार गाँव की गैर.मजरुआ, सामुदायिक भूमि ज़मीन सरकार की है और न कि ग्राम सभा की एवं सरकार अपनी इच्छा अनुसार यह ज़मीन किसी को भी मूलतः कंपनियों को को दे सकती है।

8. हज़ारो आदिवासी-मूलवासियों, जो भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के अन्याय के विरुद्ध सवाल करते हैं, को नक्सल होने के आरोप में गिरफ्तार करने का मैंने विरोध किया है। मैंने उच्च न्यायालय में झारखंड राज्य के विरुद्ध पीआइएल दर्ज कर मांग की है कि 1. सभी विचारधीन कैदियों को निजी बांड पर बेल में रिहा किया जाए, 2. अदालती मुकदमा में तीव्रता लायी जाए क्योंकि अधिकांश विचारधीन कैदी इस फ़र्ज़ी आरोप से बरी हो जाएंगे, 3. इस मामले में लम्बे समय से अदालती मुक़दमे की प्रक्रिया को लंबित रखने के कारणों के जाँच के लिए न्यायिक आयोग का गठन हो, 4. पुलिस विचारधीन कैदियों के विषय में मांगी गयी पूरी जानकारी पीआइएल के याचिकाकर्ता को दें. इस मामले को दायर किए हुए दो साल से भी ज्यादा हो गया है लेकिन अभी तक पुलिस ने विचारधीन कैदियों के विषय में पूरी जानकारी नहीं दी है. मैं मानता हूँ कि यही कारण है कि शाषण व्यवस्था मुझे रास्ते से हटाना चाहती है और हटाने का सबसे आसान तरीका है कि मुझे फ़र्ज़ी मामलों में गंभीर आरोपों में फंसा दिया जाए और साथ ही, बेकसूर आदिवासियों को न्याय मिलने के न्यायिक प्रक्रिया को रोक दिया जाए।

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