कहीं अगला निशान ताइवान तो नहीं? | Taiwan may be next Ukraine |

Update: 2022-02-26 04:43 GMT

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट 

Taiwan may be next Ukraine | पिछले कुछ सालों से पूरी दुनिया एक बड़ा तमाशा बन गयी है| इस तमाशे को दुनिया की सरकारें और मीडिया खेलती हैं और पूरी दुनिया इसे झेलती है| तमाशे के बीच ही सरकारें अपनी ताकत बढ़ा लेती हैं और जनता में कुछ मर जाते हैं और शेष गरीबी, महंगाई और अराजकता से निपटने के लिए रह जाते हैं| कुछ दिनों बाद फिर से एक नया तमाशा आयोजित किया जाता है| इस समय उक्रेन-उक्रेन का तमाशा चल रहा है, इससे पहले बीजिंग विंटर ओलंपिक्स का तमाशा था, इससे पहले ओमिक्रोन-ओमिक्रोन का तमाशा था, उससे पहले अफ़ग़ानिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान, उससे पहले म्यांमार-म्यांमार और उससे भी पहले दुनिया कोविड-कोविड का तमाशा देख रही थी| दुनियाभर की सरकारें खुश रहती हैं कि उनके पास दुनिया के मंच पर कहने के लिए कुछ वक्तव्य हैं और भारत जैसे देश में ऐसे तमाशे देश की सभी समस्याओं को जनता की नज़रों से ओझल करने का आसान तरीका मिल जाता है| समाचार चैनलों के लिए भी एक आराम की स्थिति रहती है, दिनभर बस विदेशी चैनलों की क्लिपिंग पर आधारित मनगढ़ंत समाचार पढ़ने का सुनहरा अवसर रहता है|

दुनियाभर के अनेक विशेषज्ञों के अनुसार संभव है अगले तमाशा का नाम ताइवान-ताइवान हो सकता है| इस समय तमाशा का केंद्र भले ही ताइवान (Taiwan) से लगभग 8000 किलोमीटर दूर उक्रेन (Ukraine) में हो, पर ताइवान के लोगों की बातों का और सोशल मीडिया पर कमेन्ट का एक बड़ा मुद्दा ताइवान का भविष्य बन गया है| उक्रेन के पहले से ताइवान को बहुदेशीय युद्ध का सबसे प्रमुख केंद्र घोषित किया जा चुका है| ताइवान में चीन की हरेक पहल की तीखी प्रतिक्रिया अमेरिका और यूरोपीय देशों से आना रोजमर्रा की बात हो गयी है| चीन के आजीवन राष्ट्रपति जी जिनपिंग (Xi Jinping) लगातार ताइवान को चीन का अभिन्न अंग बताते रहे हैं, और इसका समर्थन करते अमेरिका और यूरोपीय देशों को लताड़ते रहे हैं| चीन लगभग हरेक दिन ताइवान की हवाई सीमा और समुद्री सीमा का उल्लंघन करता रहता है|

उक्रेन के मामले में भी चीन और ताइवान के रास्ते बिलकुल अलग हैं – चीन पुतिन का समर्थन कर रहा है और रूस को तमाम आर्थिक प्रतिबंधों के असर से बाहर करने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि ताइवान की सरकार उक्रेन की सरकार के समर्थन में खडी है और रूस पर आवश्यक आर्थिक प्रतिबन्ध का ऐलान कर चुकी है| ताइवान के उपराष्ट्रपति ली चिंग टे (Lai Ching-Te) ने उक्रेन मसले पर कहा है कि स्वाभिमान को किसी भी मिलिटरी ताकत से दबाया नहीं जा सकता है| उपराष्ट्रपति आगे यह भी कहते हैं कि ऐसे समय जब पूरी दुनिया की निगाहें उक्रेन पर टिकी हैं संभव है चीन ताइवान पर हमला कर दे| ताइवान के विदेश मंत्री जोसेफ वू (Josef Wu) ने भी कहा है कि चीन किसी भी समय आक्रमण कर सकता है| यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन (Boris Johnson) ने भी कहा है कि रूस द्वारा उक्रेन पर हमले का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा|

