Types and Signs of Abuse: गालियां राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने का हथियार बना दी गई हैं

Types and Signs of Abuse: गालियां हमारे समाज का अटूट हिस्सा हैं। गाली देने की परंपरा कबसे शुरू हुई; या पहली गाली किसको किसने दी, ये मुझे नहीं पता, इसपर कोई शोध ग्रंथ हो, यह भी मुझे नहीं पता...

Update: 2022-03-20 09:47 GMT

धनंजय कुमार की रिपोर्ट

Types and Signs of Abuse: गालियां हमारे समाज का अटूट हिस्सा हैं। गाली देने की परंपरा कबसे शुरू हुई; या पहली गाली किसको किसने दी, ये मुझे नहीं पता, इसपर कोई शोध ग्रंथ हो, यह भी मुझे नहीं पता, लेकिन ये पता है कि गालियां हर समाज में है। अभी दो दिन पहले होली बीती है, मुझे बचपन याद आता है तो फागुन का महीना शुरू होते ही, कुछ लोग गाली वाली होली गाते गली से गुजरते थे। किसी को बुरा नहीं लगता था, बुरा लगता भी हो तो कोई बोलते नहीं थे। कई तो कह देते थे फगुनाहट है, होली भर तो चलेगा। 'भर फागुन बुढ़वा देवर लागे' होली तो बाकायदा झाल मजीरे के साथ गाई जाती थी, और भी ऐसी होली गाई जाती थी, जिसका संबंध सिर्फ स्त्री पुरुष यौन संबंध से हुआ करता था।

सच बताऊँ बचपन में मुझे गालियां असहज कर देती थीं। लगता था जो आदमी गाली दे रहा है, बड़ा नीच किस्म का है। हालांकि गालियां गाँव के जीवन में बड़ी आम हैं। सास बहु का झगड़ा हो या किसी पड़ोसी का झगड़ा या गोतिया घर का; गालियां बरसात की तरह बरसती थीं। हालांकि, मुझे याद है मेरे घर से कुछ दूरी पर जब भी दो औरतें लड़ती थीं, भारी भीड़ इकट्ठा हो जाती थी, क्योंकि गालियों का जैसे खजाना खुला जाता था। नई नई तरह की गालियां सुनने को मिलती थीं लोगों को और लोग मजे लेते थे। दोनों औरतें भी हाथ उठा उठा कर गालियां देती थीं, जो शुरू होती थीं श्रापने से और धीरे धीरे कब स्त्री-पुरुष जननांगों पर आ जाती थीं, पता नहीं चलता था, और फिर धीरे धीरे दोनों औरतें गालियों के माध्यम से झगड़े को इन्जॉय करने लगती थीं। दोनों महिलायें गरीब और जमादार समाज से थी, अनपढ़ थी, लेकिन दोनों दबंग थीं, गाँव में उन्हे लड़ाकिन कहते थे लोग और लोग उनसे दूर ही रहते थे, जानते थे उन दोनों से जीतना मुश्किल है। दोनों के पति और ससुर भी सरेंडर किए रहते थे, पति बीच में आता भी प्यार से पत्नी को चुप कराने तो पत्नी उसे भी न्योत देती थी अच्छे से। न्योत देने का मतलब समझिए उसे भी गालियों से सराबोर कर देती थीं।

फिर मैंने देखा शादियों में अक्सर गाली देने का रिवाज था। शादी में दी जाने गाली को भाँड़ि कहा जाता था। गीत गाने वाली औरतों में से कुछ औरतें होती थीं, जो भाँड़ि देने में स्कॉलर होती थीं। आमतौर पर लड़के की बुआ, बहनें और माँएं गालियों के केंद्र में होती थीं। और यह परंपरा सभी समाजों में थीं, बारात को खँचिया भर भर गालियां दी जाती थीं।

मुझे याद है पिताजी या उनके दोस्त, जो कि गाँव के संभ्रांत माने जाते थे, वे भी कभी कभी गालियां देते थे, लेकिन प्रायः तब जब किसी पर गुस्सा हो जाते थे। घास गढ़ने वाली अक्सर उनका शिकार होती थी, क्योंकि घास गढ़ने वाली औरतें कई बार फसलों का नुकसान भी कर देती थी, इसके अलावा जब कोई अनजान आदमी या किसी का जानवर फसलों को नुकसान कर देता था, तब गालियां देते थे। ये गालियां गुस्सा और कुंठा में निकलती थीं।

बचपन में हम भी गाली देते थे, लेकिन छोटी छोटी गाली, वो भी गुस्से की स्थिति में। मजा के तौर पर गाली कभी नहीं दी, जहां तक मुझे याद आता है, क्योंकि गाली देना अच्छी बात नहीं है, यही बड़े सिखाते थे, टोकते थे। या कई बार तो गाली देने की वजह से बच्चे को पिटते भी देखा था। मजे के लिए कभी गाली सोची भी तो खुद पर शर्म आ जाती थी।

