अन्याय : उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी जेपी पांडेय, मौत के दो साल बाद हुए 'ब्लैकमेलर' के आरोप से बरी

मौत के दो साल बाद उन्हें तब इंसाफ मिला जब कोर्ट ने न केवल इस आरोप से बरी किया बल्कि आरोप लगाने वाले और झूठे आरोप की जांच कर उसे 'सच' बताने वाले दारोगा के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश भी दिये..

Update: 2021-08-29 16:40 GMT

उत्तराखंड राज्य निर्माण के आंदोलनकारी जेपी पाण्डेय को मृत्यु के 2 साल बाद कोर्ट से मिला न्याय(File pic)

सलीम मलिक की रिपोर्ट

हरिद्वार। उत्तराखण्ड राज्य निर्माण में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करने वाले एक राज्य आंदोलकारी (अब दिवंगत) के हिस्से में राज्य बनने के बाद 'ब्लैकमेलर' का कलंक आया। इस कलंक को अपने माथे पर लगाकर नौ साल तक जीने वाले इस राज्य आंदोलकारी को अब अपनी मौत के दो साल बाद तब इंसाफ मिला जब कोर्ट ने न केवल उन्हें इस आरोप से बरी किया बल्कि आरोप लगाने वाले और झूठे आरोप की जांच कर उसे 'सच' बताने वाले दारोगा के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश भी दिये।

मामला हरिद्वार का है। जहां करीब ग्यारह साल पहले राज्य आंदोलनकारी जेपी पांडेय सहित चार लोगों के खिलाफ दर्ज कराए गए ब्लैकमेलिंग सहित संबंधित धाराओं के मामले में कोर्ट ने चारों को बरी कर दिया है। कोर्ट में झूठी गवाही व साक्ष्य देने के आरोप में झूठे इल्ज़ाम लगाने वाले सहित छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मुकदमे की एकतरफा जांच पर भी नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने दरोगा गणेश बौठियाल पर कार्रवाई के लिए जिलाधिकारी और एसएसपी को भी पत्र भेजा है। इस मामले को कांग्रेस ने भी मुद्दा बनाते हुए पुलिस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।

घटनाक्रम के अनुसार ज्वालापुर मैदानियान निवासी इलियास खान ने करीब 11 वर्ष पहले दिवंगत राज्य आंदोलनकारी जेपी पांडेय के साथ फरमान, नदीम, अफजल अल्वी के खिलाफ ब्लैकमेलिंग, धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया था। लगातार नौ साल तक अपने बेकसूर होने की दुहाई देते-देते मुकदमे में नामजद जेपी पांडेय की करीब दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।

पांडेय की मौत के बाद भी यह मुकदमा बदस्तूर चलता रहा। इस मामले में कोर्ट में जब गवाही हुई तो इल्ज़ाम लगाने वाले और मामले में झूठी गवाही देने वाले लोग क्रोस सवालों में फंस गये। जिसके बाद सब लोग इस मामले में कोर्ट में कही अपनी पुरानी बातों से पलट गए। जिसके बाद इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुकेश चंद्र आर्य ने फैसला सुनाते हुए जेपी पांडेय, फरमान, नदीम और अफजल अल्वी को बरी कर दिया।

इसके साथ ही कोर्ट में झूठी गवाही व सबूत पेश करने के आरोप में इल्ज़ाम लगाने वाले इलियास खान व उसके पुत्र आशु, कुरबान, सुलेमान, गुलशन और राजेश के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस मामले में कोर्ट ने मामले की एकतरफा जांच करने वाले उत्तराखण्ड पुलिस के जांचाधिकारी गणेश बौठीयाल के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई के लिए आदेश दिए हैं।

कोर्ट का फैसला आने के बाद उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस मामले में गलत विवेचना करने वाले दरोगा गणेश बौठियाल को उनकी नौकरी से तत्काल बर्खास्त किए जाने और उन्हें जेल भेजने की मांग की है।

धीरेंद्र प्रताप ने कहा है कि स्वर्गीय जेपी पांडे क्योंकि समाज के तमाम हिस्सों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाते रहते थे। यही कारण था कि पुलिस दरोगा गणेश बौठियाल ने स्वर्गीय जेपी पांडे को 11 साल पहले एक झूठे मामले में फंसा दिया था। इसमें उन्हें कई दिनों तक हरिद्वार जेल में उत्पीड़न भी सहना पड़ा था और कांग्रेस पार्टी ने भी जेपी पांडे को बजाय उनके मदद करने से किनारा करके उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया था। धीरेंद्र प्रताप ने बताया उस दौरान वे अकेले कांग्रेस के ऐसे नेता थे, जो हरिद्वार जेल में उन्हें मिलने गए व उनकी लगातार मदद की।

धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि जिस तरह से अब हरिद्वार के विद्वान न्यायाधीश ने फैसला दिया है उससे स्पष्ट हो गया है कि स्वर्गीय जेपी पांडे बेदाग नेता थे और सामाजिक जीवन में सच्चे मुद्दों को लेकर लड़ने वाले नेताओं को किस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ता है यह घटना इसका जीता जागता प्रमाण थी। प्रताप ने इस मामले में अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मांग की है कि वे इस मामले में तत्काल व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर उक्त भ्रष्ट दरोगा को तत्काल पुलिस सेवा से बर्खास्त कर जेल भेजने का मार्ग प्रशस्त करें। साथ ही लोग भी जो दोषी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए।

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व राज्य आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी ने कहा कि स्व. पाण्डेय एक निर्भीक व झुझारू आंदोलनकारी थे। झुकना उनके स्वभाव में नही था। इसीलिए कुछ लोगों ने सत्य पर अडिग खड़े पाण्डेय का चरित्र हनन करने के लिए कुत्सित षड्यंत्रों का सहारा लिया। लेकिन ग्यारह साल के बाद न्यायालय में दूध का दूध-पानी का पानी होने से अपनी मौत के दो साल बाद स्व. पाण्डेय न केवल साफ-सुथरे बरी हुए, बल्कि षड्यंत्रकारियों की सारी पोल-पट्टी भी न्यायालय में खुल गयी।

श्री ध्यानी ने न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि सामाजिक जीवन में रहने वाले लोगों को इस काम की अपनी निजी ज़िन्दगी में किस प्रकार कीमत चुकानी पड़ती है, यह प्रकरण उसकी एक बानगी भर है। राजनैतिक-सामाजिक काम करते हुए विभिन्न जनमुद्दों को उठाने वाले लोगों को येन-केन-प्रकारेण झूठे मुकदमों में फंसाकर उनकी मान-मर्यादा का हनन कर उनका मानसिक उत्पीडन किया जाता है। अपने जीवन के अंतिम नौ सालों में स्व. पाण्डेय ने झूठे आरोपों के कारण जो संताप झेला है, उसकी अब कोई भरपाई नहीं की जा सकती है।

उन्होंने मांग किया कि राज्य सरकार स्व. पाण्डेय के परिजनों को उचित मुआवजा देने के साथ ही सामाजिक जीवन में रहने वाले लोगों को असामाजिक तत्वों से संरक्षण प्रदान करे। यही उनकी मौत के बाद स्व. पाण्डेय को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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