23 फरवरी को ताइवान की राष्ट्रपति साईं इंग-वें (Tsai Ing-Wen) ने सेना और सुरक्षा संबंधी अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक में सेना को किसी भी युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार रहने का निर्देश दिया| इसके अगले दिन ही ताइवान की सीमा में रोजाना घुसपैठ करने वाले चीनी लड़ाकू विमानों की संख्या लगभग दोगुनी हो गयी| इसके बाद भी चीन के मामलों के अनेक विशेषज्ञ बताते हैं कि इस समय शायद चीन कोई युद्ध जैसी कार्यवाही नहीं करे. क्योंकि कुछ महीने बाद ही चीन में कम्मुनिस्ट पार्टी का अब तक का सबसे भव्य आयोजन किया जाना है और दूसरा बड़ा कारण यह है कि ताइवान की भौगोलिक परिस्थिति ताइवान से बिलकुल अलग है| आर्थिक और सामरिक दृष्टि से ताइवान की भौगोलिक स्थिति अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है| ऐसे में संभव है कि चीन और ताइवान के बीच युद्ध में अमेरिका और यूरोपीय देश सीधे कूद पड़ें|

लेकिन इस मामले में ताइवान में बसे चीन मामलों के विशेषज्ञ माइकल कोल (Michael Cole) का विचार है कि जी जिनपिंग भी पुतिन जैसे ही निरकुश शासक है और निरंकुश शासकों को पागलपन का दौरा कभी भी पड़ सकता है| ताइवान में जनता सोशल मीडिया पर उक्रेन के हालत को देखकर यह सवाल उठा रही है कि यदि ताइवान और चीन के बीच युद्ध हुआ तो क्या यूरोपीय देश और अमेरिका ताइवान की सीधी मदद करेंगें या फिर केवल तमाशबीन बने रहेंगे| बहुत सारे लीग प्रश्न पूछ रहे है कि क्या अमेरिका एक शक्तिशाली देश है? कई लोग यह भी पूछ रहे है कि क्या पश्चिमी देश विशवास योग्य हैं? दरअसल उक्रेन पर रूस द्वारा हमला अमेरिका के लिए एक चुनौती से कम नहीं है, यदि इस मामले में वह नकारा और उदासीन साबित होता है, जैसा कि अभी तक लग रहा है, तब जाहिर है पश्चिमी यूरोपीय देश अमेरिका का सीधा साथ देने से कतराने लगेंगें|

अमेरिका की कथनी और करनी का अंतर लगातार नजर आता है| 20 फरवरी तक राष्ट्रपति जो बाईडेन का हरेक वक्तव्य पुतिन को धमकाने वाले अंदाज में आता था, उन्हने कहा था कि यदि रूसी सेना ने उक्रेन की सीमा में प्रवेश करने का प्रयास किया तो अमेरिका और नाटो की सेना करार जवाब देगी| इसके बाद, पुतिन ने अपनी सेना हरेक तरफ से उक्रेन में भेज दी और बाईडेन डरे सहमे वाइट हाउस में आराम फरमा रहे हैं| इससे पहले दिसम्बर में बड़े तामझाम से बाईडेन ने लोकतंत्र पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किया था, और उसमें चीन की नाराजगी के बाद भी ताइवान को शामिल किया था| इसमें ताइवान के प्रतिनिधि ने जब अपने भाषण के साथ ही एक नक्शा दिखाना चाहा तो ऑनलाइन इवेंट के दौरान ही उसे ब्लाक कर दिया गया| इस नक़्शे में बताया गया था कि चीन ने अवैध तौर पर दुनिया में कहाँ-कहाँ कब्ज़ा किया है| जाहिर है, बाईडेन जब चीन को नाराज करने वाला एक नक्शा नहीं दिखाने की अनुमति दे सकते हैं तो फिर चीन के विरुद्ध युद्ध का सवाल ही नहीं है|

युद्ध में केवल आम जनता मरती है, जनता भूख, बीमारी और बेरोजगारी झेलती है, जनता विस्थापित होती है – और जनता की परवाह किसी शासक को नहीं है| सत्ता के भूखे शासक बस अपनी और चाँद पूंजीपतियों के हितों का ध्यान रखते हैं| इसे शासक युद्ध रोकते नहीं बल्कि इसे हवा देते हैं|  

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