कोरोनावायरस से बांग्लादेश का गारमेंट व्यापार तबाह, लाखों महिला कामगार हुईं बेरोज़गार

Update: 2020-04-27 02:30 GMT

वैश्विक लॉकडाउन के चलते इस बात की आशंका जताई जा रही है कि बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले 40 लाख लोगों में से आधे लोगों की नौकरी जा सकती है। इन कामगारों में ज़्यादातर महिलाएं हैं...

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पंत का विश्लेषण

कोरोनावायरस महामारी की वजह से बांग्लादेश के चर्चित कपड़ा उद्योग पर संकट के बादल छा गए हैं। चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड कपड़ों का निर्यातक है बांग्लादेश। इसका ज़्यादातर निर्यात अमेरिका और योरोप के देशों को होता है। बांग्लादेश से हर साल क़रीब 32 अरब डॉलर के कपड़ों का निर्यात होता है जो उसके कुल निर्यात का क़रीब 83 फीसद है।

केले वित्तीय वर्ष 2019 में बांग्लादेश के कुल निर्यात में रेडीमेड कपड़ों का निर्यात 84 फीसदी यानी 40.5 बिलियन डॉलर का था। यह आंकड़ा बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर दिया हुआ है।

वैश्विक लॉकडाउन के चलते इस बात की आशंका जताई जा रही है कि बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले 40 लाख लोगों में से आधे लोगों की नौकरी जा सकती है। इन कामगारों में ज़्यादातर महिलाएं हैं। हर महीने इनकी कमाई मात्र 110 डॉलर है जबकि ज़्यादातर परिवारों में अकेले वे ही कमाई करने वाली हैं।

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पेन स्टेट सेंटर फॉर ग्लोबल वर्कर्स राइट्स संस्था की मानें तो कोरोनावायरस से पैदा हुए संकट के कारण पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान 10 लाख से ज़्यादा कामगारों की छुट्टी हो चुकी है या फिर उन्हें लम्बी छुट्टी पर भेज दिया गया है। इनमें से बहुतों को तो छुट्टी के बाद लौटने पर कामबंदी की सूचना दे दी गयी है।

बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स ऐंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रुबाना हक़ कहती हैं - 'कोरोना वायरस की महामारी के कारण हमारे देश के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले बीस लाख से ज़्यादा लोगों की नौकरी चली जाने का डर है। अब कोई भी ख़रीदार कमीज़ और पतलून नहीं खरीदेगा। इस महामारी के चलते अब लोग अपने पैसे खाने और दवाओं पर ज़्यादा ख़र्च कर रहे हैं।'

Full View में लॉकडाउन बढ़ा कर 5 मई तक कर दिया गया है। पहले ये 25 अप्रैल को ख़त्म होने वाला था। यहां कोरोनावायरस का पहला केस 8 मार्च को सामने आया था। तबसे 26 अप्रैल दोपहर तक 145 लोगों की मृत्यु हो चुकी है, 5,416 संक्रमित केस पाए गए हैं जिनमें से 122 लोग ठीक हो चुके हैं। सच यह भी है कि बांग्लादेश में टेस्टिंग बहुत कम हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 22 अप्रैल तक 32,674 लोगों के ही टेस्ट किये जा सके हैं।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में कपड़ा उद्योग से जुड़े कामगारों पर संकट वहां चल रहे लॉकडाउन से उतना नहीं पैदा हुआ है जितना अमेरिका और यूरोपीय देशों में लगाए गए लॉकडाउन से हुआ है क्योंकि विदेशों में लॉकडाउन के चलते वहाँ से आने वाली मांग में काफी गिरावट आई है। वैसे भी कपड़ा उद्योग को बांग्लादेश में लॉकडाउन से छूट मिली हुयी है।

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बर है कि कोरोनावायरस महामारी के चलते बांग्लादेश से कपड़े ख़रीदने वाले कई बड़े इंटरनेशनल ब्रैंड्स ने अपने ऑर्डर रद्द कर दिए हैं। रद्द किये गए ऑर्डर का मूल्य लगभग तीन अरब डॉलर आंका जा रहा है।

बांग्लादेश को दिए गए अपने ऑर्डर रद्द करने वालों में GAP, Zara, और Primark जैसे बड़े ब्रैंड प्रमुख हैं। इनमें से Primark ने तो इटली, फ्रांस, स्पेन और ऑस्ट्रिया के साथ साथ ब्रिटेन में अपने सारे स्टोर बंद कर दिए हैं। वहीं, Zara ने तो सभी देशों में अपने स्टोर को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है।

