Bank Privatization Bill : राकेश टिकैत का निजीकरण के खिलाफ साझा आंदोलन शूरू करने की तैयारी तो नहीं, जानें ऐसा क्यों?

Bank Privatization Bill : अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) के महासचिव सी एच वेंकटचलम ने एक बयान में कहा कि इसे देखते हुए यूएफबीयू ने निजीकरण के कदम का विरोध करने का फैसला किया है।

Update: 2021-12-05 12:30 GMT

(हर साल 10 दिवसीय किसान आंदोलन मेला आयोजित करने का ऐलान)

Bank Privatization Bill: किसान आंदोलन के बल पर एक लोकप्रिय नेता के रूप अपनी पहचान बनाने के बाद राकेश टिकैत ने एक दिन पहले एक टिवट कर अपने नए मिशन के संकेत दिए हैं। उनके इस टिवट से साफ है कि वो मोदी सरकार के निजीकरण की मुहिम को देशभर में एक ऐसा मंच बनाना चाहते हैं जो सभी के लिए एक साझा आंदोलन और साझा मंच बन सके। सरकार को जन विरोधी नीतियों पर अमल करने से रोक सके। या राकेश टिकैत किसान आंदोलन को आगे जारी रखने के लिए बैंकों के निजीकरण को अपनी मुहिम से जोड़ना चाहते हैं।

ये है राकेश टिकैत का नया टिवट


हमने आंदोलन की शुरुआत में आगाह किया था कि अगला नंबर बैंकों का होगा। नतीजा देखिए, 6 दिसंबर को संसद में सरकारी बैंकों के निजीकरण का बिल पेश होने जा रहा है। निजीकरण के खिलाफ देशभर में साझा आंदोलन की जरूरत है।

क्या है बैंक निजीकरण (संशोधन) विधेयक 2021?

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के बजट के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) के निजीकरण की घोषणा की थी। इसका मकसद विनिवेश अभियान के तहत पैसा जुटाना है। मोदी सरकार इसके जरिए 1.75 लाख करोड़ रुपए जुटाना चाहती है। इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार 6 दिसंबर 2021 को बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 संसद के चालू शीतकालीन सत्र में पेश करने के लिए तैयार है। इस कदम से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में न्यूनतम सरकारी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। इस योजना के तहत सरकारी की हिस्सेदारी 51% से कम 26% करने की है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की निजीकरण योजना के लिए आवश्यक नियामकीय मंजूरी शीतकालीन सत्र के दौरान दी जाएगी, लेकिन कम से कम कुछ वर्षों के लिए कुछ हिस्सेदारी बनाई रखी जाएगी और बाद के चरण में हिस्सेदारी कम की जाएगी।

शीतकालीन सत्र के लिए विधायी व्यवसाय की सूची में दर्ज सूचना के मुताबिक बैंकिंग कंपनियों ( उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण ) अधिनियम, 1970 और 1980 में संशोधन और बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 में आकस्मिक संशोधन के लिए चालू सत्र में पेश किया जा सकता है। साथ ही दो बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री की सुविधा के लिए बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में आकस्मिक संशोधन करेगा। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) के महासचिव सी एच वेंकटचलम ने एक बयान में कहा कि इसे देखते हुए यूएफबीयू ने निजीकरण के कदम का विरोध करने का फैसला किया है।

नीति आयोग ने दिया था सुझाव

नीति आयोग ने विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप को दो बैंकों और एक बीमा कंपनी का निजीकरण का सुझाव दिया था। नीति आयोग ने निजीकरण के लिए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक का नाम आगे बढ़ा था। इस मामले में अब केवल आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

वित्त मंत्री ने की थी इस बात की घोषणा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2021 में बजट भाषण के दौरान विनिवेश अभियान के रूप में दो सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण के सरकार के फैसले की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि आईडीबीआई बैंक के अलावा हम दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा का निजीकरण करने का प्रस्ताव करते हैं।

16 से 19 दिसंबर तक होगा काम प्रभावित

निजीकरण के खिलाफ यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ( यूएफबीयू ) ने 16 दिसंबर से दो दिन की देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। 16 और 17 दिसंबर को बैंक कर्मचारी हड़ताल पर रहेंगे। वहीं 18 और 19 को शनिवार-रविवार है। शनिवार को ज्यादा काम नहीं हो पाता है, वहीं रविवार को पूर्ण अवकाश रहेगा, इस कारण करीब 4 दिन तक बैंक संबंधित काम नहीं हो पाएंगे। ऐसे में लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

UFBU के तहत हैं 9 यूनियनें

यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) ने दो सरकारी बैंकों के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ 16 दिसंबर से दो दिन की देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। यूएफबीयू के तहत बैंकों की नौ यूनियनें आती हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल की शुरुआत में वित्त वर्ष 2021-22 का बजट पेश करते हुए 1.75 लाख करोड़ रुपए जुटाने के विनिवेश लक्ष्य के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों के निजीकरण की घोषणा की थी।

2019 में आईडीबीआई का हुआ था निजीकरण

इससे पहले सरकार ने 2019 में आईडीबीआई बैंक में अपनी बहुलांश हिस्सेदारी एलआईसी को बेचकर आईडीबीआई बैंक का निजीकरण कर दिया था। इसके अलावा पिछले चार साल में 14 सरकारी बैंकों का विलय किया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि राकेश टिकैत न इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निजीकरण का हर स्तर पर विरोध करने कि साझा आंदोलन शूरू करने के संकेत दिए हैं।

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