भारत के प्रत्येक 10 में से 1 किशोर पर हुआ साइबर हमला, 50 प्रतिशत ने भी नहीं की रिपोर्ट : स्टडी

Update: 2020-03-16 06:57 GMT

'चाइल्ड राइट्स एंड यू' ने स्टडी में पाया गया कि प्रत्येक चार में से एक ने सोशल मीडिया पर खुद की रुपांतरित (Morphed) फोटो या वीडियो देखी और इनमें से 50 प्रतिशत ने पुलिस को सूचना नहीं दी थी...

जनज्वार। गैर-सरकारी संगठन 'चाइल्ड राइट्स एंड यू' (CRY) ने अपनी एक स्टडी में पाया कि दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सर्वेक्षण में शामिल 630 किशोरों में से लगभग 9.2% ने साइबर हमले अनुभव किया था और उनमें से आधे ने शिक्षकों, अभिभावकों या संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों को इसकी सूचना नहीं दी थी।

18 फरवरी 2020 को 'ऑनलाइन स्टडी एंड इंटरनेट एडिक्शन' शीर्ष के साथ जारी हुई स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक 22.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं (जिनकी उम्र 13-18 वर्ष के बीच थी) ने बताया कि उन्होंने एक दिन में में तीन घंटे से अधिक समय तक इंटरनेट का इस्तेमाल किया और ऑनलाइन धमकियों और हमलों का सामना किया। जबकि प्रत्येक दिन चार घंटे से अधिक समय तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों ने 28 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने भी ऑनलाइन धमकियों का सामना किया।

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स्टडी में पाया गया कि प्रत्येक चार में से एक ने खुद की रुपांतरित (Morphed) फोटो या वीडियो देखी और इनमें से 50 प्रतिशत ने पुलिस को सूचना नहीं दी थी। ऑनलाइन धमकियों को कंप्यूटर, स्मार्टफोन और टैबलेट जैसे डिजिटल उपकरणों के जरिए सोशल मीडिया पर चैटरुम और गेमिंग प्लेटफॉर्म में उत्पीड़न के रुप में परिभाषित किया गया है।

Full View की ओर से जारी हालिया आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं या बच्चों के साथ साल 2017 में साइबर धमकियों और साइबर अपरादों के मामलों में 36 प्रतिशत वृद्धि हुई। इन मामलों की संख्या साल 2017 में 542 थी जो 2018 तक बढ़कर 739 हुए। इस बीच महिलाओं और बच्चों को ऑनलाइन धमकियों के मामले में सजा की दर 15 प्रतिशत घट गई। इस सजा की दर साल 2017 में 40 प्रतिशत थी जबकि 2018 में यह 25 प्रतिशत तक रही। जबकि इसी अवधि के दौरान लंबित मामलों में 1 प्रतिशत वृद्धि (96 प्रतिशत) देखी गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौटे तौर पर रिपोर्टिंग के कारण इसी अवधि के दौरान धमकी या ब्लैकमेल की सूचना के मामलों में 28.3 प्रतिशत कमी आई। इस अविधि के दौरान धमकी या ब्लैकमेल की सूचना के मामले पहले 311 थे जो बाद में 223 तक ही सामने आए। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 से 2018 के बीच कुल मिलाकर 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

साइबर हमला क्यों?

र्मनी के ल्यूफाना विश्वविद्यालय में 'इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर एंड एस्थेटिक्स ऑफ डिजिटल मीडिया' के प्रोफेसर निशांत शाह के मुताबिक साइबर हमलों के तीन मुख्य कारण हैं। एक हिंसा का स्वाभाविककरण है जो सोशल मीडिया पर आम है। दूसरा, यह गुमनाम या दूर से बातचीत से संबंधित है जो मानव उपस्थिति और सामाजिक सहानुभूति दोनों को दूर ले जाती है जो अक्सर हमारे कम्युनिकेशन में सांकेतिक शब्दों में होती है। तीसरा, यह ऑर्केस्ट्रेटेड एल्गोरिथम स्ट्रक्चर को संदर्भित करता है जो कि सत्ता के दुरुपयोग के द्वारा विशिष्ट लोगों को लक्षित करने के लिए किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के 2016 के अनुमान के अनुसार वैश्विक रूप से प्रतेयक तीन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से एक (33%) एक बच्चा है। हाल में इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2019 ने बताया था कि भारत में प्रत्येक तीन में से दो इंटरनेट यूजर 12 से 29 वर्ष के बीच हैं।

श्रेया सिंह दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज में ग्रेजुएशन की छात्रा हैं। वह साइबर उत्पीड़न का निशाना तब बन गई थीं जब वह केवल 12 वर्ष की थीं। वह बताती हैं कि मेरे पिछले स्कूल के एक सहपाठी ने मेरे बारे में फोटो और जानकारी इकट्ठा की और उसका इस्तेमाल फेसबुक पेज बनाने के लिए किया। मुझे कुछ पता नहीं था और मुझे मेरे दोस्तों के जरिए फेक फेसबुक पेज के बारे में मालूम चला। इसके बाद मेरे सहपाठियों ने उसे अश्लील मैसेज भेजने शुरु कर दिए। जिनका सामना करने में मैं असर्थ थी इसलिए दो दोस्तों से दूरी बनाने लगी। फिर मैं डिप्रेशन में आ गई और स्कूल जाना बंद कर दिया था।