गाँव में एक दो ऐसे लोग भी होते थे, जिन्हें लोग चिढ़ाते थे, क्योंकि वो गंदी गंदी गालियां देते थे। उनकी गालियां सुनकर लोग ऐसे मजा लेते थे, जैसे गुणी लोग क्लासिक संगीत का मज़ा लेते हैं।

ये तो समाज और व्यवहार की बात हुई, लेकिन जैसे जैसे मैं पढ़ाई और सभ्य सोसायटी से अवगत होता गया, गालियां बुरी होतीं हैं और ये असभ्यता का परिचायक है, ये जाना। हालांकि जो ऐसा कहते थे, कई बार वह भी गालियों का इस्तेमाल करते ही थे। फिर भी ये था कि गाली देना अच्छी बात नहीं है। अखबार में जब काम करने लगा तब फूहड़ शब्दों से परिचय हुआ और सीनियर कहते थे, इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल मत करो, अखबार है, घर में जाता है। घरों में गालियां थीं, लेकिन अखबार के माध्यम से गालियां घर में जाएँ, ये न सीनियर को पसंद था और न ही घर मालिकों को। जिन कहानियों-उपन्यासों में गालियों का इस्तेमाल होता था, पहले उसे एडल्ट साहित्य कहा जाता था, लेकिन कई बार वैसे उपन्यास या कहानी समाज के सच के तौर पर स्वीकार भी किये गए। मंटो इस विधा में बड़ा नजीर थे।

लेकिन जबसे सोशल मीडिया का बूम आया है। खासकर मोदी जी के उदय के बाद गालियां अभिव्यक्ति का मजबूत माध्यम बन गई हैं। कई लोग तो सिर्फ गालियां ही अभिव्यक्त करते हैं। गालियां राजनीतिक या धार्मिक विरोधियों से निबटने का बड़ा हथियार बन गया है।

वो युग गया जब राजनीतिक या सामाजिक विषयों पर सार्थक रचनात्मक बहसे हुआ करती थीं मंचों पर या धार्मिक मसलों पर शास्त्रार्थ हुआ करते थे। अब सबसे बड़ा मंच सोशल मंच फ़ेसबुक और ट्विटर है और यहाँ गालियां देने वाले प्रचुर मात्रा में बिन बुलाए आ धमकते हैं।

रवीश कुमार तो अकसर शिकायत करते रहे हैं कि लोग उन्हें गालियां और धमकिया भी देते हैं। राजनेताओं के बयानों के पोस्ट पर भी गालियों का नाला बहते देखा है। ऐसे गालीबाज़ों से कई बार मेरा भी पाला पड़ा है। पहले तो मैं गुस्से में आ जाया करता था, कई लोगों को ब्लॉक भी किया, लेकिन अब समझ में आ गया है कि यह एक अभियान है। अपने विरोधियों को चुप कराने का। और ये गालियां उनका ही हथियार है, जिनके पास कोई तर्क नहीं होता। बहस करने की योग्यता नहीं होती। झूठ बोलते हैं और किसी व्यक्ति विशेष की भक्ति पागलपन की हद तक भक्ति करते हैं।

सबकी अपनी अपनी पसंद नापसंद है, इसमें कोई बुराई नहीं, हमारी मित्रता सूची में कई ऐसे परिचित अपरिचित साथी हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा से हम सहमत नहीं हैं, और मेरी विचारधारा से वे इत्तेफाक नहीं रखते, ऐसे में हम एक दूसरे के पोस्ट तो पढ़ते हैं, लेकिन कोई कमेन्ट नहीं देते। मालूम है, बात कुतर्क पर जा ठहरेगी। लेकिन वो हमारे पोस्ट पर गालियां लिखें हम उनके पोस्ट पर गालियां लिखें ये अच्छी बात नहीं। हालांकि गाली देने में मेरा भी मुंह कोई पकड़ नहीं सकता, लेकिन यह अपने संस्कार और विवेक को शूट नहीं करता। सोशल मीडिया पर गालियां वही देते हैं जो संस्कार से हीन और विवेक से शून्य होते हैं। ऐसे लोगों को जवाब में गाली देने से बेहतर लगा मुझे उन्हे ब्लॉक कर देना। इसी डर से अब लोगों के फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने में भी हिचक होती है। पता नहीं कैसा आदमी हो? इस वजह से सैकड़ों अनजान लोगों के रिक्वेस्ट पड़े हैं। मन नहीं होता एक्सेप्ट करने का।

लेकिन क्या यही एकमात्र हल है?

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