ज्ञानेश्वरी रेल हादसा : 11 सालों से 16 परिवारों का खत्म नहीं हो रहा इंतजार, लापता 18 लोगों की न कोई खबर- न मिला डेथ सर्टिफिकेट

माओवादियों द्वारा ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को डिरेल किया गया, इस रेल हादसे में 148 लोगों की जान गयी, वहीं कई परिवारों ने अपनों को खो दिया, अब 11 सालों बाद भी ना तो 16 परिवार के 18 लोगों की कोई खबर है, ना ही प्रशासन मामले पर क्लोरज रिपोर्ट दे रहा

Update: 2021-07-05 05:45 GMT

(रेल हादसे में राजेश बत्रा की पत्नी-बेटे की मौत, बेटी स्नेहा आज भी लापता)

जनज्वार ब्यूरो। 28 मई 2010 को हावड़ा-मुंबई लोकमान्य तिलक ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस डिरेल हो गयी थी। इस रेल हादसे को माओवादियों ने कथित तौर पर पश्चिमी मिदनापुर में अंजाम दिया था। इसके कारण मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस (Jnaneswari Express) पटरी से उतरकर सामने से आ रही मालगाड़ी से जा टकरायी और इस भीषण रेल दुर्घटना में 148 यात्रियों की मौत हो गई थी। कई लोग लापता भी हुए। इनमें से कुछ परिवार ऐसे हैं, जो हादसे के 11 सालों बाद भी अपनों के इंतजार में है। ना तो उनका इंतजार ही खत्म हो रहा है, ना ही प्रशासन की ओऱ से मामले में क्लोजर रिपोर्ट दी जा रही है।

लापता 18 लोगों का 11 सालों से नहीं कोई सुराग

11 साल पहले हुए इस भयावह ट्रेन एक्सीटेंड में कई परिवार बर्बाद हो गये। कई लोगों ने अपनों को खो दिया तो कईयों को आज भी ये पता नहीं उनके परिजन जीवित है या नहीं, वो कभी वापस भी आयेंगे या नहीं। अगर इन्हें कुछ मिला है तो वो है बस इंतजार। इस हादसे के बाद 16 परिवार के 18 लोग ऐसे हैं, जो आज भी सरकारी आंकड़ों में लापता है। दुर्घटना वाली जगह से मिले कशव के टुकड़ों की डीएनए जांच से भी इनलोगों का कोई सुराग नहीं मिला। लिहाजा, सभी सरकारी लिस्ट में आज भी मीसिंग हैं।

'ना पति की कोई खबर, ना मृत्यु प्रमाण पत्र'

वहीं इस हादसे में मृत घोषित अमृतवन चौधरी नाम के शख्स के 11 सालों बाद जिंदा पाये जाने से बाकी परिवारों की बेचैनी बढ़ गयी है। बता दें कि ज्ञानेश्वरी रेल हादसे में मृत यात्रियों के नामों की लिस्ट में अमृतवन चौधरी का भी नाम शामिल था। हादसे के बाद उसके परिजनों को मुआवजे के तौर पर 4 लाख रुपए की रकम दी गई थी। साथ ही अमृतवन चौधरी की बहन जो इस वक्त दक्षिण पूर्व रेलवे के सियालदह डिवीजन में असिस्टेंट सिंग्नल के रूप में कार्यरत है। इसके साथ ही वह कथित तौर पर केंद्र सरकार की भी एक नौकरी कर रही हैं, जो भाई की मौत के बाद मुआवजे के तौर पर उसे मिली है। वहीं सीबीआई ने 11 सालों बाद अमृतवन को जीवित पाया, जिसके बाद अब केस दर्ज हुआ है।

28 मई 2010 को डिरेल हुई थी ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस, हादसे के बाद की तस्वीर