तेजी से बदलते फैशन की दुनिया में रेडीमेड कपड़ों के बड़े रिटेलर्स यानी खुदरा व्यापारी खुद की फैक्ट्री नहीं लगाते हैं। ये अपने माल का उत्पादन चीन, बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, कम्बोडिया जैसे देशों को आउट-सोर्स कर देते हैं क्योंकि इन देशों में मज़दूरी सस्ती है इसलिए उनकी उत्पादन लागत कम आती है।

रुबाना हक़ कहती हैं-'पश्चिमी फैशन रिटेलर्स द्वारा ऑर्डर्स निरस्त किये जाने या फिर कुछ समय तक रोक लिए जाने के सन्देश हमें दिवालियेपन की ओर धकेल रहे हैं।'

ब्बीस से तीस हज़ार कामगारों की मदद से अपनी फैक्ट्री चला कर H&M, Zara, Gap, Levi's, Marks & Spencer जैसे बड़े ब्रांड्स के लिए माल बनाने वाले बांग्लादेश के उत्पादकों का कहना है कि हालत बहुत खराब है क्योंकि अनेकों विदेशी ब्रैंड्स ग़ैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार के चलते बांग्लादेश की आपूर्ति श्रृंखला टूट गयी है। दिसंबर 2018 में सरकार द्वारा मज़दूरी बढ़ाने के कारण बांग्लादेश में वस्त्र-निर्माण की फैक्ट्रियां वैसे ही कम मार्जिन पर काम कर रही थीं, अब बहुत से खरीदार तैयार माल के ऑर्डर निरस्त कर रहे हैं, भुगतान करने में डेरी कर रहे हैं और भेजे जा चुके माल पर भी छूट मांग रहे हैं।'

Full View स्टेट युनिवर्सिटी की सेंटर फॉर ग्लोबल वर्कर्स राइट्स नामक संस्था ने बांग्लादेश के फैक्ट्री मालिकों का एक सर्वे किया। इस सर्वे में ये बात सामने आई है कि लाखों कामगारों को बिना उनकी बकाया मज़दूरी दिए उनके घर वापिस भेज दिया गया है। इनमें ज़्यादातर गांव में रहने वाली महिलाएं हैं। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि लगभग सभी पश्चिमी खरीददारों ने कामगारों की मज़दूरी की भरपाई करने से साफ़ मना कर दिया।

लेकिन बांग्लादेश के फैक्ट्री मालिकों को कामगारों से ज़्यादा अपनी चिंता सता रही है क्योंकि ज़्यादातर फैक्ट्री मालिक शेख हसीना सरकार में मंत्री है। इसीलिये उन्होंने सरकार को मज़दूरों के लिए एक खास सहायता पैकेज की घोषणा करने के लिए तैयार कर लिया। लिहाजा 25 मार्च को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सहायता के तौर पर 5000 करोड़ बांग्लादेशी टका यानी 590 मिलियन डॉलर के पॅकेज की घोषणा कर दी। लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने आदेश में साफ़ कर दिया कि इस राशि का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ कामगारों की तनख्वाह और दूसरे भत्तों के भुगतान में ही होगा।

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धर 'Human Rights Watch' नामक एक मानवाधिकार संस्था ने पश्चिमी देशों की बड़े ब्रांड्स वाली अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के रवैये की कड़ी आलोचना की है। संस्था का कहना है कि बहुत से ख़ुदरा कारोबारियों ने कोई वित्तीय या नैतिक ज़िम्मेदारी लिए बग़ैर ही बहुत से ऑर्डर रद्द कर दिए. जबकि, बांग्लादेश के कई कपड़ा कारखानों में काम करने वालों ने उनके ऑर्डर तैयार कर दिए थे।

ड़ी आलोचना और दबाव के बाद H&M और Zara जैसे कुछ ब्रैंड ने वादा किया है कि वो अपने मौजूदा ऑर्डर का पूरा भुगतान बांग्लादेश के कपड़ा निर्माताओं को करेंगे लेकिन सच तो यही है कि वैश्विक लॉकडाउन के चलते विदेशी रिटेलर्स के ऑर्डर पर ऑर्डर लगातार रद्द होने से बांग्लादेश में कपडा उद्योग के कारोबारियों और कामगारों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है।

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