पटरी से उतरा नगा शांति समझौता, नगा संगठन ने की 'अलग झंडा-अलग संविधान' की मांग

अगस्त 2015 में केंद्र ने एनएससीएन (आईएम) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत में 'सबसे पुराने उग्रवाद' को निपटाने के लिए एक "ऐतिहासिक समझौता" के रूप में वर्णित किया, इसने चल रही शांति वार्ता के लिए मंच तैयार किया....

Update: 2020-08-16 06:24 GMT

 दिनकर कुमार का विश्लेषण

केंद्र सरकार ने इस साल सितंबर तक नगालैंड में एनएससीएन (आईएम) और एनएनपीजी (नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स) के साथ दशकों पुरानी शांति वार्ता का समापन करने का फैसला किया है। इसके लिए एनएससीएन (आई-एम) के सामूहिक नेतृत्व और नगा वार्ता के लिए प्रधानमंत्री के विशेष दूत आर.एन. रवि, ​​जो नागालैंड के गवर्नर भी हैं, के बीच मैराथन बैठकों का एक दौर आयोजित हो चुका हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी नगा राजनीतिक मुद्दों के अंतिम निपटान के लिए एक सितंबर की समय सीमा निर्धारित की है। हालांकि ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने की तारीख और स्थान को अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

यह उल्लेख किया जा सकता है कि सरकार ने नगालैंड के लिए अलग झंडे और संविधान की मांग को खारिज कर दिया है। यह कहते हुए कि समझौते पर हस्ताक्षर के बाद राज्य और केंद्र सरकारों के बीच बातचीत के लिए इन दो विवादास्पद मुद्दों को छोड़ा जा सकता है, सूत्रों ने कहा कि एक निहित स्वार्थ समूह शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए प्रयास करता रहा है।

सूत्रों के अनुसार वार्ताकार और एनएससीएन (आई-एम) प्रतिनिधियों के बीच नगा संधि के तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने से पहले एक या दो दौर की बैठकें हो सकती हैं, जिसके लिए एनएससीएन (आई-एम), नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों की कार्य समिति और अन्य हितधारक हैं।

सितंबर की समयसीमा की रिपोर्टों के बीच एनएससीएन (आईएम) के युद्धविराम संयोजक किहोई स्वू ने कहा है, 'यह वार्ता की प्रगति पर निर्भर करता है। यदि केंद्र कोई समाधान खोजना चाहता है तो दोनों पक्षों को 2015 के फ्रेमवर्क समझौते पर कायम रहना होगा और जिन बातों पर सहमति बन चुकी है उनको ध्यान में रखना होगा। इनका पालन किया जाना चाहिए और अगर हम फिर से बदलाव करते हैं तो अधिक समय लगेगा क्योंकि समझौते पर नगालैंड और केंद्र दोनों के प्रतिनिधियों की सहमति जरूरी होगी।'

क्या यह अंतिम समाधान होगा, इस मुद्दे पर किहोई स्वू ने कहा, 'अंतिम समाधान के लिए उन्हें फ्रेमवर्क एग्रीमेन्ट का पालन करना होगा। अन्यथा 5 और 10 वर्षों के बाद, यदि कोई स्थायी समाधान नहीं होता है तो फिर सशस्त्र संघर्ष शुरू होगा।'

नगा शांति वार्ता के जरिये औपनिवेशिक शासन के समय से चले आ रहे विवादों को निपटाने की कोशिश हो रही है। नगा एकल जनजाति नहीं है, बल्कि एक जातीय समुदाय है, जिसमें कई जनजातियाँ शामिल हैं, जो नगालैंड और उसके पड़ोस में रहते हैं। नगा समूहों की एक प्रमुख मांग ग्रेटर नगालिम की रही है जो न केवल नगालैंड राज्य बल्कि पड़ोसी राज्यों के हिस्सों और यहां तक ​​कि म्यांमार के राज्यों को भी कवर कर सके।

1826 में अंग्रेजों ने असम पर अधिकार कर लिया था, जिसमें बाद में उन्होंने नगा हिल्स जिला बनाया और अपनी सीमाओं का विस्तार किया। ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ नगा राष्ट्रवाद का जोर आजादी के बाद भी जारी रहा और नगालैंड राज्य बनने के बाद भी। इस तरह अनसुलझे मुद्दों ने दशकों के विद्रोह को जन्म दिया, जिसने नागरिकों सहित हजारों लोगों की जान ले ली।

