गुड़गाँव का पार्क अस्पताल गरीब दम्पत्ति के साथ कर रहा जुर्म, इन्जेक्शन की ओवेरडोज देकर ऑपरेशन के मांग रहा लाखों रूपये

हाथ बेकार हो जाने के बावजूद पार्क अस्पताल के डॉक्टर अपनी गलती को नहीं मान रहे हैं। पीड़ित दंपत्ति को बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। हाथ के ऑपरेशन के नाम पर पीड़िता से लाखों की फीस मांगी जा रही है।

Update: 2021-05-30 08:33 GMT

गुड़गाँव का पार्क अस्पताल गरीब दम्पत्ति के साथ कर रहा जुर्म, इन्जेक्शन की ओवेरडोज देकर ऑपरेशन के मांग रहा लाखों रूपये। (फोटो- नव भारत टाइम्स)

जनज्वार ब्यूरो,दिल्ली। गुड़गाँव के डूंडाहेड़ा स्थित पार्क हॉस्पिटल में मरीज के साथ गंभीर लापरवाही बरतने का मामला सामने आया है। चकरपुर निवासी दंपति ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय में पार्क अस्पताल के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की है। पीड़ित दंपति के अनुसार वे गर्भपात कराने के लिए डूंडाहेड़ा स्थित पार्क हॉस्पिटल गए थे। वहां डॉक्टर ने पीड़िता को एंटीबायोटिक का इंजेक्शन लगाया था। जिसका रिएक्शन हो गया। पीड़िता का पूरा हाथ काला पड़ गया है। हाथ धीरे-धीरे काम करना भी बंद कर रहा है। इंफेक्शन धीरे-धीरे पूरे हाथ में फैल गया है। हाथ को काटने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। पार्क अस्पताल के डॉक्टर इस मामले में न तो अपनी गलती ही मान रहे हैं और हाथ के ऑपरेशन के नाम पर लाखों की फीस की मांग कर रहे हैं।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चकरपुर निवासी सरफराज 23 अप्रैल की सुबह पत्नी विनीता को गर्भपात कराने के लिए पार्क अस्पताल लेकर गये थे। प्रक्रिया के दौरान विनीता को एंटीबायोटिक इंजेक्शन दिया गया था। उसी दिन उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया था। घर आने पर विनीता के हाथ में दर्द शुरू हो गया। उन्होंने हॉस्पिटल में फोन लगाया तो बात नही हो सकी। पूरी रात हाथ में दर्द होता रहा। 24 अप्रैल को हाथ दिखाने वे दोबारा अस्पताल गये। हाथ देखने के बाद डॉक्टर ने दवाइयां बदल दीं। इसका कोई असर नहीं हुआ। 25 अप्रैल को अल्ट्रासाउंड किया गया। इसके बाद डॉक्टर ने पीड़िता को दिल्ली के मनोहर लाल अस्पताल में जाकर इलाज कराने कहा गया।

पीड़ित दंपति डॉक्टर के कहे अनुसार दिल्ली के मनोहर लाल अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टर ने बताया कि इंफेक्शन पूरे हाथ में फैल गया है। नस का ऑपरेशन 6 से 8 घंटे में होता है लेकिन 4 दिन हो गए इसलिए अब हाथ ठीक नहीं हो सकता। डॉक्टर ने बताया कि जो इंजेक्शन पीड़िता को दिया गया था वह बहुत अधिक मात्रा में दिया गया था जिसके कारण यह रिएक्शन हुआ है। रिएक्शन और न फैले इसके लिए हाथ को काट कर शरीर से अलग करना होगा।

हाथ बेकार हो जाने के बावजूद पार्क अस्पताल के डॉक्टर अपनी गलती को नहीं मान रहे हैं। पीड़ित दंपत्ति को बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। हाथ के ऑपरेशन के नाम पर पीड़िता से लाखों की फीस मांगी जा रही है। पीड़ित दंपति गरीब परिवार से हैं। ऐसे में पीड़ित दंपति ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय में शिकायत दी है।

निजी अस्पताल के डॉक्टर इंसान ही होते है ?

वर्तमान समय में मरीजों के साथ निजी अस्पतालों की लूट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन डॉक्टरों में इंसानियत नहीं होती। डॉक्टर बनने का उद्देश मानवीय संवेदनाओ को ताक पर रख कर अंधाधुंध पैसे कमाना होता है या फिर लोगों की जान बचाना और उन्हें आराम देना।

सरकार और उसकी नीतियाँ हैं जिम्मेदार-

सरकार की नीतियाँ एसी घटनाओं के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। हमारे देश में एमबीबीएस की एक डिग्री हासिल करने के लिये 25 लाख से 1 करोड़ रूपये  तक फीस भरने में खर्च हो जाते हैं। डॉक्टर के रूप में इच्छुकों को प्रशिक्षित करना सिर्फ़ एक सामाजिक जरूरत न समझकर धन्धा समझा जाता है। इतना ज्यादा पैसा खर्च कर डॉक्टर बनने वाले लोग भी डॉक्टरी को सिर्फ़ एक धन्धे की तरह देखते हैं। जिसका एकमात्र मकसद अधिक से अधिक पैसे कमाना होता है। जो सरकारी नीतियाँ शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों को सिर्फ़ व्यापार बनाकर छोड़ देती हैं, वे नीतियाँ जनता के साथ कभी न्याय नही करेंगी। 

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