इस मामले के खुलासे से 11 सालों से अपने पति का इंतजार कर रही ज्योतिका अता शॉक्ड हैं। हावड़ा के सल्किया की रहनेवाली 39 वर्षीय ज्योतिका का कहना है कि उनके पति प्रसन्नजीत अता, ज्ञानेश्वरी ट्रेन से भूसावल जा रहे थे। हादसे के बाद से वो लापता है। उन्होंने आशंका जताई कि क्या पता जिस शख्स की लाश का अंतिम संस्कार अमृतवन चौधरी समझ कर किया गया, वो मेरे पति प्रसन्नजीत की हो। उन्होंने बताया कि 11वीं में पढ़नेवाली उनकी बेटी पोलॉमी इसी आशंका को लेकर सीबीआई ऑफिस भी गयी थी। ज्योतिका ने पूरे मामले को लेकर सीबीआई को पत्र भी लिखा है।

परिवार की माली हालत का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि परिवार में प्रसन्नजीत, एकमात्र कमानेवाले शख्स थे। लेकिन 11 सालों से उनकी कोई खबर नहीं है। ना ही प्रशासन की ओऱ से उन्हें मृत मानकर मृत्यु प्रमाण पत्र ही दिया जा रहा। ऐसे में पति के इंतजार में बैठी ज्योतिका को बीमा के पैसे भी नहीं मिल पा रहे, ना ही वो अफने पति का बैंक अकाउंट ही हैंडल कर पा रही है। 10 लाख का मुआवजा मिलने की बात करते हुए ज्योतिका ने कहा कि अगर डेथ सर्टिफिकेट मिल जाता तो उनके परिवार की मदद हो जाती। साथ ही बेटी को मुआवजे के तौर पर सरकारी नौकरी मिल जाती। 2019 में गंभीर रूप से बीमार होने के बाद ज्योतिका बिस्तर पर है। ऐसे में परिवार को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

आज भी बेटी के इंतजार में एक पिता

ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर में झारग्राम के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई थी। इस हादसे में बेलुरू के रहनेवाले राजेश बत्रा ने अपनी पत्नी और बेटे को खो दिया। दोनों की मौत हो गयी, जबकि उनकी बेटी स्नेहा आज भी लापता है। हादसे के वक्त स्नेहा 14 साल की थी।

अपनी बेटी को वापस पाने के लिए राजेश बत्रा ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, बाद में सीएम ममता बनर्जी और पीएम मोदी को भी पत्र लिखा। लेकिन इनका इंतजार खत्म नहीं हुआ। अब राजेश कहते हैं कि उन्हें किसी से कोई उम्मीद नहीं है। उन्होंने बताया कि हादसे के सात महीने बाद पत्नी का शव मिला, जबकि बेटे ने एक्सीडेंट के तीन दिन बाद कोलकाता के एक हॉस्पीटल में दम तोड़ दिया। लेकिन उनकी बेटी का कोई कुराग नहीं है। हर तरफ से निराश हो चुके राजेश बत्रा अब सीबीआई की मदद ले सकते हैं।

कुछ ऐसी ही दास्तां है सुरेंद्र कुमार सिंह की जिनकी पत्नी नीलम और बेटे राहुल का नाम आज भी मीसिंग लिस्ट में शामिल है। हादसे वाले दिन को याद करते हुए उन्होंने बताया कि रेलवे ट्रैक पर लाशों के टुकड़े पड़े थे। और स्थानीय लोग कह रहे थए कि जिसे वो मिलता है, उठा लो। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी और बेटे का शव उन्हें नहीं मिला। वहीं ज्योतिका की ही तरह सुरेंद्र भी अपनी पत्नी के बैंक अकाउंट को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं। 2018 में पत्नी के डेथ सर्टिफिकेट के लिए उन्होंने कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया, लेकिन मामला अभी भी लंबित है।

ज्योतिका और सुरेंद्र सिंह के वकील का कहना है कि, कानूनी तौर पर अगर कोई शख्स सात सालों तक लापता रहता है, तो कोर्ट उसे मृत मान लेता है। लेकिन कोरोना महामारी के कारण बीते एक सालों से कोर्ट में कामकाज सही ढंग से नहीं हो पा रहे हैं, ऐसे में केस पेंडिंग है।

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