नगा प्रतिरोध का सबसे पुराना संकेत नगा क्लब के गठन के साथ 1918 का है। 1929 में क्लब ने साइमन कमीशन को 'प्राचीन काल की तरह स्व शासन निर्धारित करने के लिए खुद को अकेला छोड़ने के लिए' कहा था।

1946 में ए जेड फिज़ो ने नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) का गठन किया, जिसने 14 अगस्त, 1947 को नगा स्वतंत्रता की घोषणा की और फिर 1951 में एक जनमत संग्रह कराने का दावा किया, जिसमें भारी बहुमत ने एक स्वतंत्र राज्य का समर्थन किया।

1950 के दशक के प्रारंभ में एनएनसी ने हथियार उठा लिए और भूमिगत हो गया। एनएनसी 1975 में विभाजित हो गई। अलग हुआ समूह एनएससीएन कहलाया, जो बाद के वर्षों में फिर विभाजित हो गया। 1988 में विभाजित हो गया। 1988 में एनएससीएन(आई-एम) और एनएससीएन (खापलांग) अस्तित्व में आए।

2015 से चल रहे वार्ता समझौते से पहले नगा समूहों और केंद्र के बीच दो अन्य समझौते हुए। 1975 में शिलांग में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए जिसमें एनएनसी नेतृत्व ने हथियार छोड़ने पर सहमति व्यक्त की। इसाक चिशी स्वू, थुइंगलेंग मुइवा और एस एस खापलांग सहित कई एनएनसी नेताओं ने समझौते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और एनएससीएन बनाने के लिए अलग हो गए। 1988 में एक और विभाजन हुआ, जिसमें खापलांग ने एनएससीएन (के) का गठन किया, जबकि इसाक और मुइवा ने एनएससीएन (आई-एम) का नेतृत्व किया।

1997 में एनएससीएन (आईएम) ने 1997 में सरकार के साथ एक युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए। प्रमुख समझौता यह था कि एनएससीएन (आईएम) के खिलाफ कोई उग्रवाद विरोधी आक्रमण नहीं होगा, जो बदले में भारतीय सेना पर हमला नहीं करेगा।

अगस्त 2015 में केंद्र ने एनएससीएन (आईएम) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत में "सबसे पुराने उग्रवाद" को निपटाने के लिए एक "ऐतिहासिक समझौता" के रूप में वर्णित किया। इसने चल रही शांति वार्ता के लिए मंच तैयार किया। 2017 में नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स के बैनर के तहत छह अन्य नगा सशस्त्र संगठन बातचीत में शामिल हुए।

सरकार ने अभी तक फ्रेमवर्क समझौते का सार्वजनिक रूप से विवरण नहीं दिया है। समझौते के बाद सरकार ने एक प्रेस बयान में कहा था: 'भारत सरकार ने नगाओं के अद्वितीय इतिहास, संस्कृति और स्थिति और उनकी भावनाओं और आकांक्षाओं को मान्यता दी है। एनएससीएन (आईएम) ने भारतीय राजनीतिक प्रणाली और शासन को समझा और उसकी सराहना की है।'

मोदी सरकार के साथ 2015 के नगा फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पहली बार एनएससीएन (आईएम) के प्रमुख टी. मुइवा ने कहा है कि नगा ध्वज और अलग संविधान की मांग वापस नहीं ली जा सकती और इस समझौते में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के सब नगा बहुल के एकीकरण की बात शामिल थी।

मुइवा के बदले हुए रुख में शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने की क्षमता है क्योंकि सरकार ने पहले एक अलग संविधान लागू करने से इंकार किया था और कहा था कि असम, अरुणाचल और मणिपुर को ग्रेटर नागालिम 'के लिए विभाजित नहीं किया जाएगा। एक सूत्र ने कहा, 'हालांकि नागालैंड में मीडिया में इस आशय के बयान सामने आए हैं, लेकिन मुइवा ने फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ऐसा कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया था।'

(दिनकर कुमार पिछले तीस वर्षों से पूर्वोत्तर की राजनैतिक मसलों की रिपोर्टिंग करते रहे हैं।)

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