बेंगलुरु स्थित गैर सरकारी पॉलिसी थिंक टेंक 'सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी' के डायरेक्टर शाह बताते हैं कि साइबर अपराधों के शिकार लोगों का मानसिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रुप से टूटना लंबे समय से डॉक्यूमेंटेड है और साइबर हमले केवल उसी परंपरा में जारी हैं। 'चाइल्ड राइट्स एंड यू' की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मित्रा कहती हैं, कुछ स्टडी हैं जो बताती हैं कि ऑनलाइन हमलों को अक्सर सत्ता में बने रहने का एक तरीका माना जाता है। कुछ लोग दूसरों को चोट पहुंचाकर या अपमानित करके लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं।

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दो साल तक भारत में कानून लागू करने वाली टीमों को प्रशिक्षित करने वाली साइबर लॉ एक्सपर्ट कर्णिका सेठ ने कहा कि व्यक्तिगत झगड़े ऑनलाइन हमलों का एक बड़ा कारण है। चाइल्ड राइट्स एंड यू ने स्टडी में यह भी पाया कि श्रेया सिंह की तरह प्रत्येक चार में तीन यूजर्स सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने के लिए आयु सीमा को लेकर या तो जागरुक नहीं हैं या इसका पालन नहीं करते हैं। फेसबुक के लिए आयु सीमा 13 वर्ष है और अन्य नेटवर्किंग साइटों के लिए 18 वर्ष है।

राइट्स टू चाइल्ड का जिन लड़के या लड़कियों से साक्षात्कार हुआ उनमें से 80 प्रतिशत लड़कों और 59 प्रतिशत लड़कियों के पास सोशल मीडिया अकाउंट्स थे। इनमें से 31 प्रतिशत के पास दो या दो से अधिक अकाउंट्स थे। उत्तर-पश्चिम दिल्ली के अशोक विहार की निवासी अंकिता (19 वर्षीय) को सरकार के खिलाफ एक फेसबुक पोस्ट के लिए पांच साल पहले हिंसक रूप से ट्रोल किया गया था। लेकिन उसने उत्पीड़न की रिपोर्ट नहीं की, उसने बताया कि क्योंकि उसे पता नहीं था कि कैसे करना है।

शाह कहते हैं, 'साइबर हमलों की रिपोर्ट करने में सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि बड़ी संख्या में कमजोर पीड़ितों को यह भी नहीं पता है कि उनके साथ जो हो रहा है वह बदमाशी है। ऑनलाइन दुर्व्यवहार की अन्य स्टडी बताती है कि डिजिटल स्पेस के भीतर हमलों और धमकियों को सामान्य कर दिया गया है और इसलिए अक्सर पीड़ितों को यह भी पता नहीं होता है कि वे जिस उत्पीड़न और धमकियों का सामना कर रहे हैं जबकि वह स्वाभाविक या सामान्य नहीं है और इसलिए वे हार जाते हैं। दुर्व्यवहार करने वाले प्रतिशोध की आशंका या मानहानि के आरोपों के साथ फंसे रहने की चिंता के बारे में कानूनी विकल्पों से अनजान हो सकते हैं।'

Full View राइट एंड यू की स्टडी के उत्तरदाताओं में से केवल 35% को ही नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (जो इंटरनेट उपयोग के लिए उपकरण और युक्तियां प्रदान करता है)द्वारा प्रकाशित इंटरनेट सुरक्षा गाइड के बारे में पता था। शाह ने कहा, 'पुलिस को एक संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर प्राथमिकी दर्ज करने की आवश्यकता है। ऐसे मामले सामने आए हैं जब पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया है। उस मामले में पीड़ित धारा 156 (3) के तहत अदालत में निर्देश की मांग कर सकता है।

क्या किया जा सकता है

चाइल्ड राइट्स एंड यू की स्टडी ने बच्चों और किशोरों के बीच साइबर हमलों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए एक अभियान का सुझाव दिया और कहा कि शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और इंटरनेट सुरक्षा पर छात्रों के साथ सत्र आयोजित करना और विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल दिशानिर्देश प्रभावी हो सकते हैं। बाल सुरक्षा के मुद्दों के लिए मौजूदा साइबर कानूनों को संशोधित किया जाना चाहिए और पोर्टल, जहां साइबर-अपराध की सूचना दी जा सकती है, उनकी स्थापना की जानी चाहिए।

शाह कहते हैं, इस क्षेत्र में जिन तीन चीजों की स्कॉलर्स और एक्टिविस्टों ने हमेशा वकालत की है वह हैं-एक पीड़ित का भरोसा करें। दूसरा सुरक्षित स्पेस बनाएं और तीसरा सार्वजनिक सुरक्षा कार्यक्रम चलाया जाए। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मनोचिकित्सक यतन बलहारा ने कहा कि पीड़ित और आरोपी दोनों को परामर्श दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुर्व्यवहार करने वाले को चेतावनी दी जा सकती है।

(यह आलेख इंडिया स्पेंड पर पहले प्रकाशित किया जा चुका है। इसे रिया माहेश्वरी ने लिखा है जो सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज मुम्बा में सार्वजनिक नीति की स्नातकोत्तर छात्रा हैं। अनुवाद- निर्मलकांत)

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